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व्यवहार पर उद्धरण

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बेइज़्ज़ती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो, तो आधी इज़्ज़त बच जाती है।

हरिशंकर परसाई
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आदमी जब बिगड़ता है तो स्वभाव से ही कुछ ऐसा है कि जब वह एक चीज़ में बिगड़ता है, तो पीछे सब चीज़ों में ही बिगड़ जाता है।

महात्मा गांधी
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बड़ाई, पंडिताई, विवेकता और कुलीनता—ये सब मनुष्य के देह में तभी तक रहती हैं, जबतक शरीर में कामागिन नहीं प्रज्वलित होती। जब तक आदमी कामपीड़ित नहीं होता, तभी तक उसे अपने गौरव, विद्वत्ता, उच्च कुल की उत्पत्ति और सदाचार का ज्ञान रहता है।

भर्तृहरि
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पुरुष अगर अपनी पूरी सत्ता का इस्तेमाल करता है तो स्त्री निसंदेह कुचली जाती है, पर अगर वह भरपूर लाड़-प्यार में सत्ता स्त्री के हाथों में सौंप देता है, तो स्त्री द्वारा अधिकारों की अतिक्रमण की कोई सीमा नहीं रहती।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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पतित कही जाने वाली स्त्रियों के प्रति समाज की घृणा, हाथी के दाँत के समान बाह्य प्रदर्शन के लिए हैं और उसका उपयोग स्वयं उसकी मिथ्या प्रतिष्ठा की रक्षा तक सीमित है।

महादेवी वर्मा
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हम ईश्वर को देख नहीं सकते। यदि हम ईश्वर को देखने का प्रयत्न करते हैं, तो हम ईश्वर की एक विकृत और भयानक आकृति बना डालते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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मानवीय चरित्र की सभी कुरूपताओं के दर्शन करने हो, तो वरिष्ठ पदाधिकारियों का अपने अधीनस्थों के साथ व्यवहार देख लेना चाहिए।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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चित्त की मग्नता श्वास की धीमी गति पर निर्भर करती है। भय, काम, क्रोध आदि हानिकारक भावावेगों की अवस्थाओं में, श्वास अनिवार्य रूप से तेज़ या असमान गति से चलता है।

परमहंस योगानंद
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अपनी वाणी, व्यवहार और विचारों पर ध्यान दो और यह सदा स्मरण रखो कि ईश्वर सभी जगह मौजूद है।

कन्फ्यूशियस
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कुछ समय तक अंतरंगता की भूख संतुष्ट होने के बाद, अब पुरुष को स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की भूख महसूस होने लगती है।

जॉन ग्रे
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महिला को सम्मान और पुरुष को सराहना की ज़रूरत होती है।

जॉन ग्रे
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उदारता, सत्य, कृतज्ञता, संतोष, करूणा और मैत्री—ये दिव्य जीवन प्राप्त करने के श्रेष्ठ साधन है।

ज़रथुस्त्र
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मानसिक श्रेष्ठता, आम मामलों में या किन्हीं ख़ास मामलों में और चरित्र की दृढ़ता—हमेशा अपना डंका बजवाकर रहेंगी।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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जब संकट आता है, जब बम गिरते हैं या बाढ़ आती है—तभी हम मनुष्य अपने श्रेष्ठतम रूप में प्रकट होते हैं।

रुत्ख़ेर ब्रेख़्मान
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पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं, यह समझे बिना महिलाएँ बड़ी आसानी से पुरुषों की प्रतिक्रियाओं की ग़लत व्याख्या कर सकती हैं। एक आम दुविधा तब उत्पन्न होती है, जब वह कहती है 'चलो बात करते हैं,' लेकिन यह सुनते ही वह तुरंत भावनात्मक दूरी बढ़ा लेता है।

