यौवन पर उद्धरण
यौवन या जवानी बाल्यावस्था
के बाद की अवस्था है, जिसे जीवनकाल का आरंभिक उत्कर्ष माना जाता है। इसे बल, साहस, उमंग, निर्भीकता के प्रतीक रूप में देखा जाता है। प्रस्तुत चयन में यौवन पर बल रखती काव्य-अभिव्यक्तियों को शामिल किया गया है।
नवीन यौवन को देखकर विरला ही कोई महात्मा होगा, जिसको काम विकार न होगा।
नदी, नाव और निभृत एकांत—युवा प्रेमियों को भला और क्या चाहिए।
यौवन—जब वह आरंभ होता है, उस समय सभी कुछ रहस्यमय जान पड़ता है।
अभी में अल्पायु बाला थी। दम भर में ही पूर्ण-यौवना बनी। अभी मैं चलती-फिरती थी और अभी जलकर राख बन गई।
बिजली की तरह क्षणिक क्या है? धन, यौवन और आयु।
पूर्ण यौवन में ही स्त्री और पुरुष दोनों आकर्षण के केंद्र होते हैं। युवक पुरुष पर ही स्त्रियाँ रीझती हैं और पूर्ण युवती स्त्रियों पर पुरुष रीझते हैं। युवावस्था में ही सौंदर्य का निखार होता है, काम की वृद्धि होती है।
बाल्यकाल, नवयौवन और तारुण्य के विभिन्न उषःकालों में; जिज्ञासा हृदय का छोर खींचती हुई, आकर्षण के सुदूर ध्रुव-बिंदुओं में हमें जोड़ देती है।
हमारी नीरस शिक्षा में जीवन का बहुमूल्य समय व्यर्थ हो जाता है। हम बाल्यवस्था से कैशोर्य में और कैशोर्य से यौवन में प्रवेश करते हैं—शुष्क ज्ञान का बोझ लेकर।
यौवन सुख केवल अतृप्त लालसाओं के सिवाय और कुछ नहीं है। सच्चे सुख का समय केवल बाल्य अवस्था है।
प्रीति की परिपूर्ति के लिए चिरयौवन अपेक्षित होता है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere