Font by Mehr Nastaliq Web
Subhas Chandra Bose's Photo'

Subhas Chandra Bose

1897 - 1945 | کٹک

کی

5
Favorite

باعتبار

यदि मनुष्य का जन्म लेकर मैं मानवीय अस्तित्व के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकूँ, यदि मैं उसकी नियति को चरितार्थ नहीं कर सकूँ, तो उसकी सार्थकता ही क्या है?

जीवन के दो पक्ष होते हैं—बुद्धि और चरित्र इतना ही काफ़ी नहीं है कि तुम देश को केवल चरित्र अर्पित करो, तुम्हें बौद्धिक आदर्श भी देना चाहिए।

मेरी परिकल्पना और मेरी रूझान के अनुकूल, आकर्षण के केन्द्र हैं आरंभ से ही—त्यागी की वृत्ति, सादा जीवन और उच्च विचार, तथा देश-सेवा के लिए हार्दिक अनुरक्ति।

हम तभी प्रभु के लिए प्रार्थी होते हैं, जब हम कष्ट में होते हैं और तभी शायद कुछ हद तक सच्चाई से उसे याद करते हैं। लेकिन जैसे ही हमारा कष्ट दूर हो जाता है और हम बेहतर महसूस करने लगते हैं, वैसे ही हम प्रार्थना करना बंद कर देते हैं और भूल जाते हैं।

सरकार को समाप्त करने का सबसे अच्छा तरीक़ा, उससे अलग हो जाना है। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा हूँ; क्योंकि यह टॉलस्टॉय का सिद्धांत था या गांधी जी इसका प्रचार करते थे, बल्कि इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि मैं इसमें विश्वास करने लगा हूँ।

  • विषय : 1
    اور 2 مزید

शिक्षा का उद्देश्य है बुद्धि को कुशाग्रबुद्धि बनाना और विवेक-शक्ति को विकसित करना। यदि ये दोनों उद्देश्य पूर्ण हो जाते हैं, तो यह मानना चाहिए कि शिक्षा का लक्ष्य पूरा हो गया है।

मानव जीवन में नैतिक मूल्यों का महत्त्व, किसी भी अन्य चीज़ से अधिक होना चाहिए।

आज मैं देश से बाहर हूँ, देश से दूर हूँ, परंतु मन सदा वहीं रहता है और इसमें मुझे कितना आनंद अनुभव होता है।

  • विषय :
    اور 1 مزید

यदि मातृभूमि के कल्याण के लिए मुझे जीवन भर कारागार में रहना पड़े, तब भी मैं अपना क़दम पीछे नहीं हटाऊँगा।

अगर हम स्वयं आत्मत्याग से दूर भागते हैं, तो हम यह शिकायत नहीं कर सकते कि दूसरों में आत्म-त्याग की भावना नहीं है।

जो जाति एकमन होकर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की साधना में लगी रहती है, उस जाति में किसी भी तरफ़ उपयुक्त मनुष्य का अभाव नहीं होता।

  • विषय :
    اور 1 مزید

धूमधाम से क्या प्रयोजन? जिनकी हम पूजा करते हैं, उन्हें तो हृदय में स्मरण करना ही पर्याप्त है। जिस पूजा में भक्तिचंदन और प्रेमकुसुम का उपयोग किया जाए, वही पूजा जगत् में सर्वश्रेष्ठ है। आडंबर और भक्ति का क्या साथ?

  • विषय :
    اور 4 مزید

जगत् में सब कुछ क्षण-भंगुर है, केवल एक वस्तु नष्ट नहीं होती और वह वस्तु है भाव या आदर्श, हमारे आदर्श ही हमारे समाज की आशा हैं।

किताबी जानकारी से मुझे घोर वितृष्णा है। किताबी जानकारी एक बेकार चीज़ होती है; जिसका कोई महत्व नहीं होता, लेकिन कितनी शोचनीय बात है कि अनेक लोग उसी की डींग हाँकते रहते हैं।

'जो शरीर क्षण भंगुर है और जिसे अंततः मिट्टी में मिल जाना है, उसकी चिंता करने से क्या लाभ’—श्रमवीर के लिए उदासीनता का यह दृष्टिकोण अत्यंत अवांछनीय है।

त्याग, कष्ट और सहिष्णुता अपने आप में बहुत आकर्षक चीजें नहीं हैं, लेकिन मैं उनसे बच नहीं सकता, क्योंकि मेरा दृढ़ विश्वास है कि उनके बिना हमारी राष्ट्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति हरगिज़ नहीं हो सकती।

जन्म से ही हमारा पालन-पोषण आराम से और विलासिता के बीच होता है, और इसीलिए कठिनाइयों का सामना करने की हमारी क्षमता समाप्त हो जाती है—हम अपनी इच्छाओं के स्वामी नहीं बन पातें।

अगर किसी की आत्मा को सांत्वना देने और दुर्बल क्षणों में प्रेरणा का बल प्रदान करने के लिए प्रकृति हो, तो मैं सोचता हूँ कि मनुष्य जीवन में प्रसन्नता का अनुभव नहीं कर सकता।

जेल में रहते-रहते आत्मनिष्ठ सत्य एक हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो भाव और स्मृति सत्य में परिणत हो गए हैं। मेरा भी ऐसा ही हाल है। भाव ही इस समय मेरे लिए सत्य है। इसका कारण भी स्पष्ट है—एकत्व-बोध में ही शांति है।

  • विषय :
    اور 4 مزید

रामायण में जो कुछ भी है, वह कितना उदात्त है।

  • विषय :
    اور 1 مزید

भक्ति और प्रेम से मनुष्य निःस्वार्थी बन सकता है। मनुष्य के मन में जब किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा बढ़ती है तब उसी अनुपात में स्वार्थपरता घट जाती है।

  • विषय :
    اور 4 مزید

भावना के बिना चिंतन असंभव है। परंतु यदि हमारे पास केवल भावना की पूँजी है, तो चिंतन कभी भी फलदायक नहीं हो सकता।

  • विषय :
    اور 1 مزید

मनुष्य जीवन, जन्म और मृत्यु का एक अनंत चक्र है और उसका साथ यह है कि हम हरि के प्रति समर्पित हो सकें। इस समर्पण के बिना जीवन का अर्थ नहीं है।

दुःख सहन किए बिना मनुष्य कभी भी हृदय के आदर्श के साथ अभिन्नता अनुभव नहीं कर सकता और परीक्षा में पड़े बिना मनुष्य कभी भी निश्चित रूप से नहीं बता सकता कि उसके पास कितनी शक्ति है।

  • विषय :
    اور 4 مزید

काम पर विजय प्राप्त करने का प्रमुख उपाय है सब स्त्रियों को मातृरूप में देखना और स्त्रियों जैसे दुर्गा, काली, भवानी का चिंतन करना। स्त्री-मूर्ति में भगवान या गुरु का चिंतन करने से मनुष्य शनैः शनैः सब स्त्रियों में भगवान के दर्शन करना सीखता है। उस अवस्था में पहुँचने पर मनुष्य निष्काम हो जाता है। इसीलिए महाशक्ति को रूप देते समय हमारे पूर्वजों ने स्त्री मूर्ति की कल्पना की है। व्यावहारिक जीवन में सब स्त्रियों को माँ के रूप में सोचते-सोचते मन शनैः शनैः पवित्र हो जाता है।

  • विषय :
    اور 3 مزید

प्राकृतिक सौंदर्य के साथ अपने हृदय को एकाकार करना, मन को संयत करके, प्रकृति की भाषा समझने का प्रयास करना, कष्टसाध्य अवश्य है, परंतु सामान्य रूप में यदि कोई यह कर सके तो उसका हृदय आनंद से ओत-प्रोत हो जाएगा।

  • विषय :
    اور 4 مزید

किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे के जीवन दर्शन में हस्तक्षेप करे, या उसके विरुद्ध कोई बात कहे। लेकिन यह तभी संभव है, जब उस जीवन दर्शन का आधार सच्चाई और सदाशयता हो।

धर्म और देश के लिए जीवित रहना ही यथार्थ जीवन है।

मन में सुख-शांति रहने पर, बाहर का अभाव दूर होने पर भी मनुष्य सुखी नहीं हो सकता।

  • विषय : 1
    اور 2 مزید

विश्वास और निराशा के पर्वत सामने अड़ जाएँ, संपूर्ण मानव जाति की शक्ति प्रतिकूल होकर आक्रमण करे, तब भी हमारी आनंदमयी गति चिरकाल अनुरागी रहेगी।

जो अपने को दुर्बल और पापी समझता है, वह दुर्बल हो जाता है। जो हमेशा अपने को पवित्र और शक्तिमान अनुभव करता है—वह शक्तिमान और पवित्र हो जाता है। कहा भी है, ‘यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।’

सूर्य यदि संसार को आलोक से जगमगाने के लिए उदित होता है, गंध-वितरण के लिए यदि उपवन में फूल खिलते हैं, अमृतमय आह्वान के लिए यदि नदी समुद्र की ओर दौड़ी जाती है, तो हम भी यौवन का पूर्णानंद और उल्लास लेकर एक सत्य की प्रतिष्ठा के लिए संसार में आए है।

भारत जैसे देश में और विशेषकर उन परिवारों में, जहाँ रूढ़िवादी, संकीर्ण, सांप्रदायिक या जातिगत प्रभाव सर्वोपरि हैं—परिपक्वता प्राप्त करना और यहाँ तक कि उच्च विश्वविद्यालयी उपाधियाँ प्राप्त करना—वास्तव में मुक्ति प्राप्त किए बिना संभव नहीं है।

आदर्श की प्राप्ति समर्पण की पूर्णता पर निर्भर है।

  • विषय :
    اور 2 مزید

आदर्श को सामने रखे बिना जीवन में आगे बढ़ना असंभव है।

जिस व्यक्ति की सर्वाङ्गीण उन्नति नहीं होती; उसके मन को शांति प्राप्त नहीं होती, वह भीतर से सुखी नहीं होता, उसके मन में एक शून्यता, एक अभाव—आख़िर तक रह जाता है।

आशंका यह है कि समाज या देश के जीवन-स्रोतों से अपने आपको दूर हटाकर रखने से मनुष्य पथभ्रष्ट हो सकता है और उसकी प्रतिभा का एकपक्षीय विकास होने के कारण वह समाज से भिन्न अतिमानव के समान और कुछ बन सकता है। दो-चार असाधारण प्रतिभासंपन्न यथार्थ साधकों की बात तो अवश्य ही भिन्न है परंतु अधिकांश लोगों के लिए तो कर्म या लोकहित ही साधना का एक प्रधान अंग है।

  • विषय :
    اور 3 مزید

इस जीवन में हरि का नाम-स्मरण करना ही जीवन की सार्थकता है।

कार्य ही चरित्र को व्यक्त करता है।

राष्ट्र की संस्कृति का विकास रोककर विश्व की संस्कृति का पूर्ण विकास नहीं किया जा सकता।

  • विषय :
    اور 3 مزید

मनुष्य की आत्मा सत्य है, उसका जीवन सत्य है और मनुष्य के साथ मनुष्य का संबंध भी सत्य है। इस जीवन के समाप्त होने पर भी जीवन का अंत नहीं होगा, जीवन के संबंधों का अंत नहीं होगा। पार्थिव शक्ति हमें कारागार में डाल सकती है, हमारा सर्वस्व अपहरण कर सकती है, परंतु जीवन का अंत नहीं कर सकती। जीवन के पवित्र संबंधों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

जो चीज़ संसार की भलाई के लिए है, हम उसके विरूद्ध नहीं जा सकते—उससे प्रत्येक मनुष्य का हित होगा।

  • विषय :
    اور 2 مزید

हमारे विचार या आदर्श अमर होंगे, हमारे भाव जाति की स्मृति से कभी नहीं मिटेंगे, भविष्य में हमारे वंशधर की हमारी कल्पनाओं के उत्तराधिकारी बनेंगे, इस विश्वास के साथ मैं दीर्घ काल तक समस्त विपदाओं और अत्याचारों को हँसते हुए सहन कर सकूँगा।

  • विषय :
    اور 3 مزید

शिक्षक में व्यक्तित्व हो, तो किसी तरह की शिक्षा संभव नहीं हो सकती।

  • विषय :
    اور 1 مزید

अगर संघर्ष रहे, अगर किसी भी ख़तरे का सामना करना पड़े—तो जीवन का आधा स्वाद समाप्त हो जाता है।

परिचित देश देखने; अपरिचित से मिलने की जो व्याकुलता है, इसी से जाति-गठन और साम्राज्य सृष्टि होती है।

सच्चा ज्ञान तो भगवान के दर्शन से ही आता है। शेष जो कुछ है, वह ज्ञान नहीं है।

  • विषय : 1
    اور 2 مزید

हम जिस युग और विश्व में रहते हैं, उसमें हम अपनी सभी भावनाओं को पूर्णतः और बिना सोच विचार के अभिव्यक्त नहीं कर सकते। हमें उनको अपने अंदर रखना होता है।

हम माँ का स्तनपान करके बड़े होते हैं, इसलिए माँ के उपदेश और शिक्षा जितना प्रभाव डाल सकते हैं, उतना अन्य बातें नहीं।

  • विषय :
    اور 1 مزید

जो नवीन भारत की सृष्टि करना चाहते हैं, उन्हें सिर्फ देते रहना पड़ेगा, जीवन भर देते रहना पड़ेगा, अपना सर्वस्व लुटाकर कंगाल हो जाना होगा—बिना किसी प्रतिदान की इच्छा किए।

  • विषय :

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

रजिस्टर कीजिए