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दर्शन पर उद्धरण

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जहाँ सीधे प्रमाण नहीं मिलते, वहाँ दर्शन हावी हो जाता है।

भगत सिंह
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दार्शनिक वह जिसके पास दर्शन (विजन) हो—प्रोफेटिक विजन, प्रोफेटिक टच के साथ।

आशीष नंदी
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मूलतत्त्व की बहुविध कल्पना, मीमांसा और दर्शन—भारतीय संस्कृति और साहित्य का व्यापक सत्य है।

वासुदेवशरण अग्रवाल
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किसी विशुद्ध ‘बकवास’ को प्रदर्शित करना, और बोध के द्वारा भाषा की सीमाओं से सिर फोड़ने से आई चोटों को दिखाना दर्शन के परिणाम हैं। इन चोटों से हमें खोज की महत्ता पता चलती है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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केवल हिंदुस्तान में दर्शन संगीत के रूप में कहा गया। जब दर्शन और संगीत का जोड़ हो जाए तो मज़ा ही आएगा।

राममनोहर लोहिया
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यह जीवन आता और जाता है—नाम, यश, भोग, यह सब थोड़े दिन के हैं। संसारी कीड़े की तरह मरने से अच्छा है, कहीं अधिक अच्छा है—कर्तव्य क्षेत्र में सत्य का उपदेश देते हुए मरना। आगे बढ़ो।

स्वामी विवेकानन्द
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साहित्य में आध्यात्मिक भावबोध या उसकी ज़रूरत का अहसास, दर्शन को अनुभूति के भीतर चरितार्थ करके या दर्शन को अनुभूति में घुलाकर ही संभव और कृतिकार्य हो सकता है।

रमेशचंद्र शाह
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दर्शन का वास्तविक विषय मृत्यु है। सच्चा दार्शनिक मृत्यु के लिए इच्छुक रहता है, क्योंकि दार्शनिक ज्ञान चाहता है और इस शरीर में रहते हुए सच्चे ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्महत्या करने से हमें मुक्ति मिल सकती है। आत्महत्या से तो जिस ईश्वर ने हमें शरीर-रूपी कारागार में डाला है, उसके नियमों का उल्लंघन होगा। ज्ञान-प्राप्ति की दृष्टि से मृत्यु का स्वागत करो।

सुकरात
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सब जीवों में ब्रह्मदर्शन ही मनुष्य का आदर्श है।

स्वामी विवेकानन्द
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जायसी की दृष्टि में मानव-जीवन का सच्चा मार्गदर्शन प्रेम है, धार्मिक कट्टरता नहीं।

मैनेजर पांडेय
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भारतवर्ष में जितने वेदमतानुयायी दर्शनशास्त्र हैं, उन सबका एक ही लक्ष्य है और वह है—पूर्णता प्राप्त करके आत्मा को मुक्त कर लेना। इसका उपाय है योग। 'योग' शब्द बहुभावव्यापी है। सांख्य और वेदांत उभय मत, किसी किसी प्रकार से योग का समर्थन करते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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हे भगवान! दार्शनिक को सभी व्यक्तियों की आँखों के सामने रखी वस्तुओं को देखने की अंतर्दृष्टि प्रदान कर।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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सकारात्मक दृष्टि से मेरे सामजिक दर्शन को तीन शब्दों में समेटा जा सकता है : मुक्ति, समानता और भाईचारा।

भीमराव आंबेडकर
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दीखने में जो होता है, प्रकट होता है; उससे दीखने में जो होता है, वह बहुत बड़ा होता है। साहित्य दीखता नहीं। उसका जितना सूक्ष्म चिंतन करेंगे, उतना वह हमें व्यापक दर्शन देगा।

विनोबा भावे
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किसी बेहूदा जासूसी कहानी में कही गई बात किसी बेहूदा दार्शनिक द्वारा कही जाने वाली बात से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और स्पष्ट होती है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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कोई आवश्यक नहीं कि मनुष्य उत्तम कवि दार्शनिक हो, पर यह उसका प्रधान कर्तव्य है कि वह सात्विकशील हो।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जिसके साथ हमारा सामान्य परिचय मात्र होता है, वह हमारे पास भले बैठा रहे; किंतु उसके और हमारे बीच समुद्र जैसा व्यवधान बना रहता है, वह होता है अचैतन्य का समुद्र, उदासीनता का समुद्र।

रवींद्रनाथ टैगोर
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नारी के सच्चे रूप का दर्शन कितनी बड़ी दुर्लभ वस्तु है, इस बात को जगत के अधिकांश लोग जानते ही नहीं।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय
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सभी धर्म, निम्नतम मूर्तिपूजा से लेकर उच्चतम निरपेक्षता तक, मानव आत्मा द्वारा अनंत को समझने और अनुभव करने के अनेक प्रयास मात्र हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को ही देखो : इसमें मानसिक घटनाएँ बाहर की भौतिक घटनाओं की तुलना में कितनी अधिक हैं। यह अंतर्जगत् प्रबल वेगशील है और इसका कार्यक्षेत्र भी कितना विस्तृत है—इंद्रिय-ग्राह्य व्यापार इसकी तुलना में बिल्कुल अल्प है।

