भारतीयता, समकालीनता, स्थानीयता, सामाजिकता आदि के हम कला में क्या अर्थ लगाते हैं, यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि इनका आज हमारे जीवन में क्या अर्थ है।
हिंदी के वर्णवादी अध्यापक इसलिए परेशान है कि अगर कबीर दलित ले गए, तो निर्गुण परंपरा का क्या होगा? सामाजिक एकता समरसता का क्या होगा? द्विवेदी जी का क्या होगा? उस उदारता का क्या होगा, जो हमारे हिंदी साहित्य के इतिहास ने भक्ति काल में पैदा की, जिसमें मानव-मानव एक हो गया।
जो भी ज्ञान है; उससे चुनकर मनुष्य जीने के लिए जिस व्यवस्था का निर्माण करता है, उसी को सभ्यता कहते हैं।
जो धर्म उपदेश द्वारा न सुधरनेवाले दुष्टों और अत्याचारियों को दुष्टता के लिए छोड़ दे, उनके लिए कोई व्यवस्था न करे—वह लोकधर्म नहीं, व्यक्तिगत साधना है।
कोई स्थायी तरक़्क़ी तब तक संभव नहीं है, जब तक हम ख़ुद शुद्धिकरण की त्रि-स्तरीय प्रक्रिया से नहीं गुज़रेंगे। हमें अपने आचरण का सामान्य स्वर सुधारना होगा, अपने उच्चारण को साधना होगा और अपने विचारों को पुनर्जीवित करना होगा।
समाज की भूमि ही व्यक्ति की भूमि होती है।
सत्ता ही सामाजिक प्रगति की कुंजी है।
परिस्थिति, काल और सामाजिक स्थिति पर अभिव्यक्ति निर्भर करती है।
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अपने यहाँ समकालीनता और आधुनिकता का सवाल उठाना, न तो समसामयिक है और न आधुनिक। क्योंकि यहाँ समकालीनता और आधुनिकता; सामाजिक स्तर पर सामूहिक जीवन के एक ही बिंदु पर, एक ही साथ और एक ही समय में अंकित होती है—उनके लिए अलग-अलग काल या व्यक्ति चुन पाना संभव नहीं हो सकता है।
हिंदी में सामाजिक यथार्थवाद का एक फूहड़ रूप, एक अचल मानक की तरह स्वीकृत है।
सूरदासजी अपने भाव में मग्न रहनेवाले थे, अपने चारों ओर की परिस्थिति की आलोचना करनेवाले नहीं। संसार में क्या हो रहा है, लोक की प्रवृत्ति क्या है, समाज किस ओर जा रहा है—इन बातों की ओर उन्होंने अधिक ध्यान नहीं दिया है।
सामजिक महत्त्व के लिए आवश्यक है कि या तो आकर्षित करो या आकर्षित हो। जैसे इस आकर्षण-विधान के बिना अणुओं द्वारा व्यक्त पिंडों का आविर्भाव नहीं हो सकता, वैसे ही मानव-जीवन की विशद् अभिव्यक्ति भी नहीं हो सकती।
'श्रेय' की साधना जहाँ कला की सामाजिकता के लिए पर्याप्त जगह छोड़ती है, वहीं 'प्रेय' की सौंदर्यमूलक उत्कृष्टता के लिए।
उच्चतम जीवन-मूल्य; अकसर किसी शिखर-चरित्र, नायक या नेता में घनीभूत या प्रतीकित होकर, नीचे के सामाजिक आधार की ओर प्रभावित होते हैं।
मुझे नहीं लगता है कि सामाजिक ज्ञान के क्षेत्र में कोई भारतीय एक क़दम भी आगे बढ़ा पाएगा; बग़ैर उस ज्ञान खंड का उपयोग किए, जिसे विभित्र समूहों के एक्टिविस्टों ने उत्पन्न किया है।
सामाजिक जीवन में निर्बाध उच्छृंखलता के लिए कोई जगह नहीं है।
जहाँ आधुनिक युग के अभिभावक; अपने बच्चों को अजनबियों से बात न करने की चेतावनी देते हैं, वहीं प्रागैतिहास में हमारा पोषण विश्वास की ख़ुराक से होता था।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere