बेइज़्ज़ती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो, तो आधी इज़्ज़त बच जाती है।
बड़ाई, पंडिताई, विवेकता और कुलीनता—ये सब मनुष्य के देह में तभी तक रहती हैं, जबतक शरीर में कामागिन नहीं प्रज्वलित होती। जब तक आदमी कामपीड़ित नहीं होता, तभी तक उसे अपने गौरव, विद्वत्ता, उच्च कुल की उत्पत्ति और सदाचार का ज्ञान रहता है।
आदमी जब बिगड़ता है तो स्वभाव से ही कुछ ऐसा है कि जब वह एक चीज़ में बिगड़ता है, तो पीछे सब चीज़ों में ही बिगड़ जाता है।
समाज के सामने शोभा बनाने की भावना बड़ी बलवती होती है। किसी भी समय आदमी इसे नहीं भूलता कि दूसरे उसे देख रहे हैं और उनकी नज़रों में उसे जँचना चाहिए।
पुरुष अगर अपनी पूरी सत्ता का इस्तेमाल करता है तो स्त्री निसंदेह कुचली जाती है, पर अगर वह भरपूर लाड़-प्यार में सत्ता स्त्री के हाथों में सौंप देता है, तो स्त्री द्वारा अधिकारों की अतिक्रमण की कोई सीमा नहीं रहती।
पतित कही जाने वाली स्त्रियों के प्रति समाज की घृणा, हाथी के दाँत के समान बाह्य प्रदर्शन के लिए हैं और उसका उपयोग स्वयं उसकी मिथ्या प्रतिष्ठा की रक्षा तक सीमित है।
हम ईश्वर को देख नहीं सकते। यदि हम ईश्वर को देखने का प्रयत्न करते हैं, तो हम ईश्वर की एक विकृत और भयानक आकृति बना डालते हैं।
एक व्यक्ति के महान होने के लिए उसमें तीव्र और व्यापक कल्पनाशक्ति का होना आवश्यक है, जिससे वह स्वयं को दूसरों की स्थिति में रख सके। उसे अपने समाज के सुख-दुःख को अपना ही समझने की संवेदना विकसित करनी चाहिए।
मनुष्य-स्वभाव की एक और विशेषता यह है कि वह अपने को प्रकट किए बिना नहीं रह सकता। असभ्य से असभ्य जंगली लोगों से लेकर, संसार के अत्यंत सभ्य लोगों तक में—अपने विचारों और मनोभावों को प्रकट करने की प्रबल इच्छा प्रस्तुत रहती है।
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मनुष्य के कठोर, मधुर और तीक्ष्ण—दो पक्ष हैं और बराबर रहेंगे। काव्यकला की पूरी रमणीयता इन दोनों पक्षों के समन्वय के बीच, मंगल या सौंदर्य के विकास में दिखाई पड़ती है।
संबंधों में पुरुषों और महिलाओं की अपनी-अपनी लय और चक्र होते हैं। पुरुष दूर जाते हैं और फिर क़रीब आते हैं, जबकि महिलाओं में ख़ुद को और दूसरों को प्रेम करने की सामर्थ्य ऊपर उठती और नीचे गिरती रहती है।
मनुष्य का लक्षण ही अगर धर्मशील होना है—जैसा कि हमारे यहाँ चिंतन में गहराई से उभर कर आता है—तो मनुष्य धर्म-निरपेक्ष हो ही नहीं सकता, हाँ, वह धर्म के अनैक्य की; भिन्न क्षेत्रों की बात कर सकता है, जैसी कि की गई है। ‘सेक्यूलर’ शब्द कर्म के किसी ऐसे क्षेत्र की ओर संकेत नहीं करता, जो उस कोटि से बाहर हो, जिसे मनुष्य के लक्षण के रूप में ‘धर्म’ कहा गया है।
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श्रद्धा का मूल तत्त्व है—दूसरे का महत्त्व स्वीकारना। अतः जिनकी स्वार्थबद्ध दृष्टि अपने से आगे नहीं जा सकती, अथवा अभिमान के कारण जिन्हें अपनी ही बड़ाई के अनुभव की लत लग गई है—उनकी इतनी समाई नहीं कि वे श्रद्धा ऐसे पवित्र भाव को धारण करें।
जब कोई परिक्षीण अर्थात् दरिद्री होता है, तब एक पसर यव की इच्छा करता है और वही मनुष्य जब सर्वसंपन्न अर्थात् धनिक अवस्था में हो जाता है, तब पृथ्वी को तृण के समान गिनता है, इस कारण यही दोनों चंचल अवस्थाएँ; पुरुष को गुरु और लघु बनाती हैं, वस्तुओं को भी फैलाती और समेटती हैं।
हर एक मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे मनुष्य को इसी तरह, अर्थात् ईश्वर समझकर सोचे और उससे उसी तरह अर्थात् ईश्वर-दृष्टि से बर्ताव करे; उसे घृणा न करे, उसे कलंकित न करे और न उसकी निंदा ही करे। किसी भी तरह से उसे हानि पहुँचाने की चेष्टा भी न करे। यह केवल संन्यासी का ही नहीं, वरन् सभी नर-नारियों का कर्त्तव्य है।
हमें उन पुरुषों की भावनाओं का सुराग़ भी मिल जाता है, जो स्त्रियों की समान स्वतंत्रता के नाम से चिढ़ते हैं। मेरे ख़्याल में उन्हें डर लगता है, इस बात से नहीं कि स्त्रियाँ विवाह से इन्कार कर देंगी—क्योंकि मुझे नहीं लगता कोई सचमुच ऐसा सोचेगा, बल्कि इस बात से कि वे चाहेंगी कि विवाह बराबरी की शर्तों पर तय हो।
कविता सार्वभौमिक होती है। उसके भीतर वह बीज निहित रहता है, जो मानवीय स्वभाव की असंख्य संभावनाओं और कृत्यों से संबद्ध होता है।
मानव-स्वभाव की कुरूपताएँ तभी तक मर्यादा में रहती हैं, जब तक उनके सामने कोई सीमा-रेखा खिंची हो।
पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं, यह समझे बिना महिलाएँ बड़ी आसानी से पुरुषों की प्रतिक्रियाओं की ग़लत व्याख्या कर सकती हैं। एक आम दुविधा तब उत्पन्न होती है, जब वह कहती है 'चलो बात करते हैं,' लेकिन यह सुनते ही वह तुरंत भावनात्मक दूरी बढ़ा लेता है।
मेरे काम-क्रोधादि नहीं गए, चिल्लाने से वे कभी नहीं जाते। नहीं गए कहकर ऐसा कर्म, ऐसी चिंता का अभ्यास कर लेना चाहिए, जिसमें काम-क्रोधादि की गंध भी नहीं रहे—मन जिससे उन सबको भूल जाए।
समाज में एक बड़ी संख्या अभी भी उन व्यक्तियों की है, जो अपने मूल पशुत्व और स्वार्थ पर सभ्यता का सिर्फ़ मुलम्मा चढ़ाए हुए हैं—एक दिखावटी आवरण।
हम पुरुषों की वर्गीय तहों के जितना नीचे जाएँगे, उतना ही पुरुषों का 'पुरुष होने का घमंड' बढ़ता दिखेगा। और यह सबसे ज्यादा उन पुरुषों में मिलेगा, जिनमें पत्नी और बच्चों को छोड़कर और किसी पर राज करने की न तो हिम्मत है, न योग्यता।
वैज्ञानिक ढंग या स्वभाव जीवन का ढंग है, या कम-से-कम उसे ऐसा होना चाहिए।
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जो नायक नवविवाहिता कन्या को अत्यंत लज्जावती समझकर उसकी उपेक्षा करता है, स्त्रियों के अभिप्राय को न समझने वाला वह पुरुष—पशुओं के समान तिरस्कृत होता है।
जो आलम्बन मनुष्य जाति की सामान्य प्रकृति से संबंध नहीं रखता; आश्रय की विशेष प्रकृति या स्थिति से ही संबंध रखता है, उसके प्रति आश्रय के भाव का भागी श्रोता या पाठक, पूर्णरूप से नहीं हो सकता।
मानवीय चरित्र की सभी कुरूपताओं के दर्शन करने हो, तो वरिष्ठ पदाधिकारियों का अपने अधीनस्थों के साथ व्यवहार देख लेना चाहिए।
चित्त की मग्नता श्वास की धीमी गति पर निर्भर करती है। भय, काम, क्रोध आदि हानिकारक भावावेगों की अवस्थाओं में, श्वास अनिवार्य रूप से तेज़ या असमान गति से चलता है।
अपनी वाणी, व्यवहार और विचारों पर ध्यान दो और यह सदा स्मरण रखो कि ईश्वर सभी जगह मौजूद है।
कुछ समय तक अंतरंगता की भूख संतुष्ट होने के बाद, अब पुरुष को स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की भूख महसूस होने लगती है।
महिला को सम्मान और पुरुष को सराहना की ज़रूरत होती है।