स्वामी विवेकानन्द
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यह जगत् सदा ही भले और बुरे का मिश्रण है। जहाँ भलाई देखो, समझ लो कि उसके पीछे बुराई भी छिपी है।

स्वामी विवेकानन्द
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यदि दर्शन और बुद्धि का उपयोग मनुष्यों की समानता की घोषणा करने के लिए किया जाता है, तो उनका उपयोग मनुष्यों के विनाश को उचित ठहराने के लिए भी किया जाता है।

फ्रांत्ज़ फ़ैनन
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अद्वैत-वेदांत ही आध्यात्मिक सत्य का सब से सहज और सरल रूप है।

स्वामी विवेकानन्द
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जो भाव विरुद्ध भाव द्वारा आहत या अभिभूत नहीं होता, वही है विश्वास। विश्वास नहीं रहने पर दर्शन कैसे होगा?

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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धार्मिक मनुष्य का कभी भी अशुभ नहीं हो सकता, ईश्वर उसकी रक्षा करता है।

सुकरात
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वेदांत तुम्हारे कर्म-फल के लिए क्षुद्र देवताओं को उत्तरदायी नहीं बनाता; वह कहता है, तुम स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हो। तुम अपने ही कर्म से अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फल भोग रहे हो, तुम अपने ही हाथों से अपनी आँखें मूँदकर कहते हो—अंधकार है। हाथ हटा लो—प्रकाश दीख पड़ेगा। तुम ज्योतिस्वरूप हो, तुम पहले से ही सिद्ध हो।

स्वामी विवेकानन्द
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हर कला का कार्य अलग होता है। रूप उसके विषय, दर्शन और चिंतन से निकलता है।

ऋत्विक घटक
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दरिद्रनारायण के दर्शन करने हों, तो किसानों के झोंपड़ों में जाओ।

सरदार वल्लभ भाई पटेल
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जिसकी अनुभूति जितनी है, उसका दर्शन, ज्ञान भी उतना है और ज्ञान में ही है विश्वास की दृढ़ता।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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वेदांत में वैराग्य का अर्थ है—जगत् को ब्रह्मरूप देखना। जगत् को हम जिस भाव से देखते हैं, उसे हम जैसा जानते हैं, वह जैसा हमारे सम्मुख प्रतिभात होता है—उसका त्याग करना और उसके वास्तविक स्वरूप को पहचानना।

स्वामी विवेकानन्द
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वेदांत कहता है, इसी प्रकार कार्य करो—सभी वस्तुओं में ईश्वर-बुद्धि करो; समझो कि ईश्वर सब में है, अपने जीवन को भी ईश्वर से अनुप्राणित, यहाँ तक कि ईश्वररूप ही समझो।

स्वामी विवेकानन्द
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वेदांत यह नहीं कहता कि स्वर्णपत्र से घाव को ढाँके रखो और घाव जितना ही पकता जाए, उसे और भी स्वर्ण पत्रों से मढ़ दो।

स्वामी विवेकानन्द
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वेदांत सभी धर्मों में सर्वाधिक साहसी था (और है)। सत्य का अन्वेषण करते हुए वह रुका कहीं भी नहीं।

स्वामी विवेकानन्द
  • संबंधित विषय : सच
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दर्शनशास्त्र के मत में एक ऐसा आनंद है, जो निरपेक्ष और अपरिणामी है। वह आनंद हमारे ऐहिक सुखोपभोग के समान नहीं है, तो भी वेदांत प्रमाणित करता है कि इस जगत् में जो कुछ आनंदकारी है; वह उसी यथार्थ आनंद का अंश मात्र है, क्योंकि एकमात्र उस आनंद का ही वास्तविक अस्तित्व है।

स्वामी विवेकानन्द
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मंत्र नाम है विचार का। जैसा 'राजमंत्री' अर्थात् राजकर्मो का विचार करने वाला कहाता है, वैसा मंत्र अर्थात् विचार से सब सृष्टि के पदार्थों का प्रथम ज्ञान और पश्चात् किया करने से, अनेक प्रकार के पदार्थ और क्रियाकौशल उत्पन्न होते हैं।

दयानंद सरस्वती
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समस्त उपनिषदों का केंद्रीय भाव—साक्षात्कार या अपरोक्षानुभूति ही है।

स्वामी विवेकानन्द
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भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार सारा जगत् दो पदार्थों से निर्मित है। उनमें से एक का नाम है आकाश। यह आकाश एक सर्वव्यापी, सर्वानुस्यूत सत्ता है। जिस किसी वस्तु का आकार है; जो कोई वस्तु कुछ वस्तुओं के मिश्रण से बनी है, वह इस आकाश से ही उत्पन्न हुई है। यह आकाश ही वायु में परिणत होता है; यही तरल पदार्थ का रूप धारण करता है, यही फिर ठोस आकार को प्राप्त होता है।'

