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कला पर उद्धरण

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सारी कलाएँ एक-दूसरे में समोई हुई हैं, हर कला-कृति दूसरी कलाकृति के अंदर से झाँकती है।

शमशेर बहादुर सिंह
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चेख़व की तरह मुझे भी मनुष्य के भविष्य पर आस्था है। मेरी कला मनुष्य को निराश नहीं कर सकती। रवींद्रनाथ ठाकुर का यह संदेश में कभी नहीं भूल सकूंगा कि 'मानुषेर विश्वास हरण पाप।'

ऋत्विक घटक
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सिनेमा मेरे लिए कोई 'art form' नहीं है, ये मेरे लोगों की सेवा करने का एक ज़रिया मात्र है। मैं कोई समाजशास्त्री नहीं हूँ और इसलिए ऐसे भ्रम नहीं पालता कि मेरा सिनेमा लोगों को बदल सकता है। कोई एक फ़िल्ममेकर लोगों को नहीं बदल सकता है। लोग बहुत विशाल हैं और वे अपने आप को ख़ुद बदल रहे हैं। में चीज़ें नहीं बदल रहा हूँ, जो भी बड़े बदलाव हो रहे हैं, मैं सिर्फ़ उन्हें दस्तावेज़ कर रहा हूँ।

ऋत्विक घटक
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एक सुभाषित है—'कवितारसमाधुर्य्यम् कविर्वेत्ति’, कविता का रस-माधुर्य सिर्फ़ कवि जानता है। ठीक उसी प्रकार सुर में सुर मिलना चाहिए, नहीं तो वाद्ययंत्र कहेगा ‘गा’ और गले से निकलेगा ‘धा’।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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अन्य शास्त्रों के ज्ञान से रहित; किंतु चतुष्षष्टि कला से अलंकृत कामकला का ज्ञाता पुरुष, नर-नारियों की कला-विषयक गोष्ठी में अग्रगण्य होकर सम्मानित होता है।

वात्स्यायन
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अतीत के बिना कोई कला नहीं होती है, किंतु वर्तमान के बिना भी कोई कला जीवित नहीं रहती है, यह भी ठीक है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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कला मानवीय जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है।

वासुदेवशरण अग्रवाल
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जो कला होती है वह सुंदर और सत्य होती है, जो बनावट होती है वह असुंदर और असत्य होती है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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जो कला जीवन की आवश्यकताओं से उत्प्रेरित नहीं होती, उसमें विषयगत वैविध्य का अभाव रहता है और उसके रूप-तत्व का कौशल ही अधिक बढ़ जाता है।

विजयदान देथा
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कला, मात्र का कला के रूप में बोध भाव की एक ऐसी द्रष्टा की सी दृष्टि या तटस्थ-से भाव को समोए रहता है, जिसके बिना बोध को कला या शिल्प का बोध कहने में ही असमंजस होगा।

मुकुंद लाठ
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एक कवि सब कलाकारों का आदिस्वरूप होता है। कविता सब कलाओं की कला है।

ऋत्विक घटक
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प्रकृति में प्रत्यक्ष की हम प्रतीति करते हैं, साहित्य और ललिल कला में अप्रत्यक्ष हमारे निकट प्रतीयमान होता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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कला की कोई भी क्रिया, मनुष्य और जीवन-धारण के लिए अनिवार्य नहीं है। इसलिए कला ही मनुष्य को वह क्षेत्र प्रदान करती है, जिसमें वह अपने व्यक्तित्व का सच्चा विकास कर सकता है।

रामधारी सिंह दिनकर
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कला की प्राप्ति में तपस्या अपेक्षित है— प्रक्रिया अर्जित करने का तप, मनन करने का ताप, देखने का तप, श्रवण करने का तप।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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क्रिया के भेद से ही संसार में कला के अनेक भेद उद्भुत हुए।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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जो कवि केवल सौंदर्य का प्रेमी है, वह शुद्ध कलाकार बन जाता है।

