तर्क और आस्था की लड़ाई हो रही थी और कहने की ज़रूरत नहीं कि आस्था तर्क को दबाए दे रही थी।
यदि विश्वास विवेक की आँच बरदाश्त नहीं कर सकता, तो ध्वस्त हो जाएगा।
मेरे विचार से जिस आदमी में थोड़ा-सा भी विवेक होता है, वह हमेशा अपनी परिस्थितियों को तर्कसंगत ढंग से समझना चाहता है।
जब विद्वान लोगों में सत्या-असत्य का निश्चय नहीं होता; तभी अविद्वानों को महाअंधकार में पड़ कर बहुत दुःख उठाना पड़ता है, इसलिए सत्य के जय और असत्य के क्षय के अर्थ-मित्रता से वाद वा लेख करना, हमारी मनुष्यजाति का मुख्य काम है। यदि ऐसा न हो तो मनुष्यों की उन्नति कभी न हो।
गोष्ठी-समवाय का आयोजन; वेश्या के घर पर अथवा अन्य समान विद्या, बुद्धि, शील, धन वाले समवयस्क मित्रों के घर पर करना चाहिए। सभा में विद्या और कलाओं में निपुण वेश्याओं के साथ वार्तालाप करते हुए, साहित्य, काव्य-समस्या, कथा-आख्यायिक, नृत्य, गीत, कला एवं नाट्यकला आदि विषयों पर चर्चा करनी चाहिए। इस प्रकार समान अनुराग, परिहासपूर्वक मधुर वार्तालाप के साथ गोष्ठी में व्यवहार करते हुए गोष्ठी-समवाय का आनंद लेना चाहिए।
प्रगति में समर्थक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह पुराने विश्वास से संबंधित हर बात की आलोचना करे, उसमें अविश्वास करे और उसे चुनौती दे।
जैसे तर्क के बेसहारा; अप्रतिष्ठ मार्ग से ब्रह्म को नहीं जाना जा सकता, वैसे ही धर्म को भी नहीं जाना जा सकता।
शास्त्रार्थ में कोई हारता नहीं, हराया जाता है।
तार्किक जिस प्रकार श्रोता को अपनी विचारपद्धति पर लाना चाहता है, उसी प्रकार कवि अपनी भावपद्धति पर।
हम हर उस चीज़ को 'इंस्टिंक्ट' कहने लगे हैं, जो हम अपने अंदर महसूस करते हैं और जिसके लिए हमें कोई तार्किक आधार नहीं मिलता।
जब तक वादी प्रतिवादी होकर; प्रीति से वाद वा लेख न किया जाए, तब तक सत्य-असत्य का निर्णय नहीं हो सकता।
तर्क में प्रति-तर्क हो सकता ही नहीं, होता ही है—हम तर्क-बुद्धि के भीतर रहते हुए जानते रहते हैं कि तर्क का प्रति-तर्क है, चाहे तत्काल सूझे नहीं—और फिर तर्क-प्रति-तर्क का प्रवाह अनंत है, किसी निश्चय पर आकर टिक नहीं सकता—टिकना उसके लिए संभव ही नहीं।
बहस के स्वरूप को लेकर जितनी बहस संस्कृत के शास्त्रकारों ने की है, उतनी कदाचित् संसार की किसी अन्य भाषा के साहित्य में नहीं मिलेगी।
किसी स्त्री ने न्यायसूत्र या वात्स्यायनभाष्य जैसा कोई शास्त्रग्रंथ रचा हो, ऐसा प्रमाण नहीं मिलता। उपनिषत्काल के बाद शास्त्रार्थ में स्त्री विस्मृत हाशिए पर है। किसी कोने से उसकी आवाज सुनाई देती है, पर वह जब कभी अपने अवगुंठन से बाहर निकल कर आती है तो एक विकट चुनौती सामने रखती है और दुरंत प्रश्न उठाती है।
दर्शन तर्क-वितर्क कर सकता है और शिक्षा दे सकता है, धर्म उपदेश दे सकता है और आदेश दे सकता है; किंतु कला केवल आनंद देती है और प्रसन्न करती है।
स्वयं को विरोधियों के तर्कों का सामना करने लायक बनाने के लिए अध्ययन करो।
द्रौपदी के द्वारा जो शास्त्रार्थ उठाया गया, उसका एक स्पष्ट निर्णय यह भी है कि पाप या अन्याय करने वाला ही पापी नहीं होता, उस पाप या अन्याय पर चुप रहनेवाला भी पापी होता है।
कुछ शास्त्रार्थ ऐसे भी हुए जिनमें स्त्री उपस्थिति की आँच अभी भी मंद नहीं हुई है। यह भी बहुधा हुआ है कि स्त्री अकेली होने के बावजूद, अपनी प्रखरता और तेजस्विता में पुरुष समाज को हतप्रभ कर देती है।