जॉन ग्रे
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मेरे काम-क्रोधादि नहीं गए, चिल्लाने से वे कभी नहीं जाते। नहीं गए कहकर ऐसा कर्म, ऐसी चिंता का अभ्यास कर लेना चाहिए, जिसमें काम-क्रोधादि की गंध भी नहीं रहे—मन जिससे उन सबको भूल जाए।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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समाज में एक बड़ी संख्या अभी भी उन व्यक्तियों की है, जो अपने मूल पशुत्व और स्वार्थ पर सभ्यता का सिर्फ़ मुलम्मा चढ़ाए हुए हैं—एक दिखावटी आवरण।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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हम पुरुषों की वर्गीय तहों के जितना नीचे जाएँगे, उतना ही पुरुषों का 'पुरुष होने का घमंड' बढ़ता दिखेगा। और यह सबसे ज्यादा उन पुरुषों में मिलेगा, जिनमें पत्नी और बच्चों को छोड़कर और किसी पर राज करने की तो हिम्मत है, योग्यता।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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जब कोई परिक्षीण अर्थात् दरिद्री होता है, तब एक पसर यव की इच्छा करता है और वही मनुष्य जब सर्वसंपन्न अर्थात् धनिक अवस्था में हो जाता है, तब पृथ्वी को तृण के समान गिनता है, इस कारण यही दोनों चंचल अवस्थाएँ; पुरुष को गुरु और लघु बनाती हैं, वस्तुओं को भी फैलाती और समेटती हैं।

भर्तृहरि
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हर एक मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे मनुष्य को इसी तरह, अर्थात् ईश्वर समझकर सोचे और उससे उसी तरह अर्थात् ईश्वर-दृष्टि से बर्ताव करे; उसे घृणा करे, उसे कलंकित करे और उसकी निंदा ही करे। किसी भी तरह से उसे हानि पहुँचाने की चेष्टा भी करे। यह केवल संन्यासी का ही नहीं, वरन् सभी नर-नारियों का कर्त्तव्य है।

स्वामी विवेकानन्द
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श्रद्धा का मूल तत्त्व है—दूसरे का महत्त्व स्वीकारना। अतः जिनकी स्वार्थबद्ध दृष्टि अपने से आगे नहीं जा सकती, अथवा अभिमान के कारण जिन्हें अपनी ही बड़ाई के अनुभव की लत लग गई है—उनकी इतनी समाई नहीं कि वे श्रद्धा ऐसे पवित्र भाव को धारण करें।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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समाज के सामने शोभा बनाने की भावना बड़ी बलवती होती है। किसी भी समय आदमी इसे नहीं भूलता कि दूसरे उसे देख रहे हैं और उनकी नज़रों में उसे जँचना चाहिए।

हरिशंकर परसाई
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मनुष्य का लक्षण ही अगर धर्मशील होना है—जैसा कि हमारे यहाँ चिंतन में गहराई से उभर कर आता है—तो मनुष्य धर्म-निरपेक्ष हो ही नहीं सकता, हाँ, वह धर्म के अनैक्य की; भिन्न क्षेत्रों की बात कर सकता है, जैसी कि की गई है। ‘सेक्यूलर’ शब्द कर्म के किसी ऐसे क्षेत्र की ओर संकेत नहीं करता, जो उस कोटि से बाहर हो, जिसे मनुष्य के लक्षण के रूप में ‘धर्म’ कहा गया है।

मुकुंद लाठ
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हमें उन पुरुषों की भावनाओं का सुराग़ भी मिल जाता है, जो स्त्रियों की समान स्वतंत्रता के नाम से चिढ़ते हैं। मेरे ख़्याल में उन्हें डर लगता है, इस बात से नहीं कि स्त्रियाँ विवाह से इन्कार कर देंगी—क्योंकि मुझे नहीं लगता कोई सचमुच ऐसा सोचेगा, बल्कि इस बात से कि वे चाहेंगी कि विवाह बराबरी की शर्तों पर तय हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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कविता सार्वभौमिक होती है। उसके भीतर वह बीज निहित रहता है, जो मानवीय स्वभाव की असंख्य संभावनाओं और कृत्यों से संबद्ध होता है।