रामधारी सिंह दिनकर
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कला से प्रेम करो। सभी झूठों में से, यह सबसे कम असत्य है।

गुस्ताव फ़्लॉबेयर
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सफल होने के लिए—एक कलाकार के पास—साहसी आत्मा होनी चाहिए। …वह आत्मा जो हिम्मत करती है और चुनौती देती है।

केट शोपैं
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कला का कार्य यथास्थिति बताने से ज़्यादा यह कल्पना करना है कि क्या संभव है।

बेल हुक्स
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सच बात तो यह है कि आत्मपरक रूप से विश्वपरक, जगतपरक होने की लंबी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति ही कला है—अभिव्यक्ति-कौशल के क्षेत्र में और अनुभूति अर्थात् अनुभूत वस्तु-तत्व के क्षेत्र में।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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आधुनिकता का एक तात्पर्य जहाँ अपनी जड़ों की छानबीन है (अपनी स्थानीयता, इतिहास, परंपरा आदि में), वहीं उसका दूसरा तात्पर्य कलात्मक अभिव्यक्ति की उन श्रेष्ठतम उपलब्धियों की जानकारी भी है, जिनसे कला का इतिहास बना है।

कुँवर नारायण
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अतीत, परंपरा, वर्तमान, भविष्य : इनकी लगातार उपस्थिति का बोध, या इनमें से किसी एक की अति-उपस्थिति का बोध निर्धारित करता है कि एक कलाकार अपने समय में मनुष्य की स्थिति और उसकी आधुनिकता को, अपनी रचनाओं में किस तरह ग्रहण और परिभाषित करता है।

कुँवर नारायण
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प्रसाद के साहित्य में मुझे जो कमी महसूस होती है, वह कला की नहीं—कला और जीवन के बीच घनिष्ठता की है।

कुँवर नारायण
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गोष्ठी-समवाय का आयोजन; वेश्या के घर पर अथवा अन्य समान विद्या, बुद्धि, शील, धन वाले समवयस्क मित्रों के घर पर करना चाहिए। सभा में विद्या और कलाओं में निपुण वेश्याओं के साथ वार्तालाप करते हुए, साहित्य, काव्य-समस्या, कथा-आख्यायिक, नृत्य, गीत, कला एवं नाट्यकला आदि विषयों पर चर्चा करनी चाहिए। इस प्रकार समान अनुराग, परिहासपूर्वक मधुर वार्तालाप के साथ गोष्ठी में व्यवहार करते हुए गोष्ठी-समवाय का आनंद लेना चाहिए।

वात्स्यायन
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रचनात्मक दृष्टि से डाक्युमेंटरी एक प्रवृत्ति का नाम है। सत्य यथार्थ में निहित होता है, और कैमरा भौतिक यथार्थ के सभी पक्षों को पकड़ने में विशेष सक्षम होता है। यह कलाकार का कर्तव्य है कि वह यथार्थ को अंकित कर, कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करे।

ऋत्विक घटक
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भावजगत की वस्तु को आकार देने का प्रयास—ऐसा आकार देने का प्रयास; जिससे कि वह भाव अधिक से अधिक संप्रेष्य बन सके और अन्य चित्रों में भी वैसी ही दीप्ति या द्युति उत्पन्न कर सके—कलाकार का लक्ष्य होता है।

देवीशंकर अवस्थी
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नगर, पत्तन, बड़े ग्रामों में जहाँ पर सज्जनों की बस्ती हो, सज्जन पुरुषों का सहवास हो, जहाँ पर जीविका के साधन सुलभ हों, जीवनोपयोगी सभी साधन सरलता से मिल जाएँ और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था हो—उस स्थान पर नागरक को अपना निवासस्थान बनाना चाहिए।

वात्स्यायन
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कारीगर कबीर के जीवन की कला ही, उनकी कविता की कला बन गई।

