जहाँ सीधे प्रमाण नहीं मिलते, वहाँ दर्शन हावी हो जाता है।
दार्शनिक वह जिसके पास दर्शन (विजन) हो—प्रोफेटिक विजन, प्रोफेटिक टच के साथ।
मूलतत्त्व की बहुविध कल्पना, मीमांसा और दर्शन—भारतीय संस्कृति और साहित्य का व्यापक सत्य है।
केवल हिंदुस्तान में दर्शन संगीत के रूप में कहा गया। जब दर्शन और संगीत का जोड़ हो जाए तो मज़ा ही आएगा।
किसी विशुद्ध ‘बकवास’ को प्रदर्शित करना, और बोध के द्वारा भाषा की सीमाओं से सिर फोड़ने से आई चोटों को दिखाना दर्शन के परिणाम हैं। इन चोटों से हमें खोज की महत्ता पता चलती है।
यह जीवन आता और जाता है—नाम, यश, भोग, यह सब थोड़े दिन के हैं। संसारी कीड़े की तरह मरने से अच्छा है, कहीं अधिक अच्छा है—कर्तव्य क्षेत्र में सत्य का उपदेश देते हुए मरना। आगे बढ़ो।
साहित्य में आध्यात्मिक भावबोध या उसकी ज़रूरत का अहसास, दर्शन को अनुभूति के भीतर चरितार्थ करके या दर्शन को अनुभूति में घुलाकर ही संभव और कृतिकार्य हो सकता है।
प्रकृति की भौतिक वास्तविकता को नकार देने पर वैज्ञानिक शोध निरर्थक हो जाता है।
दर्शन का वास्तविक विषय मृत्यु है। सच्चा दार्शनिक मृत्यु के लिए इच्छुक रहता है, क्योंकि दार्शनिक ज्ञान चाहता है और इस शरीर में रहते हुए सच्चे ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्महत्या करने से हमें मुक्ति मिल सकती है। आत्महत्या से तो जिस ईश्वर ने हमें शरीर-रूपी कारागार में डाला है, उसके नियमों का उल्लंघन होगा। ज्ञान-प्राप्ति की दृष्टि से मृत्यु का स्वागत करो।
सब जीवों में ब्रह्मदर्शन ही मनुष्य का आदर्श है।
जायसी की दृष्टि में मानव-जीवन का सच्चा मार्गदर्शन प्रेम है, धार्मिक कट्टरता नहीं।
भारतवर्ष में जितने वेदमतानुयायी दर्शनशास्त्र हैं, उन सबका एक ही लक्ष्य है और वह है—पूर्णता प्राप्त करके आत्मा को मुक्त कर लेना। इसका उपाय है योग। 'योग' शब्द बहुभावव्यापी है। सांख्य और वेदांत उभय मत, किसी न किसी प्रकार से योग का समर्थन करते हैं।
हे भगवान! दार्शनिक को सभी व्यक्तियों की आँखों के सामने रखी वस्तुओं को देखने की अंतर्दृष्टि प्रदान कर।
सकारात्मक दृष्टि से मेरे सामजिक दर्शन को तीन शब्दों में समेटा जा सकता है : मुक्ति, समानता और भाईचारा।
जिसके साथ हमारा सामान्य परिचय मात्र होता है, वह हमारे पास भले बैठा रहे; किंतु उसके और हमारे बीच समुद्र जैसा व्यवधान बना रहता है, वह होता है अचैतन्य का समुद्र, उदासीनता का समुद्र।
किसी बेहूदा जासूसी कहानी में कही गई बात किसी बेहूदा दार्शनिक द्वारा कही जाने वाली बात से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और स्पष्ट होती है।
दीखने में जो होता है, प्रकट होता है; उससे न दीखने में जो होता है, वह बहुत बड़ा होता है। साहित्य दीखता नहीं। उसका जितना सूक्ष्म चिंतन करेंगे, उतना वह हमें व्यापक दर्शन देगा।
कोई आवश्यक नहीं कि मनुष्य उत्तम कवि व दार्शनिक हो, पर यह उसका प्रधान कर्तव्य है कि वह सात्विकशील हो।
विश्व का रहस्यवादी विचार दर्शन का खंडन है। वह दर्शन को समाप्त करता और विश्वास को पुनर्जीवित करता है।
सभी धर्म, निम्नतम मूर्तिपूजा से लेकर उच्चतम निरपेक्षता तक, मानव आत्मा द्वारा अनंत को समझने और अनुभव करने के अनेक प्रयास मात्र हैं।
अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को ही देखो : इसमें मानसिक घटनाएँ बाहर की भौतिक घटनाओं की तुलना में कितनी अधिक हैं। यह अंतर्जगत् प्रबल वेगशील है और इसका कार्यक्षेत्र भी कितना विस्तृत है—इंद्रिय-ग्राह्य व्यापार इसकी तुलना में बिल्कुल अल्प है।
मनुष्य ही लाया है ग्रंथ को ग्रंथ नहीं लाया किसी मनुष्य को!
