पुरुष और स्त्री का संबंध केवल आध्यात्मिक न होकर व्यावहारिक भी है, इस प्रत्यक्ष सत्य को समाज न जाने कैसे अनदेखा करता रहा है।
कविता की भाषा बोलचाल से जितनी ही अधिक दूर जा पड़ती है, उतनी ही उसकी सादगी कम हो जाती है।
व्यावहारिकता भाषा को एक तरह इस्तेमाल करती है, कला बिल्कुल दूसरी तरह और बिल्कुल अपनी तरह।
कला की भाषा में व्यावहारिक भाषा के अर्थ ढूँढ़ना, व्यावहारिक भाषा में कला के अर्थ ढूँढ़ने की तरह है।
शास्त्र में प्रतिपादित सभी बातें प्रयोग के लिए नहीं हैं, क्योंकि शास्त्र के विषय व्यापक होते हैं और प्रयोग एकदेशी होते हैं।
अनेक वैज्ञानिक जब थोडे बढ़े हो जाते हैं, तो वे प्रथम श्रेणी का काम अपनी प्रयोगशाला से करना जारी रखते हैं। हालाँकि इसका कारण यह नहीं है कि वे ख़ुद तेज़ दिमाग़ और नएपन वाले होते हैं, बल्कि वे एक बैंड नाम बन चुके होते हैं, उनके पास संसाधन और धन जमा होते हैं, और वे काम करने के लिए प्रथम श्रेणी के वैज्ञानिकों को आकर्षित कर सकते हैं।
काम पर विजय प्राप्त करने का प्रमुख उपाय है सब स्त्रियों को मातृरूप में देखना और स्त्रियों जैसे दुर्गा, काली, भवानी का चिंतन करना। स्त्री-मूर्ति में भगवान या गुरु का चिंतन करने से मनुष्य शनैः शनैः सब स्त्रियों में भगवान के दर्शन करना सीखता है। उस अवस्था में पहुँचने पर मनुष्य निष्काम हो जाता है। इसीलिए महाशक्ति को रूप देते समय हमारे पूर्वजों ने स्त्री मूर्ति की कल्पना की है। व्यावहारिक जीवन में सब स्त्रियों को माँ के रूप में सोचते-सोचते मन शनैः शनैः पवित्र हो जाता है।
आज के समाज में प्रतिभा तो बहुत है, परंतु श्रद्धा नहीं है। ज्ञान तो है परंतु व्यावहारिक बुद्धि नहीं है। आडंबरपूर्ण सभ्यता तो है, परंतु प्रेम व सहानुभूति नहीं है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere