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युग पर उद्धरण

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परमत्त्व की गत्यात्मकता की बात वही कवि कह सकता है, जिसका युग वैज्ञानिक विकास के कारण अति गतिमय तथा शीघ्र-शीघ्र होने वाले परिवर्तनों से भरा हो।

नामवर सिंह
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युग-युगांतर से रति काव्यसृजन का केंद्रीय विषय रहा है।

मैनेजर पांडेय
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एक युग, साहित्यिक आंदोलन और एक रचना-प्रवृत्ति के रचनाकारों में, संवेदनशीलता के स्तर पर समानताएँ होती हैं।

मैनेजर पांडेय
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युग परिवर्तन के साथ ही व्यक्ति और समाज का मानसिक धरातल भी बदल जाता है, और पुराने विचार तथा आचार अनुपयोगी हो जाते हैं।

मैनेजर पांडेय
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मुहावरे युगों के जातीय अनुभव से बनते हैं और व्यक्ति की ज़बान पर जाते हैं। युग बदलता है तो मुहावरा बना रहता है, पर अर्थ बदल जाता है।

हरिशंकर परसाई
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प्रत्येक युग का अपना संदेश होता है। संदेशों को वही सबसे पहले सुनते हैं, जो विश्व की उन्नति की ड्योढ़ी पर अपनी सबसे अधिक बहुमूल्य वस्तु की भेंट चढ़ाते हैं।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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हर युग की अपनी नई कविता होती है और उस पुराने से उसका संबंध होता है, जिसकी अपेक्षा उसे 'नया' कहा जाता है।

कुँवर नारायण
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आधुनिक युग हर चिंतनशील प्राणी से एक नई तरह की ज़िम्मेदारी की माँग करता है, जिसका बहुत ही महत्वपूर्ण संंबध हमारे सोचने के ढंग से है।

कुँवर नारायण
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वस्तुतः हर युग का बुद्धिजीवी; अपने युग के सत्य को युग-युग के सनातन और शाश्वत सत्य के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहता है, और इसी सामान्यीकरण में उसकी बौद्धिकता निहित है।

नामवर सिंह
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युगजीवन के संदर्भों में प्राचीन जीवनमूल्यों, मान्यताओं और आदर्शों के असमर्थ, अनुपयोगी और अनावश्यक होने पर, नवीन जीवनमूल्यों और आदर्शों की स्थापना होती है।

मैनेजर पांडेय
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प्रत्येक युग का एक विशिष्ट यथार्थ-बोध होता है, जो केवल अपने युग को नई तरह सोचता-समझता, बल्कि अतीत का भी पुनर्मूल्यांकन उसी के आधार पर करता है। इसी यथार्थ-बोध पर उस युग का रचनात्मक स्वभाव (क्रिएटिव टेंपर) निर्भर करता है।

कुँवर नारायण
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आधुनिक काल का ग़रीब, दया का पात्र नहीं समझा जाता; बल्कि उसे कचरे की तरह हटा दिया जाता है। बीसवीं सदी की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में पहली ऐसी संस्कृति की निर्मिति हुई, जिसके लिए भिखारी होना—कुछ नहीं होने का तक़ाज़ा है।

जॉन बर्जर
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संवेदनशीलता युगसापेक्ष होती है।

मैनेजर पांडेय
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आविष्कार से एक क्षण में इतना विनाश हो जाता है जिसके पुनर्निर्माण में सारा युग लगता है।

विलियम कांग्रेव
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खन्ता और कुदाल से मनुष्य अनेक तरह की रेखाएँ खोदता गया। युगों के बाद युग बीत गए किंतु रूप के साथ वे सब रेखाएँ एक नहीं हो सकीं, यद्यपि रूप की देह के साथ-साथ बनी रहीं, किंतु उससे मिल नहीं पाईं।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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युग का धर्म यही है दूसरे को दी गई पीड़ा उलटकर अपने आप पर पड़ती है।

क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम
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किसी भी युग का काव्य तब ही जनमानस में उतरता है, जब वह जीवन का सांगोपांग चित्रण करता है। सृष्टि की मूल समस्या, समाज की व्यवस्था, प्रकृति, व्यक्ति, और समस्त वस्तुओं का चित्रण साहित्य का अधिकार है। इन सब का चित्रण जब भावपक्ष से सानिध्य स्थापित करता है, तब ही वह काव्य है।

रांगेय राघव
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ऐतिहासिक युग में कोई विशेष ऐतिहासिक घटना-विकास हो रहा हो, उसका ठीक-ठीक प्रतिबिंब साहित्य में उभरे ही—यह आवश्यक नहीं है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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स्कूल में हर दौर का नाम होता था। हम जिस दौर में भागे जा रहे हैं, उसे क्या नाम दें—यह सवाल समाजशास्त्रीय दृष्टि से बड़ा महत्व रखता है। सरकारी लोग और आम समाज वैज्ञानिक इसे आधुनिकीकरण का नाम देते हैं।

कृष्ण कुमार
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किसी जाति के काव्य-समूह या साहित्य के अध्ययन से; हम यह जान सकते हैं कि उस जाति या देश का मानसिक जीवन कैसा था, और वह क्रमशः किस प्रकार विकसित हुआ।

