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कविता का एक मतलब यह भी है कि आप आज तक और अब तक कितना आदमी हो सके।
कविता आदमी को मार देती है। और जिसमें आदमी बच गया है, वह अच्छा कवि नहीं है।
छायावाद के कवि शब्दों को तोलकर रखते थे, प्रयोगवाद के कवि शब्दों को टटोल कर रखते थे, नई कविता के कवि शब्दों को गोलकर रखते थे—सन् साठ के बाद के कवि शब्दों को खोल कर रखते हैं।
एक वर्ग ऐसा रहा है, जो आदमी को हमेशा इस्तेमाल करता रहा है। पहले वह फ़िंक्शन के जरिए उसे एक्स्प्लायट करता था। उस के बाद फ़ेथ (विश्वास) के जरिये इस्तेमाल करता रहा, और अब फ़ैक्ट (तथ्य) के नाम पर इस्तेमाल कर रहा है।
आदमी का 'विट' और कविता में विट—दो अलग-अलग चीज़ें हैं। 'कविता में विट' उस नाथ की तरह है, जिसके जरिये बैल को एक रस्सी के सहारे, हलवाहा का नन्हा एकलौता भी खेत पहुँचा आता है।
आदमी की दुविधा, तनाव, पीड़ा, अभाव का समसामयिक अर्थ-संदर्भ—मुक्ति-बोध की कविता को समकालीन बनाता है।
त्रिलोचन अपनी कविता में 'एक खड़ी पाई' है।
कविता रसोई-घर से लेकर; परनाले तक फैले हुए परिवार की भाषा में हो, तभी वह हिंदुस्तानी परिवेश की कविता होगी।
मुक्तिबोध की भाषा किसी पुराने पोख़्ता खंडहर की दीवार सरीख़ी है। भारी, बुलंद किंतु प्रतिध्वनि से हीन, किंतु जहाँ कहीं उस पोख़्ता और उबाऊ और प्रतिध्वनि-हीन भाषा में, पत्थर-सी बेजान भाषा में, आज के आदमी की बातचीत की भाषा आ गई है, वहीं से लगता है ईंटें जगह-जगह गल गई है और दीवारों में झिर्रियाँ बन गई है, जिन से घने अँधेरे में भी प्रकाश झर रहा है और यही उसकी बुनियादी सहजता है—यह प्रकाश ही अर्थ है।
अपने यहाँ समकालीनता और आधुनिकता का सवाल उठाना, न तो समसामयिक है और न आधुनिक। क्योंकि यहाँ समकालीनता और आधुनिकता; सामाजिक स्तर पर सामूहिक जीवन के एक ही बिंदु पर, एक ही साथ और एक ही समय में अंकित होती है—उनके लिए अलग-अलग काल या व्यक्ति चुन पाना संभव नहीं हो सकता है।
कविता आदमी को कुछ नहीं देगी, सिवा उस तनाव के जो बातचीत के दौरान दो चेहरों के बीच तन जाता है। इन दिनों एक ख़तरा और बढ़ गया है कि ज़्यादातर लोग कविता को चमत्कार के आगे समझने लगे हैं। इस स्थिति में सहज होना जितना कठिन है, सामान्य होने का ख़तरा उतना बल्कि उस से कहीं ज़्यादा है।
आज कविता गुंजाइश नहीं, एक जोख़िम है।
भाषा में शब्दों का ट्रिक कामयाब होने पर कविता, और असफल होने पर चमत्कार बनता है। रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा की अधिकांश कविताएँ ऐसा ही चमत्कार है।
किसी लेखक की किताब उसके लिए एक ऐसी सुरंग है; जिसका एक सिरा रचना की लहलहाती फूलों भरी घाटी में खुलता है, बशर्ते कि वह (लेखक) उससे (सुरंग के अंधकार से) उबरकर बाहर आ सके।
एक आदमी झूठ होता है। सही की पुष्टि के लिए समूह का जीवन चुना जाना, एक ठोस सबूत है।
राजकमल चौधरी की कविताओं में (विशेषतः मुक्ति प्रसंग) परिवेश तो समसामयिक है, किंतु उन का आवेग काफ़ी रूमानी है। होता यह है कि उस की रचनाएँ एक अजीब क़िस्म का मानसिक संघात पैदा करती है। कभी-कभी वे प्रसाद की छायावादी स्थितियों का छायाभास होती है।
गृहस्थी चलाने के लिए समझदारी की नोक तोड़ देनी चाहिए। आख़िरकार यह मान कर चलना चाहिए कि इस ज़माने में संबंध सिर्फ़ वे ही निभा सकते हैं, जो मूर्ख हैं।
रूप, रंग और अर्थ के स्तर पर आज़ाद रहने की, सामने बैठे आदमी की गिरफ़्त में आने की एक तड़प, एक आवश्यक और समझदार इच्छा; जो आदमी को आदमी से जोड़ती है, मगर आदमी को दूसरे आदमी की जेब में या जूते में नहीं डालती, स्वतंत्रता की तीव्र इच्छा और उसके लिए पहल तथा उस पहल के समर्थन में लिखा गया साहित्य ही—सम-कालीन साहित्य है।
आधुनिकता स्थिति नहीं, प्रक्रिया है। आधुनिकता आपकी इस बात पर निर्भर है कि आप दूसरे को कितना मुक्त रखते हैं।
आधुनिकता वह है जिस पर अतीत अपना दावा न कर सके।
एक वकील इस साजिश में रहता है कि वह गवाह को ज़बान के ज़रिए उस जगह लगा दे, जहाँ वह अपनी मंजूर की गई बात के ख़िलाफ़ दिखलाई पड़ता रहे।
किसान को बैल की मौत बूढ़े बाप से ज़्यादा अखरती है।
जनतंत्र में सबसे बड़ा डर जनता है। आप जनता से डरते हैं। कृपया अपने जनतंत्र में अपनी जनता को भी साझीदार बनाइए।
केदारनाथ सिंह ने कोई नई भाषा नहीं दी, सिर्फ़ नए लोगों (कवियों) की चुनी हुई भाषा के क्रम में आ गए हैं।
कविता के लिए पाठक की संवेदना और सहानुभूति उसी तरह घातक है, जिस तरह बिजली के धक्के से होश खाते आदमी को पानी पिलाना। कविता में साझेदारी ज़्यादा सही है, और हो सके तो एक आवेगहीन शब्द —शाबास!
महावत अपने यहाँ नौकरी नहीं, एक पेशा है। महावत, अक्सर मुसहर होता है और जब हाथी मरता है, मौत महावत की भी होती है क्योंकि हाथी उसके लिए जानवर नहीं, घर होता है।
अज्ञेय की प्रेमिकाएँ अज्ञेय की प्यास हैं, उनका कोई आकार नहीं है। वे समाज में नहीं मिलेंगी। वे लेखक के मन की प्रतिमाएँ हैं।
नागार्जुन की कविता हाथ-ही-हाथ है, और चेहरा जहाँ है भी—हाथ के कमाल के नीचे है।
इस ज़माने में संबंध सिर्फ़ वे ही निभा सकते हैं जो मूर्ख हैं।
कहीं भी आग लगना बुरा है, मगर यह उत्साह पैदा करता है। आग आदमी को आवाज़ देकर सामने कर देती है।