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संवेदनशीलता पर उद्धरण

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कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर; लोकसामान्य भावभूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत् की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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आँख वाले प्रायः इस तरह सोचते हैं कि अंधों की, विशेषतः बहरे-अंधों की दुनिया, उनके सूर्य प्रकाश से चमचमाते और हँसते-खेलते संसार से बिलकुल अलग हैं और उनकी भावनाएँ और संवेदनाएँ भी बिलकुल अलग हैं और उनकी चेतना पर उनकी इस अशक्ति और अभाव का मूलभूत प्रभाव है।

हेलेन केलर
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सच पूछिए तो करुण को एक-रस कहने के पीछे एक जगत्-दृष्टि या संवेदना है—जिसे ट्रैजिक या दुःखमयी संवेदना कह सकते हैं।

मुकुंद लाठ
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जो कोई भी मैकियावेली को ध्यान से पढ़ता है, वह जानता है कि दूरदर्शिता इसी बात में है कि कभी किसी को धमकी दी जाए, बिना कहे कर गुज़रा जाए; दुश्मन को पीछे हटने के लिए बाध्य तो किया जाए पर कभी, जैसाकि कहते हैं, साँप की दुम पर क़दम रखा जाए; और अपने से नीची हैसियत के किसी भी व्यक्ति के अभिमान को चोट पहुँचाने से हमेशा बचा जाए। किसी व्यक्ति के हित को, चाहे वह उस समय कितना भी बड़ा क्यों हो, पहुँची चोट कालांतर में क्षमा की या भुलाई जा सकती है; लेकिन अभिमान और दंभ को लगा घाव कभी भरता नहीं है, कभी भुलाया नहीं जाता। आत्मिक व्यक्तित्व भौतिक व्यक्तित्व से ज़्यादा संवेदनशील, या यूँ कहें कि ज़्यादा सजीव होता है। संक्षेप में, हम चाहे जो भी करें, हमारा आंतरिक व्यक्तित्व ही हमें शासित करता है।

ओनोरे द बाल्ज़ाक
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कवि का काम तो शिक्षा देना है और दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से तो वह गान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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श्रीकांत वर्मा का 'मगध'; राजनीतिक कुचक्र में फँसे एक संवेदनशील मन का इतिहास में संतरण है, जहाँ से वह वर्तमान को एक धुँध की तरह चित्रित करता है।

कुँवर नारायण
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जो भावुक या सहृदय होते हैं, अथवा काव्य के अनुशीलन से जिनके भावप्रसार का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है—उनकी वृत्तियाँ उतनी स्वार्थबद्ध नहीं रह सकतीं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जिस कवि में प्राकृतिक दृश्य और प्रकृति के कौशल देखने और समझने का जितना ही अधिक ज्ञान होता है, वह उतना ही बड़ा कवि भी होता है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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हृदय-विनिमय प्रेम का लक्षण है और तुम यदि उसी हृदय को गोपन करते हो, तो यह निश्चित है कि तुम स्वार्थभावापन्न हो, उनको केवल बातों से प्रेम करते हो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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अनुभूति की जिस तीव्रता में; बाहर-भीतर सर्वत्र अंधकार ही अंधकार दिखाई पड़े, वह नितांत ऐंद्रिय संवेदन कही जाएगी।

नामवर सिंह
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सुविधाजीवी कवियों के शब्द अघाये आदमी की डकार होते हैं, लेकिन त्रिलोचन की कविता में शब्द आँखों से टपकनेवाले लहू की बूँदें हैं।

मैनेजर पांडेय
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जब तक समष्टि-रूप में हमें संसार के लक्ष्य का बोध नहीं होता; और हमारे अंतःकरण में सामान्य आदर्शों की स्थापना नहीं होती, तब तक हमें श्रद्धा का अनुभव नहीं होता।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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हृदय के मर्मस्थल का स्पर्श तभी होता है; जब जगत् या जीवन का कोई सुंदर रूप, मार्मिक दशा या तथ्य मन में उपस्थित होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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उन्यास का सत्य अनिवार्यतः उसकी भाषा में संवेदित होता है।