स्वामी विवेकानन्द
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सत्य का दर्शन सबको सब समय नहीं होता, विशेष व्यक्ति विशेष क्षण में ही सत्य को देख सकते हैं। ऐसे विशेष व्यक्ति को विशेष प्रकार की दृष्टि प्राप्त होती है, जिसे कभी-कभी 'अंतर्दृष्टि' भी कहते हैं।

नामवर सिंह
  • संबंधित विषय : सच
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मैं तो यह बिल्कुल नहीं मानता कि संसार में अद्वैत-तत्त्व के प्रचार से दुर्नीति या दुर्बलता बढ़ेगी, बल्कि मुझे इस बात पर अधिक विश्वास है कि दुर्नीति और दुर्बलता के निवारण की वही एकमात्र औषधि है।

स्वामी विवेकानन्द
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वेदांत-दर्शन का एक मात्र विषय है—एकत्व की खोज।

स्वामी विवेकानन्द
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प्रामाणिक चिंतन तो मनुष्य को अमूर्त समझता है, विश्व को मनुष्यों से रहित समझता है।

पॉलो फ़्रेरा
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"विचारों को छोड़ों और निर्विचार हो रहो, पक्षों को छोड़ो और निष्पक्ष हो जाओ—क्योंकि इसी भाँति

वह प्रकाश उपलब्ध होता है, जो कि सत्य को उद्घाटित करता है।’’

ओशो
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सांख्य दर्शन पर पूरा राजयोग आधारित है।

स्वामी विवेकानन्द
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फ़िलासफ़ी बघारना प्रत्येक कवि और कथाकार के लिए अपने-आपमें एक ‘वैल्यू’ है, क्योंकि मैं कथाकार हूँ, क्योंकि ‘सत्य’, ‘अस्तित्व’ आदि की तरह ‘गुटबंदी’ जैसे एक महत्त्वपूर्ण शब्द का ज़िक्र चुका है, इसीलिए सोलह पृष्ठ के लिए तो नहीं, पर एक-दो पृष्ठ के लिए अपनी कहानी रोककर मैं भी पाठकों से कहना चाहूँगा कि सुनो-सुनो हे भाइयो, वास्तव में तो मैं एक फ़िलासफ़र हूँ, पर बचपन के कुसंग के कारण...।

श्रीलाल शुक्ल
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ईसा की वाणी में भारतीय चिंतन ही बोला था, यूरोप में उस वाणी की कोई परंपरा ही नहीं थी। इराक़ तक फैले हुए बौद्ध, शैव और वैष्णव चिंतनों का दर्शन ही उसकी पृष्ठभूमि में था।

रांगेय राघव
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कोई ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम साधारणीकरण की सहायता लेते है और साधारणीकरण घटनाओं के पर्यवेक्षण पर आधारित है। हम पहले घटनावली का पर्यवेक्षण करते हैं, फिर उनका साधारणीकरण करते हैं और फिर उनसे अपने सिद्धान्त या मतामत निकालते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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भक्ति-आंदोलन व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन है; जिसकी अभिव्यक्ति दर्शन, धर्म, कला, साहित्य, भाषा और संस्कृति के दूसरे रूपों में दिखाई देती है।

मैनेजर पांडेय
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दर्शन तर्क-वितर्क कर सकता है और शिक्षा दे सकता है, धर्म उपदेश दे सकता है और आदेश दे सकता है; किंतु कला केवल आनंद देती है और प्रसन्न करती है।

सर्वेपल्लि राधाकृष्णन
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बहस के स्वरूप को लेकर जितनी बहस संस्कृत के शास्त्रकारों ने की है, उतनी कदाचित् संसार की किसी अन्य भाषा के साहित्य में नहीं मिलेगी।

राधावल्लभ त्रिपाठी
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द्वैतवादी मानते हैं कि ‘मैं और मेरा’ का प्रयोग केवल ईश्वर के संबंध में ही करना चाहिए। ‘मैं’ का संबोधन केवल वही कर सकता है, और सारी चीज़ें भी उसी की हैं। जब मनुष्य इस स्तर पहुँच जाए कि ‘मैं और मेरा’ का भाव उसमें रहे, सारी चीज़ों को ईश्वरीय मानने लगे, हर प्राणी से प्रेम करने लगे, और किसी पशु के लिए भी अपना जीवन देने के लिए तैयार रहे और ये सारे भाव बिना किसी प्रतिफल की आकांक्षा से हों, तो उसका हृदय स्वतः पवित्र हो जाएगा, तथा उस पवित्र हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम उत्पन्न होगा। ईश्वर ही सभी आत्माओं के आकर्षण का केंद्र है।

स्वामी विवेकानन्द

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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