नफ़रत पर उद्धरण
नफ़रत या घृणा वीभत्स
रस का स्थायी भाव है। इसे चित् की खिन्नता की स्थिति के रूप में चिह्नित किया जाता है। इस चयन में नफ़रत के मनोभाव पर विचार-अवकाश लेती कविताओं का संकलन किया गया है।
हम विचारों के स्तर पर जिससे घृणा करते हैं, भावनाओं के स्तर पर उसी से प्यार करते हैं।
पुराने लेखक आग्रह-रूपी शास्त्रों से, नयों का वध करने का प्रयत्न करते ही रहते हैं।
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महान विचारकों के लिए दुनिया की जाँच करना, उसे समझाना और नफ़रत करना ज़रूरी हो सकता है। लेकिन मुझे लगता है कि दुनिया से प्यार करना ही सबसे महत्वपूर्ण है।
मैं जब तक जीवित रहूँगा, उनकी नक़ल नहीं करूँगा या उनसे अलग होने के लिए ख़ुद से नफ़रत नहीं करूँगा।
इस संसार में बिना प्रतिरोध, बिना हिंसा और बिना इच्छा के कोई रह ही नहीं सकता। अभी संसार उस अवस्था में नहीं पहुँचा कि ये आदर्श, समाज में प्राप्त किए जा सकें।
वीरता से आगे बढ़ो। एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य-जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे।
यदि देश का प्रत्येक शिक्षित युवक, ऊँच-नीच के घृणित विचारों को छोड़कर; अपने आस-पास रहने वाले चार बालकों अथवा बालिकाओं को भी प्रतिवर्ष अशिक्षित से शिक्षित बना देने का संकल्प कर लेवे, तो परिणाम अत्यंत उत्साहवर्द्धक हो।
ऐसे व्यक्ति से नफ़रत करना बहुत थका देता है जिससे आप प्रेम करते हैं।
हम अपने हृदय को साफ़ करें, गंदी चीज़ को पसंद न करें। गंदी चीज़ को पढ़ना छोड़ दें। अगर ऐसा करेंगे तो अख़बार अपना सच्चा धर्म पालन करेंगे।
ग़लत नज़रिया होने पर शुरुआत में जो संस्कृति अच्छी चीज़ होती है; वो न केवल गतिहीन हो जाती है, बल्कि आक्रामक व कभी-कभी संघर्ष और घृणा का बीज बो देती है।
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हमारे देश में साम्प्रदायिक द्वेष की जड़ मध्ययुग का इतिहास है, जो अर्द्धसत्य और ग़लत नज़रिए से प्रचारित किया जाता है और पढ़ाया जाता है।
कोई दो सपने एक से नहीं होते। कुछ क्षणिक होते हैं, कुछ दीर्घकालिक। देखने वाले के लिए सपने बहुत व्यक्तिगत होते हैं। विज्ञापन सपने नहीं गढ़ते; वह हममें से हर एक को जो कुछ बताते हैं, वह यह कि अभी हम ईर्ष्या के पात्र नहीं हैं, लेकिन हो सकते हैं।
ईश्वर, मैं तुमसे नफ़रत करता हूँ। मैं तुमसे इस तरह नफ़रत करता हूँ, मानो तुम सच में मौजूद हो।
मनुष्य एक सीमा तक किसी के उत्कर्ष से ईर्ष्या करता है, उसके परे वह उसके लिए श्रद्धा की वस्तु बन जाता है। और मनुष्य जिसे महान मानता है, उसकी महानता में तनिक भी धक्का लगना वह सहन नहीं कर सकता।
जो गोष्ठी ईर्ष्यालु लोगों से युक्त हो, जिसमें स्वतंत्र आचरण वाले हों और जिस गोष्ठी में छिद्रांवेषण करने वाले हों—इस गोष्ठी में बुद्धिमान् नागरक को नहीं जाना चाहिए।
मातृत्व की गरिमा से गुरु और पत्नीत्व के सौभाग्य से ऐश्वर्यशालिनी होकर भी, भारतीय नारी अपने व्यावहारिक जीवन में सबसे अधिक क्षुद्र और रंक कैसे रह सकी, यही आश्चर्य है।
जो स्वयं प्राणियों की हिंसा करता है, दूसरो से हिंसा कराता है और हिंसा करने वालों का अनुमोदन करता है, वह संसार में अपने लिए बैर ही बढ़ाता है।
हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है।
तहसीलदार को डिप्टी कमिश्नर होते देखकर अगर कलेजे से ठँडी साँस निकल जाती है, तो तुरंत नौकरी कर लेना चाहिए—साहित्य रचना वश की बात नहीं है। जो बेलाग ज़िंदगी जी सकते हैं, उनसे ही कुछ नए की उम्मीद कर सकते हैं।
कोई मनुष्य, कोई जाति, दूसरों से घृणा करते हुए जी ही नहीं सकती।
एक ख़ास क़िस्म के मरीज़ भी होते हैं, जिन्हें निज का कोई दु:ख नहीं होता, पर जो इसलिए दुखी हैं कि वे देखते हैं दूसरे सुखी हैं—इनका मर्ज़ ला-इलाज़ है।
जो अपने से अधिक आशा करता है और दूसरों से कम, वह किसी की घृणा का शिकार नहीं होता।
हिंदी का कवि; हिंदी वालों से नफ़रत करने की हद तक चिढ़ता हो, तो अपने लिए मुसीबत ही मोल ले सकता है।
अगर आप किसी व्यक्ति से नफ़रत करते हैं, तो आप उसमें उस चीज़ से नफ़रत करते हैं जो आपके ख़ुद का हिस्सा है। जो हमारे हिस्से का नहीं है वह हमें परेशान नहीं करता।
नफ़रत की वजह कल्पना का न होना है।
राग मिलनेवाली वासना है, और द्वेष अलग करनेवाली।
जो कमज़ोर होता है वही सदा रोष करता है और द्वेष करता है। हाथी चींटी से द्वेष नहीं करता। चींटी, चींटी से द्वेष करती है।
भारत के भाग्य का निपटारा उसी दिन हो चुका, जब उसने इस (म्लेच्छ) शब्द का आविष्कार किया और दूसरों से अपना नाता तोड़ दिया।
विरोध, वाक्पटुत्व, प्राणीमात्र से छल, उपहास, मर्मस्पर्शी संभाषण, आवेगयुक्त संभाषण, निंदा आदि जो आज कौशल्य माना जाता हैं, उन्हें ज्ञानदेव ने वाणी के अवगुण कहे हैं।
रस और स्पर्श अकेले घृणा नहीं उत्पन्न कर सकते।
परनिंदा करना ही है, दूसरे के दोष को बटोर कर स्वयं कलंकित होना और दूसरे की सुख्याति करने के अभ्यास से, अपना स्वभाव अज्ञात भाव से अच्छा हो जाता है।
घृणा तिरस्कृत लोग नहीं, तिरस्कार करने वाले फैलाते हैं।
गन्ना चूसना हो तो अपने खेत को छोड़कर बग़ल के खेत से तोड़ता है और दूसरों से कहता है कि देखो, मेरे खेत में कितनी चोरी हो रही है। वह ग़लत नहीं कहता है क्योंकि जिस तरह उसके खेत की बग़ल में किसी दूसरे का खेत है, उसी तरह और के खेत की बग़ल में उसका खेत है और दूसरे की संपत्ति के लिए सभी के मन में सहज प्रेम की भावना है।
अहिंसा केवल आचरण का स्थूल नियम नहीं है, बल्कि यह मन की वृत्ति है। जिस वृत्ति में कहीं भी द्वेष की गंध तक नहीं रहती उसका नाम अहिंसा है।
रवि की तरह कवि को भी सब जगह बिना घृणा के जाने, रहने और सहने का तजुर्बा और साहस होना चाहिए। लाचारी और मजूबरीवश ऐसा होना कवि की अयोग्यता है। सोच-समझकर, जान-बूझकर, जिज्ञासु भाव से ऐसा हो, तो वह अपने कवि के निर्माण में बेहतर सहायक हो सकता है।
हर व्यक्ति को आत्मप्रेम होता है इसलिए उसकी पाशविक वृत्ति, अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए दूसरों से झगड़ा करने के लिए प्रेरित करती रहती है।
वे सब, जिन्हें समाज घृणा की दृष्टि से देखता है, अपनी शक्तियों को एकत्र करें तो इन महाप्रभुओं और उच्च वंशाभिमानियों का अभिमान चूर कर सकते हैं।
तुम्हारी नज़र यदि दूसरे का केवल 'कु' ही देखे, तो तुम कभी भी किसी को प्यार नहीं कर सकते। और जो सत् नहीं देख सकता, वह कभी भी सत् नहीं होता।
यदि तुम अपने हृदय से ईर्ष्या और घृणा का भाव चारों ओर बाहर भेजो, तो वह चक्रवृद्धि ब्याज सहित तुम पर आकर गिरेगा।
हमको हमारा धर्म नहीं सिखाता है कि हम किसी से वैर करें।
द्वेष से किसमें दोष नहीं आ जाता? प्रेम से किसकी उन्नति नहीं होती? अभिमान से किसका पतन नहीं हो सकता? नम्रता से किसकी उन्नति नहीं हो सकती?
तुम झूठ से शायद घृणा करते हो, मैं भी करता हूँ; परंतु जो समाजव्यवस्था झूठ को प्रश्रय देने के लिए ही तैयार की गई हैं, उसे मानकर अगर कोई कल्याण-कार्य करना चाहो, तो तुम्हें झूठ का ही आश्रय लेना पड़ेगा।
प्रेम का अभाव भी एक मात्रा में विद्वेष का ही एक रूप है, क्योंकि प्रेम चेतना का पूर्ण रूप है।
कपट व्यक्ति दूसरे से सुख्याति की आशा में अपने आप से प्रवचंना करता है, अल्प विश्वास के कारण दूसरे के प्रकृत दान से भी प्रवंचित होता है।
यह संसार है ही ऐसा। जब एक दुःखी होता है, तभी दूसरा सुखी होता है। जब एक को नुक़सान होता है, तभी दूसरे को फ़ायदा होता है। जब एक हारता है, तभी दूसरा जीतता है। एक का दुर्भाग्य, दूसरे का सौभाग्य होता है। भगवान ने ऐसी सृष्टि क्यों बनाई?
यह दुनिया लंबे समय तक शांतिपूर्वक नहीं रह सकती, अगर इसके आधे लोग ग़ुलाम बनाकर रखे जाएँ और उनसे घृणा की जाए।
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संबंधित विषय : जवाहरलाल नेहरूऔर 2 अन्य
जो मनुष्य स्वार्थ-प्रधान व अहंकारी होता है, वह अन्य सब वस्तुओं का हीनतम् मूल्यांकन करता है।
माशूक़ वह बला है, जिसमें कोई ख़ामी नज़र नहीं आती, जिससे प्यार के बदले प्यार नहीं माँगा जाता, जो हाड़-माँस का होकर भी अशरीरी होता है, जिसकी हर ख़ता माफ़ होती है, हर ज़ुल्म पोशीदा।
शिक्षा पकिस्तान में भारत के प्रति संदेह और घृणा फैलाने का साधन बनी रही है।
अति डाह में घना दुःख है, मन, वचन, कर्म—तीनों हो जाते है भ्रष्ट।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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