निर्मल वर्मा
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संवेदना और अनुभूतियों का मूल रूप अमूर्त होता है, और उस अरूप संवेदना तथा अनुभूति के रूपात्मक बोध से ही कला का प्रादुर्भाव होता है।

मैनेजर पांडेय
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मनुष्य जाति की चित्तवृत्तियाँ अनित्य होती हैं, एक बार टूटने पर भी फिर संबंध जुड़ सकता है।

वात्स्यायन
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‘प्रेम’ को बीजभाव माननेवालों की दृष्टि; उसके मूल वासनात्मक रूप ‘राग’ की ओर रहती है, जो मनुष्य की अंतःप्रकृति में निहित रहकर संपूर्ण सजीव सृष्टि के साथ, किसी गूढ़ संबंध की अनुभूति के रूप में समय-समय पर जगा करता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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इतिहास और अनुभव गवाह हैं कि बहुत संवेदनशील व्यक्ति, कर्तव्यपालन के मामले में बहुत दृढ़ होते हैं।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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भावरस का आनंद लेने के लिए हमारे हृदय में एक लोक सदा बना ही रहता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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महाकवि वह हो सकता है, जिसके हृदय में इतना काव्य भर गया है कि वह प्रकट ही नहीं कर सकता।

विनोबा भावे
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जो सहानुभूतिपूर्ण नहीं देखेगा, वह साहित्यिक नहीं हो सकता।

विनोबा भावे
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जैसे प्रतिमा के बिना मंदिर किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है, उसी प्रकार स्नेहशून्य मनुष्य किसी भी पशु की श्रेणी में रखा जा सकता है।

महादेवी वर्मा
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संतुलित बुद्धि और उदार संवेदनशीलता से साहित्य अपने चारों तरफ़ देखता है—केवल राजनीति की ही तरफ़ नहीं, किसी एक ही जगह खड़े होकर।

कुँवर नारायण
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कविता भरे हुए हृदय की भावनाओं का साहित्यिक रूप है।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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मनुष्यता के मूलभूत गुण और मानवीय क्रूरताओं के समकालीन अत्याचारों के बीच, कोई भी एक तटस्थ लेखक हो ही नहीं सकता। लेखक कैमरा नहीं है, लेखक एक संवेदनशील आँख है, जिसके पास विचारधारा से पहले आँसुओं की धारा है। मुझे लगता है, मैं कवि होकर ख़ुद का ही शिकार कर रहा हूँ और ख़ुद अपने मनुष्य होने का शिकार हो रहा हूँ।

लीलाधर जगूड़ी
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काव्य का अनुशीलन करने वाले मात्र जानते हैं कि काव्यदृष्टि सजीव सृष्टि तक ही बद्ध नहीं रहती। वह प्रकृति के उस भाग की ओर भी जाती है, जो निर्जीव या जड़ कहलाता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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भावोद्रेक से उक्ति में जो एक प्रकार का बाँकपन जाता है, तात्पर्यकथन के सीधे मार्ग को छोड़कर वचन; जो एक भिन्न प्रणाली ग्रहण करते हैं, उसी की रमणीयता काव्य की रमणीयता के भीतर सकती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जिसे विश्वानुभूति हुई है और जो सर्वभूत हृदय होगा, जिसके मन में संकुचितता नहीं होगी—वही साहित्यिक होगा।

विनोबा भावे
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कविता का उत्स जैविक है, उसके लक्षण हमारे जीवाश्मों में बसे हैं—हमारे हृदय की गति और लय की तरह।

कुँवर नारायण
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एक युग, साहित्यिक आंदोलन और एक रचना-प्रवृत्ति के रचनाकारों में, संवेदनशीलता के स्तर पर समानताएँ होती हैं।

मैनेजर पांडेय
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संवेदनहीन भाषा जिस तरह कलाकृति का अर्थ उद्घाटित नहीं कर पाती, उसी तरह उस कलाकृति की भाषा कभी संवेदनशील नहीं मानी जा सकती, जो किसी महत्वपूर्ण सत्य से शून्य है।

निर्मल वर्मा
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बाहरी दुनिया से अधिक बाधाएँ आदमी के दिल में होती हैं।

राहुल सांकृत्यायन
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सान्निध्य और संपर्क की प्रबल प्रवृत्ति जगानेवाली दशा, जिसे आसक्ति कहते हैं—माधुर्य भावना के संचार से ही प्राप्त होती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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यदि आपको प्रेम करना है, तो आपको अपनी पूरी ताक़त से करना चाहिए। पूरे दिल से प्रेम करें।

ऋत्विक घटक
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उधार या भाड़े पर लिया गया कोई भी ऐसा व्यक्ति; जो तुम्हारे वर्ग का नहीं है, वह लेशमात्र भी तुम्हारे हितों को नहीं साध सकता।

भीमराव आंबेडकर
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मानवीय संवेदनाएँ जिस हद तक मानवीय होती हैं, युद्ध-विरोधी भी होती हैं।

केदारनाथ सिंह
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साहित्य में सच्ची प्रतिबद्धता वहीं जन्म लेती है, जहाँ कला लेखक की संवेदना और उसके वैचारिक झुकाव को एक विलक्षण जादुई संतुलन में बदल लेती है।

केदारनाथ सिंह
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आँख हो मनुष्य हृदय से देख सकता है, पर हृदय होने से आँख बेकार है।

बालकृष्ण भट्ट
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मनुष्य में भी जब रस का आविर्भाव नहीं होता, तब वह जड़ पिंड हो जाता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जीवन केवल इच्छाओं या भावनाओं से उत्पन्न आचरणों को सेना के समान कवायद सिखा देने में ही सफल नहीं हो जाता, वरन् उन इच्छाओं के उद्गमों को खोजकर, उनसे मनुष्यता की मरुस्थली को आर्द्र करके पूर्णता को प्राप्त होता है।

महादेवी वर्मा
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कविता के लिए उपज चाहिए। नए-नए भावों की उपज जिसके हृदय में नहीं, वह कभी अच्छी कविता नहीं लिख सकता।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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जो शक्तिमान हैं, वे चाहे जो भी करें, उनकी नज़र रहती है निराकरण की ओर। जिससे उन सभी अवस्थाओं में कोई विध्वस्त हो, प्रेम के साथ उसके ही उपाय की चिंता करना—बुद्धदेव को जैसा हुआ था—वही है सबल हृदय का दृष्टांत।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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वृक्ष जब बढ़ रहा होता है, वह कोमल होता है; पर उसकी मृत्यु तभी हो जाती है, जब वह सूखकर कठोर हो जाता है।

आन्द्रेई तारकोवस्की
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यह आवश्यक नहीं है कि ‘महान्’ आलोचक संवेदनशील हों।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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संवेदनशीलता युगसापेक्ष होती है।

मैनेजर पांडेय
  • संबंधित विषय : युग
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जो प्रेम के अधिकारी हैं; निःसंदेह चित्त से उनका ही अनुसरण करो, मंगल के अधिकारी होगे ही।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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हृदय पर नित्य प्रभाव रखने वाले रूपों और व्यापारों को भावना के सामने लाकर; कविता बाह्य प्रकृति के साथ मनुष्य की अंतःप्रकृति का सामंजस्य घटित करती हुई, उसकी भावात्मक सत्ता के प्रसार का प्रयास करती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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पश्चिम का कलाकार रूप (फ़ार्म) की खिड़की से देखकर वस्तु को संवेद्य बनाता है, उसका संप्रेषण करता है। भारत का कलाकार प्रतीक की खिड़की से वस्तु को नहीं, वस्तु के पार वस्तु-सत् को संवेद्य बनाता है।

अज्ञेय
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शुभकामना से अर्थशास्त्र के नियम नहीं बदलते, विलाप से अन्याय समाप्त नहीं होता, क्योंकि वहाँ हृदय है ही नहीं।

हरिशंकर परसाई
  • संबंधित विषय : दिल
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कामकाजी दृष्टि मनुष्य के स्वार्थ के साथ दृश्य वस्तु को जोड़कर देखती है और एक भावुक की दृष्टि अधिकतर निःस्वार्थ भाव की वस्तुओं का स्पर्श करती है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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