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वासना पर उद्धरण

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बड़ाई, पंडिताई, विवेकता और कुलीनता—ये सब मनुष्य के देह में तभी तक रहती हैं, जबतक शरीर में कामागिन नहीं प्रज्वलित होती। जब तक आदमी कामपीड़ित नहीं होता, तभी तक उसे अपने गौरव, विद्वत्ता, उच्च कुल की उत्पत्ति और सदाचार का ज्ञान रहता है।

भर्तृहरि
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प्रेम में कामासक्ति की मूल प्रेरणा होते हुए भी उसका अपना स्वरूप और अपना अस्तित्व है।

विजयदान देथा
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वासनात्मक अवस्था से भावात्मक अवस्था में आया हुआ राग ही अनुराग या प्रेम है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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रस सिद्धांतवाले काइयाँ आचार्य के पास जब शोध छात्राएँ आती हैं, तब वह तुलसीदास के हवाले से जानता है कि प्रभु 'उमा-रमन' के बाद ही 'करुणायतन' होते हैं।

हरिशंकर परसाई
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योगी को अधिक विलास और कठोरता—दोनों ही त्याग देने चाहिए।

स्वामी विवेकानन्द
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युग-युगांतर से रति काव्यसृजन का केंद्रीय विषय रहा है।

मैनेजर पांडेय
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कामासक्ति में केवल मैथुन की ही एकमात्र अपेक्षा रहती है और क्रिया के पश्चात भी प्रेम उत्पन्न नहीं होता, बल्कि अरुचि, ग्लानि जैसी हीन भावनाएँ पैदा होती हैं।

विजयदान देथा
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मनुष्य के जीवन में ‘काम’ के साथ ‘काम्य’ का विचार सहज हैं : हर काम को हमारा विमर्श-बोध ‘यह काम्य है या नहीं’ इस परख की कसौटी पर देखने की चाह रखता है। ‘काम्य’ में ‘श्रेयस्’ का बोध उभरता है।

मुकुंद लाठ
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वासना की सहकारिणी होकर जब कल्पना काम करती है, तभी वह काव्योचित कल्पना होती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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संसार में अधिकांश दुष्कर्म, व्यक्तिगत आसाक्ति के कारण ही किए गए हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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‘प्रेम’ को बीजभाव माननेवालों की दृष्टि; उसके मूल वासनात्मक रूप ‘राग’ की ओर रहती है, जो मनुष्य की अंतःप्रकृति में निहित रहकर संपूर्ण सजीव सृष्टि के साथ, किसी गूढ़ संबंध की अनुभूति के रूप में समय-समय पर जगा करता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जब मनुष्य संसार की समस्त वासनाओं में; यहाँ तक कि प्यार में भी निराश हो जाता है, तभी क्षण भर के लिए यह भाव स्फुरित होता है कि यह संसार भी कैसा भ्रम है, कैसा स्वप्न के समान है।

स्वामी विवेकानन्द
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जो वास्तव में ब्रह्मचारी रहते हैं—वे क्रूर, सनकी, ज़िद्दी और अमानवीय हो जाते हैं। सामान्य सेक्स-जीवन हर मनुष्य का होना चाहिए।

हरिशंकर परसाई
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जिस वासना की धरती पर कथा-लोक की जड़ है, वह धर्म की भी धरा है। कथा में भाव ही नहीं, कर्म भी होता है। बिना इतिवृत्त, चरित, या दूसरे में बिना कर्म के कथा नहीं हो सकती।

मुकुंद लाठ
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नवीन यौवन को देखकर विरला ही कोई महात्मा होगा, जिसको काम विकार होगा।

भर्तृहरि
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वासनाओं के वशीभूत होने से बढ़कर कोई पाप नहीं है, अपनी परिस्थिति से असंतुष्ट रहने से बढ़कर कोई विपत्ति नहीं है और परिग्रह के बढ़कर कोई दोष नहीं है। इसलिए संतोष की ही अंतिम रूप से सार्थकता सिद्ध होती है।

लाओत्से
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राग मिलनेवाली वासना है, और द्वेष अलग करनेवाली।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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हम जो कुछ दुःख-भोग करते हैं, वह वासना से ही उत्पन्न होता है।

