मिलने आने वाली प्रेमिका के वस्त्र; यदि वर्षा के कारण भीग गए हों और वह शृंगार-भ्रष्ट हो गई हो, तो नायक का कर्तव्य है कि वह ख़ुद ही प्रेमिका के वस्त्र बदल, उसका पुनः शृंगार करे।
जिस असमर्थता से प्रेमिका प्रेमी से नहीं मिल पाती, तो प्रेमी उस असमर्थता को दूर करने का उपाय उसे बता दे।
किलकिंचित विलास से शिथिल हो प्रियतमा के संग रहना, कान से कोकिला के शब्द की कलकलाहट सुनना और चाँदनी का सुख उठाना—ऐसी सामग्री से चैत्रमास की विचित्र रातें, किसी पुण्यवान् के हृदय और नेत्रों को सुख देती हुई बीतती हैं।
स्त्री तभी तक अमृतमय है कि जब तक नेत्र के सामने है, नेत्र से जैसे दूर हुई कि विष से भी अधिक कष्टकारी हो जाती है, अर्थात् विरह से संताप देती है।
संध्या के समय प्रदोषकाल में संगीत का आयोजन उपयुक्त होता है। अतः नागरक को संगीत-गोष्ठी में सम्मिलित होकर संगीत का आनंद लेना चाहिए। तत्पश्चात् सुसज्जित तथा सुगंधित धूपादि से सुवासित, वासगृह में अपने सहायकों के साथ शय्या पर बैठकर अभिसारिका (प्रेमिका) की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
प्रेम की अवस्था में प्रियतम की दृष्टि में जो पूर्णता होती है, उसे किसी शब्द या आलिंगन से नहीं मापा जा सकता।
प्रेयसी समीप में रहने पर बड़ी प्यारी लगती है। जब वह अलग हो जाती है, तो उसका वियोग बड़ा ही दुःख देता है।
जैसे बीच में विषम शिलाओं के आ जाने से नदी का वेग बढ़ जाता है वैसे ही अपने प्रिय से मिलने के सुख में बाधाएँ आ जाती हैं तो प्रेम सोगुना हो जाता है।
सुख के समय थोड़ा-थोड़ा आँखों को बंद कर, जो सुख का अनुभव दो युवा प्रेमियों को होता है—वह वास्तव में कामदेव का पुरुषार्थ है।
शीघ्र खिलनेवाली मालती की कलियों की माला गले में पहिने हों, केसरयुक्त चंदन अंग में लगाए हों और सुंदर प्यारी स्त्रियों को छाती से लिपटाए हों—तो यह जानो कि शेष स्वर्ग का भोग यहाँ प्राप्त हुआ है।
हमें अपने प्रिय नेताओं के प्रति स्नेह प्रकट करना चाहिए—सार्थक कार्यों और अथक शक्ति के द्वारा। जो प्यार अपने प्रिय के चरण छूने और उसके पास पहुँच कर शोर मचाने से संतुष्ट हो जाता है, भय है कि वह धीरे-धीरे उसके लिए जान लेवा भी हो सकता है।
कला ईर्ष्यालु प्रेयसी है।
गर्मी, जाड़ा, वर्षा की परवाह न करके नायिका को अभिसार के लिए नायक के घर जाना चाहिए।
जिस असमर्थता से प्रेमिका प्रेमी से नहीं मिल पाती, तो प्रेमी को उस असमर्थता को दूर करने का उपाय उसे बताना चाहिए।
मेरी प्रेयसी! तुम्हारे होंठ मधु के छत्ते की तरह हैं : मधु और दुग्ध तुम्हारी जिह्वा के तल में हैं और तुम्हारे वस्त्रों की गंध मेरे घर की गंध जैसी है।
जहाँ; जिस स्थान पर दो प्रेमिकाएँ हों और एक से संबंध हो चुका हो, तो दूसरी से प्रेम-व्यवहार का संबंध न करे।
प्रिय के प्रसन्न होने पर मैं उमंगभरी हो जाती हूँ और प्रिय के उमंग भरे होने पर मैं उनका एक अंग बन जाती हूँ प्रिय मेरे हैं और मैं उनकी हूँ, इस प्रकार हम दोनों अब एक हो गए हैं।
प्रियजन की मृत्यु होती है, प्रेम की मृत्यु नहीं होती, प्रेम अमृत रहता है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere