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पाठक पर उद्धरण

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लेखक अपनी अर्थहीन रचनाओं द्वारा और प्रकाशक अपनी अर्थ-लोलुप प्रवृत्ति द्वारा; तथा पाठक अपने पिछड़ेपन के द्वारा भी, साहित्य-सृजन के लिए प्रतिकूल परिस्थिति उत्पन्न कर देते हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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लेखक का कर्तव्य है पाठक को अपनी भाषिक संस्कृति से जोड़ना।

कुबेरनाथ राय
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सच्चे कद का पुस्तक उधार लेने वाला; अभी जिसकी हमने कल्पना की, वह पुस्तकों का चिरकालीन संग्राहक सिद्ध होता है, उस तेवर के सबब नहीं जो वह अपने उधार खजाने की सुरक्षा के लिए करता है और इसलिए भी नहीं कि वह कानून की दैनंदिन दुनिया से आते हुए हर तकाजों की अनसुनी करता जाता है, बल्कि इसलिए क्योंकि वह उन पुस्तकों को पढ़ता ही नहीं।

वाल्टर बेंजामिन
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काव्य का स्वरूप लेखक की मर्ज़ी पर नहीं, रसिक की मर्ज़ी पर ही निर्भर रहता है।

विनोबा भावे
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किसी रचना का वही भाव जो कवि के हृदय में था; यदि पाठक या श्रोता के हृदय तक पहुँच सका, तो ऐसी रचना कोई शोभा नहीं प्राप्त कर सकती—उसे एक प्रकार से व्यर्थ समझना चाहिए।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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आलोचक को दार्शनिक होना पड़ता है। ऐसे दार्शनिक आलोचकों के होने पर पाठक अनाथ हो जाता है, लेखक अनुशासनहीन हो जाते हैं।

श्याम मनोहर
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कवि की इच्छा जो रहे, रसिक अपनी रुचि का अर्थ उस काव्य में से निकाल लेता है।

विनोबा भावे
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काव्य की पूर्ण अनुभूति के लिए कल्पना का व्यापार, कवि श्रोता दोनों के लिए अनिवार्य है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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हिंदी का सजग लेखक-पाठक, निश्चित रूप से भाषाभाषी लेखकों-पाठकों की तुलना में कहीं अधिक अखिल भारतीय दृष्टि रखनेवाला होता है।

रमेशचंद्र शाह
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हमारी संस्कृति की यह तत्काल ज़रूरत है कि हम अपने आम पाठक की बौद्धिक-मानसिक दशा, अपने अँग्रेज़ी पाठक के व्यक्तित्व की बुनावट और पाठ-प्रक्रिया का अनुसंधान करें और उपायों की खोज करें।

श्याम मनोहर
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कविता का अनलिखा अर्थ और उसकी व्यापकता, कविता पर निर्भर करने के साथ-साथ कविता पढ़ने वाले के मानस की व्यापकता पर भी निर्भर करती है।

ललित कार्तिकेय
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जिन लोगों को कविता पढ़ने की तमीज़ है, वे जानते होंगे कि हर अच्छी कविता में जो लिखा हुआ है; वह हमें उस तरफ़ ले जाता है जो नहीं लिखा हुआ है, लेकिन जो उस कविता का अनिवार्य हिस्सा है।

ललित कार्तिकेय
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अच्छा साहित्य पढ़ने की और ख़रीदकर पढ़ने की आदत जब तक लोगों में नहीं आएगी, लेखक की ज़िंदगी कष्टमय रहेगी ही।

हरिशंकर परसाई
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जिस कविता का अर्थ शब्दों में ही मौजूद है और पाठक को उसे ग्रहण-भर करना होता है, वे कविताएँ कविता का उपभोक्तावाद पैदा करती हैं—पाठक को सृजनशील नहीं बनातीं।

ललित कार्तिकेय
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आलसी पाठकों से मुझे अत्यंत घृणा है।

फ़्रेडरिक नीत्शे
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साहित्य सर्वजनों के बजाए विशिष्टजनों के लिए ही हो गया, तो वह कोई साहित्य की प्रगति नहीं, संकुचितता ही मानी जाएगी।

विनोबा भावे
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जिस तरह सड़क ज़रा भी ऊँची-नीची होने से बाइसिकल (पैरगाड़ी) के सवार को दचके लगते हैं, उसी तरह कविता की सड़क यदि थोड़ी भी नाहमवार हुई, तो पढ़ने वाले के हृदय पर धक्का लगे बिना नहीं रहता।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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जब कवि की कल्पना के साथ-साथ; पाठक या श्रोता की कल्पना भी एक सुसंबद्ध प्रवाह के रूप में दूर तक चली चलती है, तभी उसके बीच पूर्ण तन्मयता की भूमि प्राप्त होती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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प्रजातंत्र में जैसे सब बराबर होते हुए, शासक वर्ग उत्तरदाई होता है, वैसे ही पाठक और लेखक बराबर होते हुए भी लेखक उत्तरदाई है—अपने पाठकों के निर्माण के लिए, उनके विचारों के लिए और उनकी रुचि के लिए।