दर्शन का कार्य एक समग्र के रूप में अस्तित्व की व्याख्या करना है।
यह जगत् सदा ही भले और बुरे का मिश्रण है। जहाँ भलाई देखो, समझ लो कि उसके पीछे बुराई भी छिपी है।
यदि दर्शन और बुद्धि का उपयोग मनुष्यों की समानता की घोषणा करने के लिए किया जाता है, तो उनका उपयोग मनुष्यों के विनाश को उचित ठहराने के लिए भी किया जाता है।
दर्शन की आधारभूत समस्या ब्रह्मांड के रहस्य को, मात्र वैज्ञानिक ज्ञान की मदद से ही समझा जा सकता है।
प्रतिक्रियावादी दर्शन में पुरातन के लिए वफ़ादारी, पराश्रयी व्यवस्था, भ्रष्ट सामाजिक संस्थानों और अलोकतांत्रिक भावनाओं के प्रति वफ़ादारी; राष्ट्रवादी नेता को वहाँ पहुँचा देते हैं, जहाँ वे तरह-तरह के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं।
नारी के सच्चे रूप का दर्शन कितनी बड़ी दुर्लभ वस्तु है, इस बात को जगत के अधिकांश लोग जानते ही नहीं।
हर कला का कार्य अलग होता है। रूप उसके विषय, दर्शन और चिंतन से निकलता है।
अद्वैत-वेदांत ही आध्यात्मिक सत्य का सब से सहज और सरल रूप है।
कारणता का कार्यव्यापार, कारण-कार्य की एक अटूट शृंखला में घटनाओं का उत्तरोतर होना—काल के संवर्ग को हमारी समझ की परिधि में ला देता है।
दरिद्रनारायण के दर्शन करने हों, तो किसानों के झोंपड़ों में जाओ।
जिसकी अनुभूति जितनी है, उसका दर्शन, ज्ञान भी उतना है और ज्ञान में ही है विश्वास की दृढ़ता।
आधुनिक वैज्ञानिक दर्शन, किसी भी तरह द्वैतवादी सिद्धांत के निश्चित रूप से विरुद्ध है।
धार्मिक मनुष्य का कभी भी अशुभ नहीं हो सकता, ईश्वर उसकी रक्षा करता है।
जो भाव विरुद्ध भाव द्वारा आहत या अभिभूत नहीं होता, वही है विश्वास। विश्वास नहीं रहने पर दर्शन कैसे होगा?
अनुमान और आगमन अनुभव के ही अंश हैं
वेदांत तुम्हारे कर्म-फल के लिए क्षुद्र देवताओं को उत्तरदायी नहीं बनाता; वह कहता है, तुम स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हो। तुम अपने ही कर्म से अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फल भोग रहे हो, तुम अपने ही हाथों से अपनी आँखें मूँदकर कहते हो—अंधकार है। हाथ हटा लो—प्रकाश दीख पड़ेगा। तुम ज्योतिस्वरूप हो, तुम पहले से ही सिद्ध हो।
वेदांत में वैराग्य का अर्थ है—जगत् को ब्रह्मरूप देखना। जगत् को हम जिस भाव से देखते हैं, उसे हम जैसा जानते हैं, वह जैसा हमारे सम्मुख प्रतिभात होता है—उसका त्याग करना और उसके वास्तविक स्वरूप को पहचानना।
वेदांत कहता है, इसी प्रकार कार्य करो—सभी वस्तुओं में ईश्वर-बुद्धि करो; समझो कि ईश्वर सब में है, अपने जीवन को भी ईश्वर से अनुप्राणित, यहाँ तक कि ईश्वररूप ही समझो।
जब तक भविष्यकथन हो सकते हैं और घटनाएँ लगभग उसी प्रकार घटित होती हैं, तब तक भौतिक नियतत्ववाद का सिद्धांत खरा रहेगा।
वेदांत सभी धर्मों में सर्वाधिक साहसी था (और है)। सत्य का अन्वेषण करते हुए वह रुका कहीं भी नहीं।
वेदांत यह नहीं कहता कि स्वर्णपत्र से घाव को ढाँके रखो और घाव जितना ही पकता जाए, उसे और भी स्वर्ण पत्रों से मढ़ दो।
दर्शन धर्म से पुराना है। वह उतना ही पुराना है, जितना प्राज्ञ मानव।
दर्शनशास्त्र के मत में एक ऐसा आनंद है, जो निरपेक्ष और अपरिणामी है। वह आनंद हमारे ऐहिक सुखोपभोग के समान नहीं है, तो भी वेदांत प्रमाणित करता है कि इस जगत् में जो कुछ आनंदकारी है; वह उसी यथार्थ आनंद का अंश मात्र है, क्योंकि एकमात्र उस आनंद का ही वास्तविक अस्तित्व है।
वेदांत-दर्शन का एक मात्र विषय है—एकत्व की खोज।
मैं तो यह बिल्कुल नहीं मानता कि संसार में अद्वैत-तत्त्व के प्रचार से दुर्नीति या दुर्बलता बढ़ेगी, बल्कि मुझे इस बात पर अधिक विश्वास है कि दुर्नीति और दुर्बलता के निवारण की वही एकमात्र औषधि है।
प्रामाणिक चिंतन न तो मनुष्य को अमूर्त समझता है, न विश्व को मनुष्यों से रहित समझता है।
किसी दार्शनिक उद्देश्य की पूर्ति करने तक धर्म भी एक बौद्धिक और नैतिक आवश्यकता है।
"विचारों को छोड़ों और निर्विचार हो रहो, पक्षों को छोड़ो और निष्पक्ष हो जाओ—क्योंकि इसी भाँति
वह प्रकाश उपलब्ध होता है, जो कि सत्य को उद्घाटित करता है।’’
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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