उदारता, सत्य, कृतज्ञता, संतोष, करूणा और मैत्री—ये दिव्य जीवन प्राप्त करने के श्रेष्ठ साधन है।
मानसिक श्रेष्ठता, आम मामलों में या किन्हीं ख़ास मामलों में और चरित्र की दृढ़ता—हमेशा अपना डंका बजवाकर रहेंगी।
जब संकट आता है, जब बम गिरते हैं या बाढ़ आती है—तभी हम मनुष्य अपने श्रेष्ठतम रूप में प्रकट होते हैं।
यदि आपका दृष्टिकोण अच्छा है, तो प्रतिक्रिया भी अच्छी मिलेगी। अगर दृष्टिकोण ग़लत है, तो प्रतिक्रिया भी ग़लत ही मिलेगी।
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सत्य बोलना और सत्य के अनुसार आचरण करना स्वभाव होना चाहिए।
अगर कोई मुझसे पूछे किभारतीयों के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता क्या है, तो मैं कहूँगा—मौक़े-बमौक़े अनायास परिचय बढ़ाना, आत्मीयता पैदा करना। आदमी को अपनी आत्मा में समेट लेने के लिए भारतीय कितना आतुर रहता है।
दो अवसरों पर आदमी का चेहरा बहुत विकृत और हास्यस्पद होता है—प्रशंसा स्वीकार करते समय और प्रणय-निवेदन करते समय। बुद्धिमान मनुष्य इन दोनों अवसरों पर बहुत मूढ़ लगता है।
कुछ हासिल करने की लालसा रखने वाले किसी भी आदमी के लिए, झूठ और छल का एक जाल बुनना सबसे ज़्यादा कारगर होता है।
इतिहास और अनुभव गवाह हैं कि बहुत संवेदनशील व्यक्ति, कर्तव्यपालन के मामले में बहुत दृढ़ होते हैं।
कोई पुरुष क्यों बात नहीं कर रहा है, इस बारे में महिलाओं में गलत मान्यताएँ व्याप्त रहती हैं। कोई हैरानी नहीं कि महिलाएँ पुरुषों से कुंठित होती हैं।
हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है।
बहुसांस्कृतिकता हमारी संस्कृति का अनिवार्य पक्ष है। यह हमारी भाषा, हमारे रहन-सहन, हमारे विश्वास का एक ज़रूरी हिस्सा है, इसलिए मेरा काम भविष्य को खुला रखने के लिए संघर्ष करने का है।
मानवीय आचरण के आम उद्देश्य ही यह तय कर देते हैं कि कोई व्यक्ति या तो ग़लत कार्यक्षेत्र में आए ही नहीं, या उसमें ज़्यादा देर टिके नहीं।
रसिक व्यक्ति को आकस्मिक रूप से, या अन्यथा देर-सवेर में यह मालूम हो ही जाता है कि सबसे अतरंग संबंध में अधिकांश लोगों के लिए महक या गंध, बहुत भारी महत्व रखती है।
स्वभाव से ही मनुष्य का मन बाहर की ओर प्रवृत्त होता है, मानो वह इंद्रियों के द्वारा शरीर के बाहर झाँकना चाहता हो।
जो दूसरे के लिए है, वह ख़राब होना ही चाहिए। जो अच्छा है वह अपना है। खोटी सुपारी पूजा में, खोटा नारियल होली में, सड़ा माल भिखारी के कटोरे में, खोटा पैसा भिखारी के हाथ में।
अपनी क्षमता को साबित करने का अवसर मिलने पर पुरुष अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को व्यक्त करता है। जब उसे महसूस होता है कि वह सफल नहीं हो सकता, तभी वह अपने पुराने स्वार्थपूर्ण तरीक़ों की ओर लौटता है।
जलती हुई आग से सुवर्ण की पहचान होती है, सदाचार से सत्य पुरुष की, व्यवहार से श्रेष्ठ पुरुष की, भय प्राप्त पर शूर की, आर्थिक कठिनाई में धीर की और कठिन आपत्ति में शत्रु एवं मित्र की परीक्षा होती है।
यदि नायिका नायक से बार-बार मिल चुकी हो, किंतु संभोग से बचना चाहती हो—उसे नीरस हृदय वाली समझना चाहिए। उससे प्रेम-संबंध विच्छेद कर देना चाहिए।
मौत के बारे में इतना सोच-विचार, शायद मनुष्यों की ही विशेषता है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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