पी. बी. शेली
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मानव-स्वभाव की कुरूपताएँ तभी तक मर्यादा में रहती हैं, जब तक उनके सामने कोई सीमा-रेखा खिंची हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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वैज्ञानिक ढंग या स्वभाव जीवन का ढंग है, या कम-से-कम उसे ऐसा होना चाहिए।

जवाहरलाल नेहरू
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जो नायक नवविवाहिता कन्या को अत्यंत लज्जावती समझकर उसकी उपेक्षा करता है, स्त्रियों के अभिप्राय को समझने वाला वह पुरुष—पशुओं के समान तिरस्कृत होता है।

वात्स्यायन
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जो आलम्बन मनुष्य जाति की सामान्य प्रकृति से संबंध नहीं रखता; आश्रय की विशेष प्रकृति या स्थिति से ही संबंध रखता है, उसके प्रति आश्रय के भाव का भागी श्रोता या पाठक, पूर्णरूप से नहीं हो सकता।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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एक व्यक्ति के महान होने के लिए उसमें तीव्र और व्यापक कल्पनाशक्ति का होना आवश्यक है, जिससे वह स्वयं को दूसरों की स्थिति में रख सके। उसे अपने समाज के सुख-दुःख को अपना ही समझने की संवेदना विकसित करनी चाहिए।

पी. बी. शेली
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मनुष्य-स्वभाव की एक और विशेषता यह है कि वह अपने को प्रकट किए बिना नहीं रह सकता। असभ्य से असभ्य जंगली लोगों से लेकर, संसार के अत्यंत सभ्य लोगों तक में—अपने विचारों और मनोभावों को प्रकट करने की प्रबल इच्छा प्रस्तुत रहती है।

श्यामसुंदर दास
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मनुष्य के कठोर, मधुर और तीक्ष्ण—दो पक्ष हैं और बराबर रहेंगे। काव्यकला की पूरी रमणीयता इन दोनों पक्षों के समन्वय के बीच, मंगल या सौंदर्य के विकास में दिखाई पड़ती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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संबंधों में पुरुषों और महिलाओं की अपनी-अपनी लय और चक्र होते हैं। पुरुष दूर जाते हैं और फिर क़रीब आते हैं, जबकि महिलाओं में ख़ुद को और दूसरों को प्रेम करने की सामर्थ्य ऊपर उठती और नीचे गिरती रहती है।

जॉन ग्रे
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यदि आपका दृष्टिकोण अच्छा है, तो प्रतिक्रिया भी अच्छी मिलेगी। अगर दृष्टिकोण ग़लत है, तो प्रतिक्रिया भी ग़लत ही मिलेगी।

जवाहरलाल नेहरू
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सत्य बोलना और सत्य के अनुसार आचरण करना स्वभाव होना चाहिए।

महात्मा गांधी
  • संबंधित विषय : सच
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दो अवसरों पर आदमी का चेहरा बहुत विकृत और हास्यस्पद होता है—प्रशंसा स्वीकार करते समय और प्रणय-निवेदन करते समय। बुद्धिमान मनुष्य इन दोनों अवसरों पर बहुत मूढ़ लगता है।

हरिशंकर परसाई
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ग्रहों और नक्षत्रों का नियंत्रण करने वाले नियमों को जान लेना बहुत अच्छा और गरिमामय है, परंतु उससे अनंत गुना अच्छा और भव्य है; उन नियमों को जानना, जिनसे मनुष्य के मनोवेग, भावनाएँ और इच्छाएँ नियंत्रित होती है।

स्वामी विवेकानन्द
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जो गोष्ठी ईर्ष्यालु लोगों से युक्त हो, जिसमें स्वतंत्र आचरण वाले हों और जिस गोष्ठी में छिद्रांवेषण करने वाले हों—इस गोष्ठी में बुद्धिमान् नागरक को नहीं जाना चाहिए।

