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Durga Bhagwat

1910 - 2002 | اندور, مدھیہ پردیش

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भारतीय पातिव्रत्य की नैतिकता को चुनौती देकर, राधा ने एकनिष्ठ प्रीति का चाँदनी से भरा हुआ पूरा सौंदर्य उद्घाटित किया।

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जब कोई रस से उत्पन्न सौंदर्य के अनुभव का आनंद लेता है, उसी क्षण 'संसार' विलीन हो जाता है।

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भारतीय समाज की जाति की चारदीवारी इतनी ऊँची और मजबूत है कि उसे लाँघना असंभव है। जाति के बाहर कोई कितना भी बड़ा क्यों हो, उसका जीवन कूड़े की तरह होता है।

विधवा माता, चील से भी अधिक जागरूक होती है। प्रसंग आने पर वह हिंस्त्र भी बन सकती है।

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युद्ध में मनुष्य क्रूर बनता है, उतावला होता है, बावरा होता है, अचानक पिछली बातें याद करता है और भूल भी जाता है।

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प्राचीन भारतीय साहित्य में सभी मानवी कामनाओं में संतति की इच्छा मुख्य है। बच्चे, पोते-पोतियों पर ही गृहस्थाश्रम का श्रेय निर्भर है। किन्तु आश्चर्य यह कि प्राचीन साहित्य के विशाल विश्व में पितामह-पोतों के प्रेम-प्रसंगों को तो छोड़ो, किसी विशिष्ट पितामह तक का उल्लेख नहीं है। भीष्म एक पितामह हैं—और वह भी सद्गुणों से बने पितामह हैं, सांसारिक परंपरा से नहीं।

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द्रौपदी जैसा उत्कट, विराट और प्राकृतिक स्त्रीत्व का अविष्कार अन्यत्र मिलना मुश्किल है।

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करुणा से भरा हुआ अर्घ्य, मृत्यु के क्षण में ही मनुष्य को मिलता है। करुणा का यह प्रसाद जिस मनुष्य को नहीं मिलता, उसके जीवन में कुछ ख़ामी रह जाती है।

रोग भोगते वक्त व्यथा के अंदर एक नाजुक सत्य छुपा होता है—परम नम्रता का सत्य—जो आर्त्त के भक्तिभाव में रहता है, कृष्ण द्वारा उल्लिखित है।

'वार्धक्य' परिपक्वता का दूसरा नाम है।

द्रौपदी के मन की छटपटाहट, भारत की विलक्षण ख़ूबसूरत अशांतता का मूल स्रोत है।

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व्यास के सारे तत्त्वज्ञान की कसौटी मनुष्य था। जिस प्रकार मनुष्य का बड़प्पन जीवन में दिखता है, उसी प्रकार मृत्यु के क्षण में भी उसके व्यक्तित्व का सर्वस्व भरा होता है।

सुख-समृद्धि एकरंगी होती है। संघर्ष में ही जिनकी कथा फूली-फली हो, वे संघर्षविहीन जीवन को क्या महत्त्व दे सकते हैं?

अश्वत्थामा को पराजय ने भड़काया, अहंकार ने नहीं।

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जैसे नदियाँ समुद्र से मिलती हैं, वैसे ही सामाजिक शास्त्र की शाखाएँ अपनी ऐतिहासिक यात्रा में मोड़ लेते हुए, भरसक कोशिशें करती हुई अंततः महाभारत में ही मिलती हैं।

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बार-बार संभाषण होने से मैत्री नहीं बढ़ती।

उत्कृष्ट योद्धा अनुशासनप्रिय होता है और इसी अनुशासन ने अश्वत्थामा को निगल लिया।

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युद्ध में मनुष्य का काले से काला और सुंदर से सुंदर स्वरूप प्रकट होता है।

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माधुर्य, अनुभवों की परिपूर्णता और अलिप्तता से छोटे-बड़े व्यवहार समझने लायक समभाव होने का नाम ही बुढ़ापा है।

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वैसे तो भारतीय तथा विश्व के सभी विचारकों को हास्य-व्यंग्य से परहेज ही रहा है, लेकिन विचारकों में अपवाद रहे सिर्फ़ कन्फ़्यूशियस। उन्होंने कहा था कि जो हास्य-व्यंग्य नहीं समझता, वह संत नहीं बन सकता।

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परस्पर प्रेम से श्रेष्ठ होता है, युद्ध का मूल्य।

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युद्ध का नायक कहाँ होता है? युद्ध होते तो खलनायकों के कारण ही हैं न!