स्वामी विवेकानन्द
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वासना विवेक का आधार बन सकती है; पर वह आधार अपने स्वरूप में ही व्यंजना को पालता है, अपने संकेत को ध्वनित करता है, बुद्धि की तरह परिनिष्ठित कोटियाँ नहीं बनाता, उस तरह से कसा जा सकता है।

मुकुंद लाठ
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सृष्टितत्व, गणितविद्या, रसायनशास्त्र आदि की आलोचना से काम-रिपु का दमन होता है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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वासनाओं के अभाव से शांति प्राप्त होती है।

लाओत्से
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वासना जिस तरह बाहर के अँधेरे में घुमाती है, इच्छा भी वैसे ही भीतर के अँधेरे में घुमाकर मारती है और अंत में मजूरी के समय धोखा देती है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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मनुष्य की हृदयभूमि में मोह रूपी बीज से उत्पन्न हुआ एक विचित वृक्ष है जिसका नाम है काम। क्रोध और अभिमान उसके महान स्कंध हैं। कुछ करने की इच्छा उसमें जल सींचने का पात्र है। अज्ञान उसकी जड़ है, प्रमाद ही उसे सींचने वाला जल है, दूसरे के दोष देखना उस वृक्ष का पत्ता है तथा पूर्वजन्म के किए गए पाप उसके सार भाग है। शोक उसकी शाखा, मोह और चिंता डालियाँ एवं भय उसका अँकुर है। मोह में डालने वाली तृष्णा रूपी लताएँ उसमें लिपटी हुई है।

वेदव्यास
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जिसके मन में वासना होती है, वह केवल उसी वासना के विषय में आसक्त होता है, बाक़ी सभी विषयों के प्रति वह उदासीन होता है। सिर्फ़ उदासीन ही नहीं, बल्कि निष्ठुर भी।

रवींद्रनाथ टैगोर
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स्वप्न के समान सारहीन तथा सबके द्वारा उपभोग्य कामसुख से अपने चंचल मन को रोको, क्योंकि जैसे वायु प्रेरित अग्नि की हव्य पदार्थों से तृप्ति नहीं होती, वैसे ही लोगों को कामोपभोग से कभी तृप्ति नहीं होती।

अश्वघोष
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काव्य-जगत् में आकर प्रत्येक शब्द हमारे उन भावों को जागृत करता है, जो वासना रूप में हममें निहित रहते हैं।

श्यामसुंदर दास
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जीव की जितने प्रकार की अवस्थाएँ हैं, उनमें यह ध्यानावस्था ही सर्वोच्च है। जब तक वासना रहती है, तब तक यथार्थ सुख नहीं सकता।

स्वामी विवेकानन्द
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काम के परवश होने पर भी युवती, नायक से स्वयं संभोग की इच्छा प्रकट करे। क्योंकि स्वयं अपनी ओर से संभोग में प्रवृत्त होने वाली नायिका अपने सौभाग्य को खो बैठती है, अपनी प्रतिष्ठा नष्ट कर देती है, किंतु नायक की ओर से संभोग क्रिया का प्रयोग (उपक्रम) किए जाने पर अनुकूलता तथा उत्सुकता से स्वीकार कर ले।

वात्स्यायन
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कवि को अपने कार्य में अंतःकरण की तीन वृत्तियों से काम लेना पड़ता है—कल्पना, वासना और बुद्धि। इनमें से बुद्धि का स्थान बहुत गौण है। कल्पना और वासनात्मक अनुभूति ही प्रधान है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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यदि कामातुर पुरुष अवस्था से अवस्थांतर मरणवस्थापर्यंत पहुँच जाए, तो वह उपघात अपने शरीर की रक्षा के लिए परस्त्री से संभोग कर सकता है।

वात्स्यायन
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जब तक मनुष्य में वासना बनी रहेगी, तब तक उसकी अपूर्णता स्वतः प्रमाणित होती रहेगी।

