کی
जिसकी पत्नी पतिव्रता है, पति को प्राणों से भी अधिक प्यार करने वाली है तथा पति के ही हित में संलग्न है, वह पुरुष इस पृथ्वी पर धन्य है।
मेधावी तथा समर-शूर पुरुष भी स्त्री के समीप परम कायर हो जाते हैं।
आयु के बीत जाने पर भी जिनके पास धन है, वे तरुण हैं। धन-हीन युवक होते हुए भी वृद्ध हो जाते हैं।
राजा दुर्मंत्र से नष्ट हो जाता है, यति संग से, पुत्र अधिक लालन से, ब्राह्मण अध्ययन न करने से, कुल कुपुत्र से शील दुष्टों के संसर्ग से, मित्रता प्रेम के अभाव से, समृद्धि अनीति से, स्नेह प्रवास में रहने से, स्त्री गर्व से, कृषि छोड़ देने से तथा धन प्रमाद से विनष्ट हो जाता है।
धन के उपार्जन में दुःख होता है। और उपार्जित धन की रक्षा में भी दुःख होता है। आय में दुःख व्यय में दुःख। सब प्रकार से दुःख देने वाले धन को धिक्कार है।
धीर और मनस्वी मनुष्य के लिए क्या अपना देश है और क्या विदेश है? वह तो जिस देश में जाता है, उसी को अपने भुजा-बल से अपने वश में कर लेता है।
बुद्धिमान मनुष्य तीक्ष्ण शत्रु को तीक्ष्ण शत्रु से नष्ट कर देता है। सुख की प्राप्ति हेतु कष्टकारक काँटे को काँटे से ही निकालते हैं।
स्त्री के वचनों से प्रेरित मनुष्य अकरणीय को करणीय मानते हैं, अगम को सुगम समझते हैं तथा अभक्ष्य को भक्ष्य मानते हैं।
महाभारत में पाँच प्रकार के व्यक्ति जीते हुए भी मरे के समान बताए गए हैं—दरिद्र, रोगी, मूर्ख प्रवासी तथा नित्य सेवा करने वाला।
अजात, मृत तथा मूर्ख पुत्रों में मृत और अजात पुन श्रेष्ठ हैं क्योंकि ये दोनों थोड़ा दुःख देते हैं और मूर्ख जीवन पर्यंत जलाता है।
जिस मनुष्य के मित्र होते हैं, वह बहुत कठिन कामों को भी कर लेता है। इसलिए मनुष्य को अपने समान स्तर के ही मित्र अवश्य बनाने चाहिए।
जिसके घर माता अथवा प्रियवादिनी पत्नी नहीं है, उसे वन में चला जाना चाहिए क्योंकि उसके लिए जैसा वन, वैसा ही घर।
उद्यम न करने पर भी भाग्य द्वारा नियोजित पूर्व जन्मों में किया हुआ कर्म शुभाशुभ फल प्रदान करता है।
गुणवानों की गणना के आरंभ में खडिया जिसका नाम गौरवपूर्वक नहीं लिखती, ऐसे पुत्र से यदि माता पुत्रवती बनती है, तो वंध्या कैसी होगी?
जिसमें तेज है, वही बलवान् है! स्थूल व्यक्तियों का क्या विश्वास?