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अधिकांशतः विकलांग का शब्द सच्चा माना जाता है। लेकिन व्यवहार में एक बार अपनी कमी का लाभ उठाने की आदत हो जाए, तो विकलांग व्यक्ति उस दुर्बलता का धूर्तता से लाभ उठाना चाहता है।

पूरे महाभारत में यदि नियति द्वारा पूरी तरह से घिरा हुआ कोई व्यक्ति है, तो वह कर्ण ही है।

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कारुण्य जब प्राणों को महसूस होता है, तभी वहाँ धर्म पाया जाता है।

कवि का मौन सर्वाधिक रचनाशील होता है।

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कृष्ण मूलतः कलासक्त हैं।

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प्राचीन भारतीय साहित्य को विनोद से परहेज है। किंतु लोक परंपरा ने विनोद की निर्मिति व्यर्थ नहीं जाने दी।

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दु:ख को निगलना परम तपस्या है। सभी कलाएँ, दर्शन, सौंदर्य का साक्षात्कार इसी दुख को निगलने की शक्ति में निहित है।

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कर्ण महाभारत के युद्ध में आश्वासन का प्रतीक था।

अमरत्व के अंकुर नहीं होते।

विचारक कहते हैं कि मृत्यु भयकारी नहीं, किंतु आनंद-पर्यवसायी मृत्यु का उदाहरण बहुत ही दुर्लभ है।

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भक्त ईश्वर में लीन होता है, प्रेमी एक-दूसरे में समा जाते हैं, व्यक्ति ध्येय में विलीन होता है—ये घटनाएँ कम दर्जे की होते हुए भी अपरिचित नहीं हैं।

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श्रम या थकान के पश्चात मनुष्य कथाओं में रमना चाहता है।

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राधा-कृष्ण के प्रेम की वजह से भारतीय प्रेमकथा को नई कोमलता मिली।

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महाभारत को अनदेखा कर, सामाजिक आशयों का सम्यक स्वरूप पहचानना या विशद करके बताना संभव नहीं है।

ब्राह्मण का बल उसके मुँह में होता है।

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मुक्त दु:ख अभिनव प्रज्ञा देता है। उसे पुराने अनुभव के भारी संपुट में बंद करने से उसकी शक्ति कम हो जाती है।

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द्रौपदी का पातिव्रत्य झूठा नहीं, किंतु उसकी वासनाएँ, उसकी प्रणय भावनाएँ अत्यंत स्वयंशासित थीं।

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धर्मानुसंधान तथा कलानुसंधान के लिए प्रज्ञा आवश्यक होती है और जहाँ जीवन का समग्रता से विचार करना होता है, वहाँ ईश्वर को प्रकृति से भिन्न नहीं समझा जा सकता।

जीवन और मृत्यु के अभिन्न ताल का शब्द-रूप प्रतीक है गीता।

प्रीति का लाल सुर्ख रंग, राधा के कारण ही रुपहला नीला और चाँदनी-सा हो गया।

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बुद्धि, कौशल, सभी का नियोजन जब से द्रोण ने एकलव्य का अँगूठा कटवाया, तब से शुरू हुआ।

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ज्ञानवानों की संवेदनहीनता संस्कृति का बड़ा श्राप है।

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यदि कृष्ण होते तो स्पर्धा की स्पृहा का कमनीय स्वरुप प्रकट ही नहीं होता।

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दुर्बलता का वैर किसी को भी अति क्रूर और कपटी बना देता

योद्धा का आवेश हमेशा चढ़ा हुआ होता है, लेकिन उसका मन भोला होता है। श्रद्धालु होता है।

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भली हो या बुरी, परीकथा के नायक का अतींद्रिय शक्तिवाला कोई सलाहकार ज़रूर होता है।

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महाभारत में आकुल-अंतर वाले पात्रों की कमी नहीं है।

जब करुणा प्राणों में बस जाती है, तभी धर्म दर्शन देता है।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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