मैनेजर पांडेय
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मैं रवींद्रनाथ के बिना बोल नहीं सकता। उस आदमी ने मेरे जन्म के पहले ही मेरी सारी भावनाओं को निचोड़ लिया था। उसने समझ लिया था कि मैं क्या हूँ और उसने उसे शब्दबद्ध कर दिया था। मैंने पढ़ा और जाना कि सब कुछ कहा जा चुका है, और नया कहने के लिए मेरे पास कुछ भी बचा नहीं है।

ऋत्विक घटक
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मैक्स रेनहार्ड ने कहा है कि 'कलाकार को अपने बचपन का एक अंश अपनी जेब में रख लेना चाहिए।' चैप्लिन इसे प्रचुर मात्रा में संभाल कर रख सके। आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत के पीछे भी यही तत्त्व सक्रिय था।

ऋत्विक घटक
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नायक के धन से सारे शरीर पर अलंकार योग अर्थात् ख़ुद के लिए आभूषण आदि बनवाना, भवन को कलात्मक ढंग से सजाना, क़ीमती बरतनों को ख़रीदवाना, परिचारकों द्वारा घर को स्वच्छ रखना—ये रूपाजीवा नायिका के विशेष लाभ हैं।

वात्स्यायन
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चाहे साइंस हो, चाहे आर्ट हो—निरासक्त मन ही सर्वश्रेष्ठ वाहन है। यूरोप ने साइंस में वह पाया है, किंतु साहित्य में नहीं पाया।

रवींद्रनाथ टैगोर
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यदि किसी उत्तम काव्य या चित्र की विशेषता समझने के कारण; हम कवि या चित्रकार पर श्रद्धा कर सके, तो यह हमारा अनाड़ीपन है—हमारे रुचि-संस्कार की त्रुटि है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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हर रचना अपने निजी विन्यास को लेकर व्यक्त होती है, जैसे हर राग-रागिनी का ठाट बदल जाता है, वैसे ही हर चित्र, कविता के सृजन के समय उसका साँचा बदल जाता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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मेरे लिए सिनेमा और कुछ नहीं, सिर्फ़ एक अभिव्यक्ति है। ये मेरे लिए अपने लोगों के कष्टों और दु:खों को लेकर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करने का माध्यम है। कल को सिनेमा के अलावा भी इंसान की बुद्धि शायद कुछ ऐसा बना ले; जो सिनेमा से भी ज़्यादा मज़बूती, बल और तात्कालिकता से लोगों की ख़ुशियों, दु:खों, आकाँक्षाओं, सपनों, आदर्शों को अभिव्यक्त कर सके—तब वो ही आदर्श माध्यम बन जाएगा।

ऋत्विक घटक
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'आधुनिकता' विशुद्ध भौतिक संदर्भ में हमारे जीवन में वह बदलाव है, जो विज्ञान और औद्योगीकरण की वजह से आया है। आधुनिक कला एक माने में उस बदलाव के साथ नए, कलापूर्ण और सार्थक रिश्तों की तलाश है।

कुँवर नारायण
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कविता विद्वान की कला है।

वॉलेस स्टीवंस
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अपने नाम के मूल्य मुताबिक़, हर आर्ट को इंसान की बेहतरी के लिए काम करना ही चाहिए। मैं किसी कठोर थ्योरी में यक़ीन नहीं करता हूँ, लेकिन ठीक उसी समय मैं इन तथाकथित 'महान' फ़िल्ममेकर्स को लेकर हैरान हूँ, जो मूल रूप से कुछ नहीं बस नौसिखिए हैं और मानवीय रिश्तों के आर्ट का शोर मचाते रहते हैं। अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी से बचने का ये बहुत चतुर तरीक़ा है। असल में जो भी काम ये करते हैं, वो सिर्फ़ उनकी अपनी सत्ता को फ़ायदा पहुँचाने के लिए होता है। ये लोग इतने पक्षपाती हैं, जितना कि कोई हो सकता है, लेकिन अपक्षपाती होने का मास्क पहनते हैं। मैं ऐसे आदर्शों से घृणा करता हूँ।

ऋत्विक घटक
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आज भी आदमी जो कुछ अपने बारे में जानता है और अपनी दुनिया के बारे में जानता है, उसके बीच सही और जीवंत रिश्तों की खोज—कलाओं की एक सार्थक कोशिश है।

कुँवर नारायण
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कलाओं का ज्ञान प्राप्त करने मात्र से ही सौभाग्य की प्राप्ति होती है। देश-काल की परिस्थितियों के अनुसार इन कलाओं का प्रयोग संभव होगा, अन्यथा परिस्थितिवश असंभव भी हो सकता है।

वात्स्यायन
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कला उनके लिए सांत्वना है, जिन्हें जीवन ने तोड़ दिया है।

विन्सेंट वॉन गॉग
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जहाँ तक मुझे याद आता है कि मैं हमेशा गहरे अवसाद से पीड़ित रहा जो मेरी कलाकृतियों में भी झलकता है।

एडवर्ड मुंक
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कला लंबी है और जीवन छोटा—मृत्यु मँडरा रही है।

मार्गरेट एटवुड
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लेखन की कला आप जो मानते हैं, उसे खोजने की कला है।

गुस्ताव फ़्लॉबेयर
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हमलोग चीज़ों के 'क्या' पर ध्यान नहीं देते, बल्कि उसके 'क्यों' और 'कैसे' पर सोचते हैं। यही महाकाव्यात्मक रवैया है।

ऋत्विक घटक
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कला रोटी जितनी उपयोगी है।

अज़र नफ़ीसी
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जो शास्त्र और कला मर्मज्ञ हो, कलाओं में विचक्षण हो, मल्लिका(माला), फेनिल (स्नानोपयोगी पदार्थ साबुन आदि) तथा कषाय मात्र धन ही जिसके पास शेष बचा हो, ऐसा धनहीन एकाकी नागरक; अपने ज्ञान और कौशल के द्वारा सभाओं में नागरकों और वेश्याओं को शिक्षा देकर अपनी जीविका चला सकता है। इस प्रकार कलाओं और शास्त्र का अध्यापक होने पर भी, वेश्याओं के मार्गदर्शक होने के कारण वह ‘पीठमर्द’ कहलाता है।

वात्स्यायन
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मैं अर्थछठाओं के पीछे भागता हूँ—उन दुर्गाह्य क्षणभंगुर अर्थछठाओं के पीछे। उन्हीं में तो जीवन की चिंगारियाँ छिपी होती है, नाच-गाने भी गले की फाँस नहीं होते, वे रचनात्मक तत्व होते हैं और अगर कथ्य संदर्भ की मांग हो, तो उनमें अनगिनत संभानाएँ होती हैं। अगर भारत में कोई सच्चा गंभीर कलाकार; इस पर अपने तमाम बुद्धि वैभव को दाँव पर लगा देगा, आख़िर मिजोगुची और कुरोसावा या किनुगासा जैसे लोगों ने नोह और काबुकी को अपने हाथों निचोड़कर ही तो उससे अपने नितांत वैयक्तिक वक्तव्य अर्जित किए थे।

ऋत्विक घटक
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अनुभूति ही कला का मूल बीज है। अनुभूति के भी मूल में मानव की सौंदर्यखोजी प्रवृत्ति है, इसीलिए कला की दृष्टि सौंदर्य-विधायिनी है।

देवीशंकर अवस्थी
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घुमक्कड़ी, लेखक और कलाकार के लिए धर्म-विजय का प्रयाण है। वह कला-विजय का प्रयाण है और साहित्य-विजय का भी।

राहुल सांकृत्यायन

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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