भारतीय समाज मूलतः तर्कप्रवण और वादोन्मुख लोगों का समाज है।
'The High Cast Hindu Women' वास्तव में एक स्त्री की ओर से शास्त्रार्थ का प्रस्ताव है।
गार्गी ब्रह्मवादिनी थी। उपनिषदों में ही स्त्रियाँ ब्रह्मवादिनी हुआ करती थीं।
भद्र या शिक्षित समाज में महिलाएँ पुरुषों के बीच बहस के लिए आती रही हैं और वे पुरुषों के आधिपत्य के बीच अपनी जगह भी बनाती रही हैं।
जुए में दाव पर लगाई गई और राजसभा में ज़बरदस्ती घसीटकर लाई गई द्रौपदी; भीष्म आदि सभासदों से जो संवाद करती है, उसमें एक शास्त्रार्थ घटित होता है, जो वास्तव में इस देश के इतिहास में सबसे बड़े शास्त्रार्थों में एक है।
यों तो पूरा महाभारत ही मनुष्यों के गहरे संकटों से गुजरने और उनसे उबरने की महागाथा है, पर उसका द्यूतपर्व ऐसा महाख्यान है, जिसमें पुरुष समाज के बीच, पुरुष के कारण और पुरुषों के द्वारा अत्यंत दारुण स्थिति में पहुँचा दी गई स्त्री, अपनी शास्त्रार्थ की प्रतिभा के द्वारा पुरुष की सत्ता को ज़बरदस्त चुनौती देती है।
प्रेम की अभिव्यक्ति में तर्क शक्तिहीन है।
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धृतराष्ट्र ने जो द्रौपदी का सम्मान किया, और युधिष्ठिर को उनका राज्य ससम्मान लौटा दिया—उसके पीछे द्रौपदी के शास्त्रार्थ की भूमिका थी।
महाभारत में वर्णित पात्रों में भारतीय इतिहास की सबसे तेजस्विनी नारियाँ भी हैं।
गार्गी और मैत्रेयी का विलक्षण बौद्धिक व्यक्तित्व और अपने समय के सबसे बड़े ज्ञानी के साथ संवाद कर सकने का उनका साहस—दोनों पूरी भारतीय शास्त्रार्थ परंपरा के इतिहास में बेजोड़ हैं।
यथार्थवादी होने का दावा करनेवाले को तो समूचे पुरातन विश्वास को चुनौती देनी होगी। यदि विश्वास विवेक का ताप नहीं सह सकता है, तो वह अपने आप ध्वस्त हो जाएगा।
अनुमान का साधक हेतु है और जिसका अनुमान करना है वह साध्य है।
अतिशय तर्क-वितर्क से बुद्धि तेजस्वी नहीं बनती, तीव्र भले ही होती हो।
अच्छी और सार्थक बहस की गुंजाईश बनी रहे; यह किसी भी समाज की जीवंतता की पहचान है, इसके विपरीत निरर्थक बहसों का जारी रहना उसकी रूग्णता का द्योतक हो सकता है।
शंकरदिग्विजय के पश्चात् शास्त्रार्थ के क्षेत्र में सबसे बड़ी दिग्विजय यात्रा कदाचित् दयानंद की रही है। दयानंद के दिग्विजय अभियान में स्त्री की सहभागिता नहीं है।
वादी प्रतिवादी को समझाता है, इस समझाने के लिए जिस वाक्य का प्रयोग वह करता है, उसे अनुमान वाक्य कहते हैं।
वाद शब्द का प्रयोग सिद्धांत या मत के अर्थ में भी होता रहा है
साध्य का कथन प्रतिज्ञा है।
आयुर्वेदशास्त्र के आद्य आचार्य चरक ने बहस के लिए संभाषा शब्द का प्रयोग किया है।
तर्क की एक निश्चित सीमा होती है, उससे आगे वह नहीं जा सकता। उसका दायरा बहुत ही सीमित है, फिर भी तथ्य इस दायरे में समाहित होते रहते हैं।
विग्रह्य-संभाषा विवाद है, जिसमें हार-जीत का भी महत्त्व होता है।
वितंडा छीछालेदर है।
संधाय संभाषा खुली चर्चा है, जो संधि की स्थिति में अर्थात् सौहार्दपूर्ण या सद्भावनामय वातावरण में की जाती है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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