साहित्य में बुढ़ापा सफ़ेद बालों या झुर्रियों का नाम नहीं है। साहित्य में बुढ़ापे का अर्थ है—नवीन चेतना ग्रहण करने की शक्ति का लोप। अपनी मान्यताओं और मूल्यों को बदलने की भीरुता, आज के बदले विगत कल में ही जीने का मोह, प्रतिभा का शैथिल्य—यह सब न हो, तो साहित्य में बूढ़ा आदमी परिपक्व कहलाता है।
सबसे पहली कमी तो हमारे उपन्यासों में चिंतन और वैचारिकता की ही है।
एक फ़ालतू विचार कोई विचार नहीं होता।
दार्शनिक वह जिसके पास दर्शन (विजन) हो—प्रोफेटिक विजन, प्रोफेटिक टच के साथ।
किताबें यह बताती हैं कि मनुष्य के मौलिक विचार उतने नए नहीं होते, जितना वह समझता है।
समाज में जब कोई प्रबल, संक्रामक भावना जाग उठती है तो वह किसी वेष्टन को नहीं मानती।
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सच्ची मित्रता के नियम इस सूत्र में अभिव्यक्त हैं- आने वाले अतिथि का स्वागत करो और जाने वाले अतिथि को जल्दी विदा करो।
जब मैं भाषा के माध्यम से विचार करता हूँ तो मौखिक अभिव्यक्तियों के अतिरिक्त मेरे मन में कोई दूसरे ‘अर्थ’ नहीं होते : भाषा तो स्वयं ही विचार की वाहक होती है।
जीवन के बारे में सभी विचार कठोर हैं, क्योंकि जीवन कठोर है। मैं इस बात से दुखी हूँ, लेकिन इसे बदल नहीं सकती।
अगर मुझे इसे स्वीकार करना चुनना पड़े, तो मेरा लक्ष्य यह है कि मैं वास्तव में जो हूँ उसे स्वीकार कर लूँ। मैं अपने विचारों, अपने रंग-रूप, अपने गुणों, अपनी ख़ामियों पर गर्व कर सकूँ, और इस हमेशा की चिंता को रोक सकूँ कि मैं जैसी हूँ, मुझसे उसी रूप में प्यार नहीं किया जा सकता है।
भाषा एक बात है और वाणी दूसरी। साहित्य का संबंध वाणी से आता है। मनुष्य की वाणी जितनी विकसित होगी, उतना उसका जीवन विकसित होगा। कुल जीवन का आधार वाणी है।
जब विद्वान लोगों में सत्या-असत्य का निश्चय नहीं होता; तभी अविद्वानों को महाअंधकार में पड़ कर बहुत दुःख उठाना पड़ता है, इसलिए सत्य के जय और असत्य के क्षय के अर्थ-मित्रता से वाद वा लेख करना, हमारी मनुष्यजाति का मुख्य काम है। यदि ऐसा न हो तो मनुष्यों की उन्नति कभी न हो।
इस संसार में बिना प्रतिरोध, बिना हिंसा और बिना इच्छा के कोई रह ही नहीं सकता। अभी संसार उस अवस्था में नहीं पहुँचा कि ये आदर्श, समाज में प्राप्त किए जा सकें।
एक कवि में अगर दूर तक सोच सकने की ताक़त नहीं; तो उसकी कविता या तो यथार्थ की सतह को खरोंचकर रह जाएगी, या किसी भी आदर्श से चिपककर।
मनुष्य-स्वभाव की एक और विशेषता यह है कि वह अपने को प्रकट किए बिना नहीं रह सकता। असभ्य से असभ्य जंगली लोगों से लेकर, संसार के अत्यंत सभ्य लोगों तक में—अपने विचारों और मनोभावों को प्रकट करने की प्रबल इच्छा प्रस्तुत रहती है।
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आपके वर्तमान विचार आपके भावी जीवन का निर्माण कर रहे हैं। आप जिसके बारे में सबसे ज़्यादा सोचते हैं या जिस पर सबसे ज़्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं, वह आपकी ज़िंदगी में प्रकट हो जाएगा।
समय, गति, परिवर्तन, आत्मा, मन, रचनाशीलता आदि की प्रकृति को विज्ञान जब भी समझने चलता है, तो उसकी विचार-पद्धति और भाषा चल को अचल में बदल देती है—जबकि रचना-शक्ति एक निरंतर प्रवाहित ऊर्जा है।
हिंदी की सेवा का अर्थ है, उस मानव-समाज की सेवा, जिसके विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम हिंदी है। मनुष्य ही बड़ी चीज़ है, भाषा उसी की सेवा के लिए है। साहित्य-सृष्टि का भी यही अर्थ है।
विचार ही हमारी कार्य-प्रवृत्ति का नियामक है। मन को सर्वोच्च विचारों से भर लो; दिन पर दिन यही सब भाव सुनते रहो, मास पर मास इसी का चिंतन करो।
मेरे लेखन का कोई वाक्य ही कभी-कभार विचार को आगे की ओर बढ़ाता है; बाक़ी वाक्य तो नाई की क़ैंची के समान हैं जिसे वह लगातार इसलिए चलाता रहता है, जिससे सही क्षण पर वह बाल काट सके।
स्त्रियों को सरकार के विचार-विमर्श में बिना किसी प्रत्यक्ष हिस्सेदारी के मनमाने ढंग से शासित किए जाने के बजाय उनके प्रतिनिधि सरकार में होने चाहिए।
हम सिर्फ़ उस व्यक्ति से ईर्ष्या कर सकते हैं जिसके पास ऐसा कुछ है जिसे हमारे विचार से हमारे पास होना चाहिए।
‘गहरी’ और कच्ची नींद में भेद की तरह ही गहरे और उथले विचारों में भेद होता है।
मेरे विचार से लेखक वह है, जिसकी दिलचस्पी हर चीज़ में है।
पुरुषों के प्रति स्त्रियों का हृदय, प्रायः विषम और प्रतिकूल रहता है। जब लोग कहते हैं कि वे एक आँख से रोती हैं तो दूसरी से हँसती हैं, तब कोई भूल नहीं करते। हाँ, यह बात दूसरी है कि पुरुषों के इस विचार में व्यंग्यपूर्ण दृष्टिकोण का अंश है।
हर ख़याल कविता नहीं है, लेकिन ख़याल तो है।
विचार के साथ और विचार के बिना बोलने की तुलना संगीत को विचार के साथ, और विचार के बिना बजाने से ही करनी चाहिए।
कोई विचार ख़तरनाक नहीं है, सोचना ख़ुद में ही ख़तरनाक है।
मैं नर्क की तुलना में पुनर्जन्म में विश्वास करती हूँ। अगर लौटने का विकल्प हो, तब पुनर्जन्म का विचार और भी अधिक सहनीय हो जाता है।
किसी चीज़ को बदलने के लिए बस अपने भीतर जाएँ और अपने विचारों तथा भावनाओं से एक नया सुखद संकेत भेजें।
हमें नायकों की खोज में नहीं रहना चाहिए। हमें अच्छे विचारों की खोज में रहना चाहिए।
ऐसी किसी भी व्यवस्था में; समालोचना या समीक्षा का वैज्ञानिक और नैतिक विकास न हो पाना स्वाभाविक है, जहाँ विचार प्रकट करने की पूरी छूट न हो।
कोई भी क्रांतिकारी विचारक केवल इस कारण कवि नहीं होता कि वह नवीन चिंतन करता है, या उसके शब्द सत्य की गहन झलक प्रस्तुत करते हैं; बल्कि इसलिए भी कि उसकी भाषा में एक सहज लय विद्यमान होती है, जो शाश्वत संगीत की प्रतिध्वनि-सी प्रतीत होती है।
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हमें सत्य को स्वीकार करना चाहिए, भले ही वह हमें हैरान कर दे और हमारे विचारों को बदल दे।
प्रारंभिक विचारकों ने देखा था कि वे केंद्र से जितनी दूर जाते हैं, वैचित्र्य और विभिन्नताएँ उतनी ही अधिक होती जाती हैं, और वे केंद्र के जितने निकट आते हैं, उतने ही वे एकत्व के निकट आते हैं।
हमारे देश के लोगों में न विचार है, न गुणग्राहकता। इसके विपरीत एक सहस्त्र वर्ष के दासत्व के स्वाभाविक परिणामस्वरूप; उनमें भीषण ईर्ष्या है और उनकी प्रकृति संदेहशील है, जिसके कारण वे प्रत्येक नए विचार का विरोध करते हैं।
समय केवल एक विचार है। हमारे पास केवल सत्य है। आप जो सोचते हैं, वह प्रकट हो जाता है। अगर आप समय कहें, तो यह समय है।
आत्मभ्रांति के समान कोई रोग नहीं है। सद्गुरु के समान कोई वैद्य नहीं है। सद्गुरु की आज्ञा के समान कोई उपचार नहीं हैं। विचार और ध्यान के समान कोई औषधि नहीं है।
विचार मंच की स्थापना दो तरह से होती हैं : कोई विचारक हो तो उसके नाम से विचार मंच इसलिए बनता है, ताकि उसके विचारों के आधार पर उसके अनुयायी विचार करेंगे। दूसरे कोई विचारहीन हो; लेकिन दूसरे कारणों से मशहूर हो, तो इसलिए विचार मंच की स्थापना होती है कि उसने तो विचार नहीं किया, मगर बाक़ी लोग विचार करें।
आमूल-परिवर्तनवादी कभी आत्मपरकतावादी नहीं होता।
लखनऊ विचारकों का नहीं—स्वप्न-द्रष्टाओं का नगर है।
काव्य में कवि, अनुभूति और विचार के विभिन्न तत्त्वों में अंतर्सामंजस्य स्थापित कर उसे अभिव्यक्ति करता है।
आपका जीवन कभी वैसे नहीं रहा जैसा आप सोचते हैं, और यह अच्छी बात नहीं है। केवल वे विचार ही मूल्यवान हैं जिन्हें हम वास्तव में जीते हैं।
ब्रह्मांड से अपनी मनचाही चीज़ माँगने का मतलब, इस बारे में स्पष्ट होना है कि आप क्या चाहते हैं। अगर आपके दिमाग़ में स्पष्ट तस्वीर है, तो आपने माँग लिया है।
आप अपने विचारों और आकर्षण के नियम द्वारा अपने जीवन का सृजन कर सकते हैं।
कर्ता की एकता और अन्विति ही वह तत्व है, जो सातत्य को बनाता है।
आकर्षण का नियम नैसर्गिक नियम है। यह निष्पक्ष है और अच्छी या बुरी चीज़ों में भेद नहीं करता है। यह आपके विचारों को आपके जीवन में साकार कर देता है।
एक लेखक के सही मूल्यांकन के लिए ज़रूरी है कि हम युग के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर उसके विचार जान सकें, उस बुनियादी दृष्टिकोण को समझ सकें—जिस पर वास्तव में एक व्यक्ति का मूल्य निर्भर करता है।
चाहे स्वदेश हो या विदेश, इस मूर्ख संसार की प्रत्येक आवश्यकता पूरी करने की अपेक्षा; तथा निम्नतम स्तर का असार जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा, मैं सहस्त्र बार मरना अधिक अच्छा समझता हूँ।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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