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गाँव पर उद्धरण

महात्मा गांधी ने कहा

था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में कविता के लिए गाँव एक नॉस्टेल्जिया की तरह उभरता है जिसने अब भी हमारे सुकून की उन चीज़ों को सहेज रखा है जिन्हें हम खोते जा रहे हैं।

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दिन-रात गर्द के बवंडर उड़ाती हुई जीपों की मार्फ़त इतना तो तय हो चुका है कि हिंदुस्तान, जो अब शहरों ही में बसा था, गाँवों में भी फैलने लगा है।

श्रीलाल शुक्ल
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किसान को—जैसा कि ‘गोदान’ पढ़नेवाले और दो बीघा ज़मीन' जैसी फ़िल्में देखनेवाले पहले से ही जानते हैं—ज़मीन ज़्यादा प्यारी होती है। यही नहीं, उसे अपनी ज़मीन के मुक़ाबले दूसरे की ज़मीन बहुत प्यारी होती है और वह मौक़ा मिलते ही अपने पड़ोसी के खेत के प्रति लालायित हो उठता है। निश्चय ही इसके पीछे साम्राज्यवादी विस्तार की नहीं, सहज प्रेम की भावना है जिसके सहारे वह बैठता अपने खेत की मेड़ पर है, पर जानवर अपने पड़ोसी के खेत में चराता है।

श्रीलाल शुक्ल
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एक निरी कामकाजी दृष्टि के द्वारा एक कामकाजी व्यक्ति को खेत, कृषि-विज्ञान और नीतिशास्त्र की किताबों के पन्नों की तरह दिखाई देते हैं, खेतों की हरियाली किस तरह से गाँव के कोने तक फैल गई है—उसे भावुक ही देखता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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नयी कविता के आधुनिकतावादी वातावरण में त्रिलोचन की कविता महानगर में बसे-बचे गाँव की तरह है।

मैनेजर पांडेय
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ठेठ गाँव के आदमी के लिए; शहर का आदमी लगभग सत्ता पक्ष का आदमी होता है, और लगातार एक ख़ास तरह के संदेह के दायरे में रहता है।

केदारनाथ सिंह
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चमार, मोची वग़ैरा के धंधे देहात में ही चलने चाहिए, और ये सभी धंधे किसान या ग्रामवासी के सहायक उद्योग हो सकते है।

महात्मा गांधी
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किसी भी सामान्य शहराती की तरह उसकी भी आस्था थी कि शहर की दवा और देहात की हवा बराबर होती है।

श्रीलाल शुक्ल
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शहर में चायघर, कमेटी-रूम, पुस्तकालय और विधानसभा की जो उपयोगिता है, वही देहात में सड़क के किनारे बनी हुई पुलिया की है।

श्रीलाल शुक्ल
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गाँव रचनाशीलता की एकमात्र कसौटी है—ऐसा मानना एक अतिवाद है, और हर अतिवाद की तरह इससे भी बचना चाहिए।

केदारनाथ सिंह
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गन्ना चूसना हो तो अपने खेत को छोड़कर बग़ल के खेत से तोड़ता है और दूसरों से कहता है कि देखो, मेरे खेत में कितनी चोरी हो रही है। वह ग़लत नहीं कहता है क्योंकि जिस तरह उसके खेत की बग़ल में किसी दूसरे का खेत है, उसी तरह और के खेत की बग़ल में उसका खेत है और दूसरे की संपत्ति के लिए सभी के मन में सहज प्रेम की भावना है।

श्रीलाल शुक्ल
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हिंदुस्तान का जीवन देहातों के जरिए ही है।

महात्मा गांधी
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घाघ की लोकोक्तियों में सुख की चरमसीमा यही है कि घर पर पत्नी घी से मिली हुई दाल को तिरछी निगाहों से देखते हुए परोस दे। ऐसी स्थिति में गाँव का आदमी जब बाहर निकलता है तो पहला कारण तो यही समझना चाहिए कि संभवतः वहाँ दाल-रोटी का साथ छूट चुका है, तिरछी निगाहें टेढ़ी निगाहों में बदल गई हैं।

श्रीलाल शुक्ल
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आप अपना गाँव छोड़िए, हज़ारों गाँव स्वागत के लिए तत्पर मिलेंगे। एक मित्र और बंधु की जगह हज़ारों बंधुबांधव आपके आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप एकाकी नहीं हैं।

राहुल सांकृत्यायन
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जो स्वाद कुल्हड़ में जमे दही में है, वही स्वाद लकड़ी की आग से बने खाने में है। किंतु हम नगरवासियों के नसीब में यह सुख नहीं। वह घोंसला ही क्या जिसमें पंछी हो, वह खाना ही क्या जिसमें स्वाद हो।

अमृतलाल वेगड़
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जो ग्राम-समुदाय था, जो गाँव था—वह अपने-आपमें स्वतः सम्पूर्ण हुआ करता था। समाज धर्म द्वारा अनुशासित होता था और धर्म एक आचार-संहिता का नाम था, जिसमें कुछ नियम स्थानीय थे और कुछ सार्वदेशिक।

नामवर सिंह
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देहाती जीवन में तो बहुत कुछ ख़ूबसूरती भरी है।

महात्मा गांधी
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चर्षणी स्त्रियों के साथ पीसने, कूटने, पकाने के समय, धान आदि को कोठे से निकालने के समय, घर की सफ़ाई करने, खेतों में काम करने, कपास तथा ऊन निकालने, अतसी, सन, मूंज निकालने, काते हुए सूत को लाने, वस्तुओं के क्रय-विक्रय करने तथा अदला-बदली करने के समय संभोग के अवसर निकाले जा सकते हैं।

वात्स्यायन
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शहर देहातियों को चूसने के लिए है।

महात्मा गांधी
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अशुभ है गँवई पहचान को मारकर गाँवों की शोभा बढ़ाना, संवेदना से छूँछ होकर समृद्धि का दंभ ढ़ोना।

कृष्ण बिहारी मिश्र
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रूखा-सूखा खाकर, ठंडा पानी पीकर घर पर संतोष से पड़े रहना ही वास्तव में आदर्श ग्रामीण दर्शन है।

श्रीलाल शुक्ल
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गाँव के गँवईपन में भी एक तरह की शोभन सभ्यता है यह शहरी गँवई बहुत कुत्सित है।

आशापूर्णा देवी
  • संबंधित विषय : शहर
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गाँव से भागती अन्नपूर्णा और मनीषा की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण के चरित्र का आह्वान जरूरी है।

कृष्ण बिहारी मिश्र
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प्रतिभाएँ, साधारणतया, गाँवों में जन्म लेती हैं, महानगरों में आकर विकास पाती हैं और एक पीढ़ी के बाद फिर नष्ट हो जाती हैं, क्योंकि जाति की असली ऊर्जा का निवास महानगरों में नहीं होता। महानगर वह स्थान है जहाँ शक्ति और प्रतिभा की दुकान चलाई जाती है, ये शक्तियाँ वहाँ पैदा नहीं होतीं।

रामधारी सिंह दिनकर
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सड़क रघुवीर सहाय के साहित्य का शायद सबसे चैतन्य जगत है—जिस तरह उनके समकालीनों के लिए प्रकृति, गाँव या प्राचीन आख्यान थे।

कृष्ण कुमार
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जिस गाँव में गुण-अवगुण को सुनने समझने वाला कोई नहीं है और जहाँ अराजकता फैली हुई है, हे राजिया! वहाँ रहना कठिन है।

कृपाराम खिड़िया
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कुछ साल पहले देहात के लोग अपने रोजमर्रा कि इस्तेमाल की चीज़ें तो ख़ुद बना लेते ही थे, छोटे कस्बों के रहने वाले भी अपने रोज के काम की बहुत-सी चीज़ों के लिए उनके ही मुहताज थे।

महात्मा गांधी
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गाँव की बिरहिनियों के लिए पत्र पत्र नहीं, जो पढ़कर फेंक दिया जाता है, अपने प्यारे परदेसी के प्राण हैं, देह से मूल्यवान। उनमें देह की कठोरता नहीं, कलुषता नहीं, आत्मा की आकुलता और अनुराग हैं।

प्रेमचंद
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भला नगर के होते हुए रत्न की परख गाँव में की जाती है?

कालिदास

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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