वात्स्यायन
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इतिहास दिखाता है कि मनुष्य का स्वभाव बाहरी प्रभावों के कितने ज़्यादा नियंत्रण में है; और ठोस-से-ठोस समझा जाने वाला सामाजिक सत्य भी मौक़ा आने पर कैसे एक बिल्कुल दूसरा रंग अख़्तियार कर लेता है, पर इतिहास में भी यात्रा की तरह मनुष्य वही देखता है, जो वह देखना चाहता है। बहुत कम लोग इतिहास से सबक़ लेते हैं।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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यदि कोई एक वस्तु है, जिसका मनुष्य को सदा तथा प्रतिदिन पालन करना चाहिए, तो वह यही है कि अपने प्रति जिस व्यवहार को अच्छा समझे, दूसरों के प्रति कभी करे।

कन्फ्यूशियस
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महिला को पुरुष के सहज बोध की प्रवृत्ति को स्वीकार करना चाहिए कि वह अपनी सारी ऊर्जा एक बड़ी चीज़ पर केंद्रित करता है, और छोटी-छोटी चीज़ों को महत्त्व नहीं देता।

जॉन ग्रे
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अगर कोई मुझसे पूछे किभारतीयों के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता क्या है, तो मैं कहूँगा—मौक़े-बमौक़े अनायास परिचय बढ़ाना, आत्मीयता पैदा करना। आदमी को अपनी आत्मा में समेट लेने के लिए भारतीय कितना आतुर रहता है।

हरिशंकर परसाई
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इतिहास में कभी भी किसी गिलहरी ने; अपने साथी जीवों की समूची प्रजाति को गिनने, बंदी बनाने और नेस्तनाबूद करने की प्रेरणा महसूस नहीं की। ये अपराध अद्वितीय रूप से मनुष्य द्वारा किए जाते हैं।

रुत्ख़ेर ब्रेख़्मान
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अपना दोष जानकर भी यदि तुम उसे त्याग नहीं सकते, तो किसी भी तरह उसका समर्थन कर दूसरे का सर्वनाश करो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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भारत में तीन मनुष्य एक साथ मिलकर, पाँच मिनट के लिए भी कोई काम नहीं कर सकते। हर एक मनुष्य अधिकार प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है और अंत में संगठन की दुरवस्था हो जाती है।

स्वामी विवेकानन्द
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नवीन यौवन को देखकर विरला ही कोई महात्मा होगा, जिसको काम विकार होगा।

भर्तृहरि
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रोग भोगते वक्त व्यथा के अंदर एक नाजुक सत्य छुपा होता है—परम नम्रता का सत्य—जो आर्त्त के भक्तिभाव में रहता है, कृष्ण द्वारा उल्लिखित है।

दुर्गा भागवत
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कुछ हासिल करने की लालसा रखने वाले किसी भी आदमी के लिए, झूठ और छल का एक जाल बुनना सबसे ज़्यादा कारगर होता है।

रुत्ख़ेर ब्रेख़्मान
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कोई दो सपने एक से नहीं होते। कुछ क्षणिक होते हैं, कुछ दीर्घकालिक। देखने वाले के लिए सपने बहुत व्यक्तिगत होते हैं। विज्ञापन सपने नहीं गढ़ते; वह हममें से हर एक को जो कुछ बताते हैं, वह यह कि अभी हम ईर्ष्या के पात्र नहीं हैं, लेकिन हो सकते हैं।

जॉन बर्जर
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पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं। जब वे ख़ुद को दूर खींच लेते हैं, तो रबर बैंड की तरह उनके दूर जाने की भी एक सीमा होती है। उस सीमा पर पहुँचने के बाद, वे रबर बैंड जितनी ही तेज़ी से लौट आते हैं। पुरुषों के अंतरंगता चक्र को समझने के लिए, रबर बैंड की तुलना आदर्श है। यह चक्र है क़रीब आना, ख़ुद को दूर खींचना और फिर दोबारा क़रीब आना।

जॉन ग्रे

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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