हरिशंकर परसाई
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ऑक्टेवियो पाज़ ने कहा है कि प्रत्येक पाठक एक दूसरा कवि है।

लीलाधर जगूड़ी
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प्रत्येक मनुष्य जब पढ़ना सीखने की धृष्टता करने लगेगा तो उसको सहन करना एक ऐसी दुर्घटना होगी जिसके फलस्वरूप केवल लेखन-कला ही, बल्कि विचार-शक्ति भी अंततः विकृत और क्षीण हो जाएगी।

फ़्रेडरिक नीत्शे
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बहुत कम बच्चे इतनी हिंदी सीख पाएँगे कि वे निराला को पढ़कर ‘जागो फिर एक बार’ को अर्थ दे सकें।

कृष्ण कुमार
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रचना-प्रक्रिया का जो सर्वाधिक मूल-स्थित, सर्वाधिक प्रच्छन्न, किंतु क्रमशः प्रकट होने वाला अंश है, वह पाठक और आलोचक के लिए सर्वप्रथम है। कलाकार रचना के समय, शब्दाभिव्यक्ति के संघर्ष में, संगति और निर्वाह के संघर्ष में, भावों के उत्स को प्रातिनिधिक रूप देने के यत्न में लीन होता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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आज हिन्दी में धड़ल्ले के साथ नए-नए बढ़िया प्रकाशन और नए-नए विषय अपना रूप-रंग लेकर हज़ारों की तादाद में दिखलाई पड़ते हैं—वह इसलिए नहीं कि प्रकाशक उदार हो गया है; या उसकी रुचि परिष्कृत हो गई है, यह सब केवल इसलिये कि साहित्य का बाजार इन सबकी माँग करता है।

विजयदान देथा
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लेखक अगर अपने पाठकों से परिचित हो जाता तो निश्चय ही वह लिखना बंद कर देता। पाठक अगर एक शताब्दी और ऐसे ही बने रहे तो फिर आत्मा स्वयं ही सड़ जाएगी और वहाँ से दुर्गंध फूट निकलेगी।

फ़्रेडरिक नीत्शे
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पाठक-आलोचक के ध्यान का जो प्राथमिक केंद्र है, वह है अंतर्जगत और रचयिता के ध्यान का जो प्राथमिक केंद्र है, वह है अंतर्जगत की प्रातिनिधिक शब्दाभिव्यक्ति, कलात्मक संगति और निर्वाह।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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कविता के लिए पाठक की संवेदना और सहानुभूति उसी तरह घातक है, जिस तरह बिजली के धक्के से होश खाते आदमी को पानी पिलाना। कविता में साझेदारी ज़्यादा सही है, और हो सके तो एक आवेगहीन शब्द —शाबास!

धूमिल
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अगर मेरा अनुभव कोई प्रमाण बन सके तो कह सकता हूँ कि कोई आदमी किसी उधार पुस्तक को किसी अवसर पर लौटा ही दे मगर पढ़े शायद ही।

वाल्टर बेंजामिन
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कोहबर में दूल्हे और पाठकों की सभा में लेखक की प्रायः एक ही दशा है। दोनों ही के कान में बहुत-सी गालियाँ और दिल्लगी की आवाज़ें पड़ती हैं, जो कि उन्हें चुपचाप सहनी पड़ती हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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निबंधकार का एक मुख्य कर्तव्य होता है पाठक की मानसिक ऋद्धि और बौद्धिक क्षितिज का विस्तार करना।

कुबेरनाथ राय
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हम जब अँग्रेज़ी साहित्य पढ़ते हैं, हमारा मुख्य उद्देश्य होता है अँग्रेज़ी भाषा पर अधिकार प्राप्त करना—अर्थात् हमारा मन फूल के कीड़े की तरह है, मधुकर की तरह नहीं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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इस देश की काव्य रसिक जनता यह नहीं चाहती कि जो काम प्रबन्ध-काव्य के रचयिता करते है, वह काम उपन्यास-लेखकों के हवाले किया जाए और कविगण केवल मुक्तक लिखा करें।

रामधारी सिंह दिनकर
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संचार-प्रक्रिया की चर्चा करते समय दर्शकों-श्रोताओं-पाठकों की प्रकृति को नहीं भुलाया जा सकता।

श्यामाचरण दुबे
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पश्चिम यूरोप में जो पाठक हैं वो ज्यादा रूढ़िवादी हैं, जो पुरानी परंपराओं से आते हैं या उनसे जुड़े हुए हैं।

लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई
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एक उपन्यासकार की आदर्श पाठक की तलाश—वह चाहे राष्ट्रीय हो या अंतर्राष्ट्रीय—उपन्यासकार के अपने को उसके रूप में कल्पना करने और फिर उसे दिमाग़ में रखकर किताबें लिखने से शुरू होती है।

ओरहान पामुक
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पाठक और कवि, दोनों के लिए कविता अनुभव की प्रक्रिया का दूसरा नाम है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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