स्वामी विवेकानन्द
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फल की विशेष आसक्ति से कर्म के लाघव की वासना उत्पन्न होती है, चित्त में यही आता है कि कर्म बहुत कम या बहुत सरल करना पड़े और फल बहुत-सा मिल जाए।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जो विधवा नारी अपनी इंद्रियों की दुर्बलता के कारण कामातुर होकर, किसी गुणवान विलासी पुरुष को पति के रूप में प्राप्त कर लेती है, उसे 'पुनर्भू' नायिका कहते हैं।

वात्स्यायन
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काम अर्थात् विषय-भोगों से श्रद्धा करो तो वे ठगते हैं। प्रेम करो तो वे हानि पहुँचाते हैं। छोड़ना चाहो तो छूटते नहीं। वे कष्टप्रद शत्रु हैं।

भारवि
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द्रौपदी का पातिव्रत्य झूठा नहीं, किंतु उसकी वासनाएँ, उसकी प्रणय भावनाएँ अत्यंत स्वयंशासित थीं।

दुर्गा भागवत
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कामभोगों से कभी तृप्ति नहीं होती, जैसे जलती अग्नि की आहुतियों से तृप्ति नहीं होती। जैसे-जैसे कामसुखों में प्रवृत्ति होती जाती है, वैसे-वैसे विषय-भोगों की इच्छा बढ़ती जाती है।

अश्वघोष
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स्वभावतः सूक्ष्म होने के कारण, अत्यंत लोभ के कारण, स्वभाव से अज्ञानी होने के कारण—स्त्रियों की काम-भावना को समझना बड़ा कठिन है।

वात्स्यायन
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यौवन सुख केवल अतृप्त लालसाओं के सिवाय और कुछ नहीं है। सच्चे सुख का समय केवल बाल्य अवस्था है।

बालकृष्ण भट्ट
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वासना का लक्ष्य जैसे बाहर के विषय होते हैं, इच्छा का लक्ष्य वैसे ही भीतरी प्रयोजन होते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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सत्काव्य की रचना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में प्रवीणता, कलाओं में प्रवीणता, आनंद यश प्रदान करती है।

भामह
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भय और अपूर्ण वासना ही समस्त दुःखों का मूल है।

स्वामी विवेकानन्द
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काम से पीड़ित लोग जड़-चेतन पदार्थों के संबंध में स्वभावतः विवेकशून्य हो जाया करते हैं।

कालिदास
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रामकृष्ण हमेशा कहते थे कि सोना और कामवासना, आध्यात्मिक विकास के मार्ग में दो सबसे बड़ी बाधाएँ हैं और मैंने उनके शब्दों को अक्षरशः सत्य माना।

सुभाष चंद्र बोस
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प्रेम का संबंध काम प्रवृत्ति से इतना नहीं जितना समाज में प्रचलित काम-संबंधों से है।

विजयदान देथा
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काम का मोह-बाधा में क्षीण, काम के अत्याचार से या जैसा चाहता है वैसा नहीं पाने पर घृणा, विच्छेद में भूल, मनुष्य को कापुरूष एवं मूढ़ बना देता है। भोग में ही है तृप्ति एवं विषाद, चिरदिन नहीं रहता—परिवर्त्तनीय है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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भोग ही प्रेम का एकमात्र लक्षण नहीं है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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वासना मानव के रूप में हममें निहित एक जगत्-बोध है, जिसका प्रकाश साहित्य में, विशेषकर कथा-साहित्य में हम पा सकते हैं। यह बोध मानव-प्रवृत्ति की ओर उन्मुख ऐसा बोध है, जो हमारे भाव और कर्म के औचित्य को एक अपनी सी दिशा देता है।

मुकुंद लाठ
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बाधाप्राप्त काम ही है क्रोध, और क्रोध ही है हिंसा का बंधु।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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काम-क्रोध से तपस्या भंग हो जाती है, तपस्या का फल क्षण-भर में नष्ट हो जाता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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लोभ, पाप एवं झूठ, ये तीनों ही अपने नायब कामवासना को बुलाकर उसकी सलाह लेते हैं। सभी मिल-बैठकर बुरे दाव-पेंच सोचते हैं।

गुरु नानक

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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