श्यामसुंदर दास
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काल की छवि, मूर्ति, कविता वह धारणतीत काल के सारे रहस्य को वहन करती है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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मनुष्य का ज्ञान कितना कालसापेक्ष और स्थितिसापेक्ष है—यह चिंतन के इतिहास से जाना जा सकता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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काल की कसौटी पर खरी उतरकर कई वस्तुएँ सुंदर के रूप में प्रशंसा पाती रहती हैं, कई वस्तुएँ इस कसौटी पर आज भी खरी उतरने के कारण असुंदर ही बनी रह गई हैं।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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यदि लेखक आज ईमानदार है, तो उसे अपने प्रति और अपने युग के प्रति अधिक उत्तरदायी होना होगा।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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किसी भी युग का काव्य अपने परिवेश से या तो द्वंद्व रूप स्थित होता है, या सामंजस्य के रूप में।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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हम जिस समाज, संस्कृति, परंपरा, युग और ऐतिहासिक आवर्त में रह रहे हैं—उन सबका प्रभाव हमारे हृदय का संस्कार करता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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प्रत्येक युग अपनी सामाजिक-ऐतिहासिक स्थिति की अनुभूत आवश्यकता के अनुसार, अपना साहित्य-निर्माण किया करता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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मनु का नाम आते ही हमें अपनी सभ्यता के उस धुँधले प्रभात का स्मरण हो जाता है; जिसमें सूर्य की उषाकालीन किरणों के प्रकाश में मानव और देव, दोनों साथ-साथ विचरते हुए दिखाई देते हैं।

वासुदेवशरण अग्रवाल
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युग-युग में नीति बदलती रहती है।

महात्मा गांधी
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काल मिथ्या है, परंतु आत्मा की सत्ता से सत्य प्रतीत होता है।

श्री पीताम्बर पंडित
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सांसरिक सभी वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं, किंतु काल का कभी नाश नहीं होता है।

भर्तृहरि
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जहाँ शब्दों से काम चल सकता था, वहाँ गोली और बम चलाने में संकोच करना इस युग का धर्म है।

कृष्ण कुमार
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जिस काल में जो गुण या विशेषत्व प्रबल रहता है, वही उस काल की प्रकृति या भाव कहलाता है।

श्यामसुंदर दास
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काल ही मनुष्यों को अर्थ और अनर्थ में, जय और पराजय में, सुख और दुःख में स्थित करता है।

वात्स्यायन
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नए युग को अत्यंत संक्षेप में बताना हो तो कहेंगे यह युग मानवता का युग है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी
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एक सभ्यता के एक भाव की परिक्रमा और आंदोलन बहुत से देशों, बहुत-सी जातियों में युगों तक होता रहा है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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युग विशिष्ट में अनुभूति की अभिव्यक्ति किसी प्रचलित प्रवृत्ति का सहारा लेती है। यह प्रवृत्ति किसी साहित्येतर आंदोलन पर आधारित हो सकती है, या किसी शुद्ध साहित्यिक प्रवृत्ति पर भी।

विश्वनाथ त्रिपाठी
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कला साहित्य और जीवन के मूल विचार—जिन से भारतीय संस्कृति पल्लवित हुई—वैदिक युग में स्फुट हुए।

वासुदेवशरण अग्रवाल
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हर युग का अपना सामूहिक पागलपन (कलेक्टिव न्यूरोसिस) होता है, जिससे निपटने के लिए एक मनोवैज्ञानिक उपचार की आवश्यकता होती है। वर्तमान युग में 'अस्तित्व संबंधी ख़ालीपन' ही सामूहिक पागलपन के रूप में सामने रहा है, जिसे शून्यवाद (निहीलिज़्म) के रूप में वर्णित किया जा सकता है।

विक्टर ई. फ्रैंकल
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शताब्दियों के संदर्भ में सोचना; जैसा कि हम करते हैं—एक तरह से कृत्रिम है क्योंकि यह डायरी की केवल एक तारीख़ है।

यू. आर. अनंतमूर्ति
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जातीय साहित्य केवल उन पुस्तकों का समूह नहीं कहलाता, जो किसी भाषा या किसी देश में विद्यमान हों। जातीय साहित्य; जाति-विशेष के मस्तिष्क की उपज और उसकी प्रकृति कि उन्नतिशील तथा क्रमगत अभिव्यंजन का फल है।

श्यामसुंदर दास
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किसी भी देश के, किसी भी युग में श्रेष्ठ साहित्यिक थोड़े ही होते हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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हम जिस युग और विश्व में रहते हैं, उसमें हम अपनी सभी भावनाओं को पूर्णतः और बिना सोच विचार के अभिव्यक्त नहीं कर सकते। हमें उनको अपने अंदर रखना होता है।

सुभाष चंद्र बोस
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किसी प्रतिभाशाली ग्रंथकार की स्थिति, अपने ही काल और अपने ही व्यक्तित्व से सीमाबद्ध नहीं होती।

श्यामसुंदर दास
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डाक के पहले के युग में इंतज़ार अकारण था और उसका प्रतिफल आकस्मिक।

कृष्ण कुमार
  • संबंधित विषय : डाक
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युग स्वयं ‘रेज़िमेंटेशन’ करता है—कभी सही ढंग से, कभी ग़लत ढंग से।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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ब्राह्मण-युग में भारत नाम की उत्पत्ति का आधार दौष्यंति भरत को कहा गया है। इन्होंने अठहत्तर अश्वमेध यज्ञ यमुना तट पर और पचपन गंगा के तट पर किए।

वासुदेवशरण अग्रवाल
  • संबंधित विषय : नदी

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