मूर्ख मूर्खों के साथ रहते हैं और विद्वान् विद्वानों के साथ। समान शील और व्यसन वालों में मित्रता होती है।
लक्ष्मी उद्योगी पुरुष को प्राप्त होती है। कायर लोग कहते हैं कि जो भाग्य में होगा वह मिलेगा। भाग्य को छोड़कर, अपनी शक्तिभर यत्न करो, फिर भी यदि कार्य सिद्ध न हो तो इसमें कोई दोष नहीं है (या यह देखो कि मेरे पुरुषार्थ में क्या दोष रह गया।
घोड़ा, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, पुरुष और स्त्री—ये पुरुष विशेष को प्राप्त होकर योग्य अयोग्य होते हैं अर्थात् इनके स्वामी जैसे इनका व्यवहार करते हैं वैसे ही हो जाते हैं।
कार्यों को प्रारंभ न करना बुद्धि का पहला लक्षण है और प्रारंभ किए हुए कार्य को पूरा करना दूसरा।
हे मूर्ख! तू मृत्यु से क्यों डरता है? वह डरे हुए को छोड़ती नहीं। आज अथवा सौ वर्ष बाद मरना तो होगा ही क्योंकि प्राणियों की मृत्यु निश्चित है।
अधिक गुणशाली पात्र से गुणियों के गुण तिरस्कृत हो ही जाते हैं जैसे रात में चमकने वाली दीपशिखा सूर्य के उदय होने पर सुशोभित नहीं होती।
मंत्र (गुप्त विचार) छठे कान में पड़ते ही खुल जाता है तथा चार कानों में स्थिर रहता है। इसलिए सभी प्रयत्नों से बुद्धिमान व्यक्ति मंत्रणा में छह कान न होने दे।
प्राणियों की लज्जा, स्नेह, स्वर, माधुर्य, बुद्धि, यौवन, श्री, प्रियासंग, स्वजनों की ममता, दुःखहानि, विलास (सुख की अभिलाषा) और धर्म, शास्त्र, देवता तथा गुरुजनों के प्रति भक्ति, पवित्रता तथा आचार की चिंता, सब कुछ जठराग्नि के शांत होने पर ही संभव है।
आवश्यकता पड़ने पर देता है, ग्रहण करता है, गुह्य बात कहता है, पूछता है, खाता है, खिलाता है—प्रीति के ये छह लक्षण हैं।
भूखा मनुष्य क्या पाप नहीं करता? दुर्बल (भूख से व्याकुल) मनुष्य निर्दयी हो जाते हैं।
भविष्य का विचार कर कार्य करने वाला और उपस्थित विपत्ति के प्रतिकार में समर्थ बुद्धिवाला—ये दोनों व्यक्ति सुख प्राप्त करते हैं लेकिन जो होना है वह होगा—इस प्रकार भाग्य पर निर्भर रहने वाला व्यक्ति नष्ट हो जाता है।
इस लोक में बुद्धिमानों की बुद्धि से अगम्य कुछ भी नहीं है। देखो शस्त्रास्रधारी नंदवंशी राजाओं को चाणक्य ने बुद्धि द्वारा ही नष्ट कर दिया था।
जो अप्रिय भावी स्थिति का पूर्व प्रतिकार कर लेता है, वह शोभित होता है। जो ऐसा नहीं करता है, वह बाद में शोक करता है।
विष रहित सर्प को भी अपना विशाल फन फैलाना चाहिए। विष हो या न हो, फन फैलाना ही भयकारक होता है।
उत्सव में, कष्ट आने पर, अकाल में, शत्रु-संकट में, राजद्वार पर और श्मशान में जो साथ देता है, वही बंधु है।
आकार, संकेत, गति, चेष्टा, भाषण तथा नेत्र और मुख के विकारों से मनुष्य का अंतर्मन परिलक्षित होता है।
उन्नत चित्त वाले पुरुषों का यह स्वभाव ही है कि वे बड़ों पर महान् पराक्रम दिखाते हैं, दुर्बलों पर नहीं।
पंडित मूर्खों के, धनी निर्धनों के, व्रती पापियों के द्वेष्य होते हैं तथा कुल स्त्रियाँ कुलटाओं की द्वेष्य होती है।
दरिद्री व्यक्ति के स्वजन भी सर्वदा दुर्जन बन जाते हैं।
बुद्धिमान लोग इस संसार में गोदान, पृथ्वीदान तथा अन्नदान को भी उतना श्रेष्ठ नहीं बताते जितना श्रेष्ठ सब दानों में अभयदान को बताते हैं।
शीत में अग्नि अमृत है, प्रिय दर्शन अमृत है, राज-सम्मान अमृत है तथा क्षीर का भोजन अमृत है।
जिसके घर से अतिथि असम्मानित होकर दीर्घश्वास छोड़ता हुआ चला जाता है, उसके घर से पितरों सहित देवता विमुख होकर चले जाते हैं।