आचार्य शुक्ल जिसे मर्यादा कहते हैं, वह वास्तव में रूढ़ि है।
सूरदास के काव्य में कृष्ण से राधा और दूसरी गोपियों का प्रेम, सामंती नैतिकता के बंधनों से मुक्त प्रेम है।
हिंदी क्षेत्र में अभी सामंती मूल्यों और रूढ़ियों का जितना अधिक प्रभाव है, उतना देश के किसी अन्य भाग में शायद ही कहीं हो। इसलिए यहाँ स्त्रियों का जैसा शोषण, दमन और उत्पीड़न है—वैसा अन्यत्र कहीं नहीं।
रूढ़ियाँ केवल शास्त्र की ही नहीं होतीं, लोक की भी होती हैं।
सूरदास जिस सामंती समाज में रचना कर रहे थे, उसमें मनुष्य से अधिक व्यवस्था के बंधनों का महत्त्व था। उनकी रचना में सामंती व्यवस्था के बंधनों से मुक्ति के लिए बेचैन मनुष्य का चरित्र उभरता है।
लोक की रूढ़ियाँ, शास्त्र की रूढ़ियों से कम दमनकारी नहीं होतीं।
सूर के काव्य में जिस किसान-जीवन का चित्रण है, उसका एक विशेष सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ है। वह संदर्भ सामंती व्यवस्था का है, जिसके भीतर किसान-जीवन के अनुभवों का स्वरूप बना है। सूर की विशेषता यह है कि उन्होंने सामंती-व्यवस्था के संदर्भ के साथ, किसान-जीवन के अनुभवों का चित्रण किया है।
सामंतवाद में वधू के घर की जो लूट थी, वह पूँजीवाद में दहेज़ हो गई।
सामंतवाद के विघटन और जनसंस्कृति के उत्थान की प्रक्रिया से उपजे भक्तिकाव्य में सामंतवाद विरोधी स्वर का मुखर होना स्वाभाविक है।
रामानंद ने सामंती व्यवस्था की प्रमुख सामाजिक विशेषता, जाति प्रथा को—जिससे नारी पराधीनता की समस्या भी जुड़ी है—भक्ति के लिए व्यर्थ और अस्वीकार्य बना दिया।यह उनका और भक्ति आंदोलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान है।
लोकतंत्र में मध्ययुगीन सामंतवाद और प्राचीन कुलराज चलाने का नतीजा है यह कि प्रधानमंत्री की विधवा बहू, इस देश को परिवार की जागीर मानकर सास से हिस्सा माँगती है और जेठ को बेदख़ल करना चाहती है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere