नायक के धन से सारे शरीर पर अलंकार योग अर्थात् ख़ुद के लिए आभूषण आदि बनवाना, भवन को कलात्मक ढंग से सजाना, क़ीमती बरतनों को ख़रीदवाना, परिचारकों द्वारा घर को स्वच्छ रखना—ये रूपाजीवा नायिका के विशेष लाभ हैं।
शरीर के संस्कार हेतु नागरक को प्रतिदिन स्नान करना चाहिए, दूसरे दिन तेल-मालिश करनी चाहिए, तीसरे दिन साबुन लगाना चाहिए और चौथे दिन दाढ़ी-मूँछ के बाल और पाँचवें या दसवें दिन गुप्त अंगों के बाल बनवाने चाहिए। निरंतर कपड़ों से ढकी काँखों के पसीने को पोंछना चाहिए।
नागरक की दिनचर्या इस तरह होनी चाहिए कि प्रातःकाल उठकर नित्यकर्म करने के बाद दाँतों की सफ़ाई करे, देह पर चंदन आदि का लेप लगा; धूप से वासित पुष्पमाला धारण करे, मोम और आलता का प्रयोग करे, दर्पण में अपना मुख देखकर सुगंधित पान खाए, इसके बाद दैनिक कार्यो का अनुष्ठान करे।
स्वच्छता इत्यादि के नियमों का पालन करते हुए और खाद्याखाद्य के विवेक की रक्षा करते हुए, सब वर्णों के एक पंक्ति में खाने में कोई भी दोष नहीं है। किसी ख़ास वर्ण के आदमी का ही बनाया भोजन होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।
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शारीरिक स्वच्छता के सिवा और भी साफ-सुथरी आदतें डालने की ज़रूरत है।
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मनुष्य को चाहिए कि वह ईर्ष्यारहित, स्त्रियों का रक्षक, संपत्ति का न्यायपूर्वक विभाग करने वाला, प्रियवादी, स्वच्छ तथा स्त्रियों के निकट मीठे वचन बोलने वाला हो, परंतु उनके वश में कभी न हो।
स्वच्छ क्रांति तो प्रेम व न्याय के सिद्धांत से ही हो सकती है।
आज की भारतवर्ष की स्थिति में कताई तथा मलमूत्र साफ़ करके इसकी उचित व्यवस्था करना, आश्रम में यज्ञ-कर्म माना गया है।
हमारा काम तभी अंतरात्मा से प्रेरित हो सकता है जब अपने-आप में वह स्वच्छ हो, उसका हेतु स्वच्छ हो और उसका परिणाम भी स्वच्छ हो।
ग़लती स्वीकार करना झाड़ू के समान है, जो गंदगी को हटाकर सतह को साफ़ कर देती है।
असली भंगी को भीतर की भी सफ़ाई करनी होती है, जो मैं कर रहा हूँ।
यह कितनी ग़लत बात है कि हम मैले रहें और दूसरों को साफ़ रहने की सलाह दें।
मल, कूड़ा-करकट आदि अनर्थकारी पदार्थों के संबंध की व्यवस्था के लिए किया हुआ परिश्रम भी, यज्ञ का एक प्रकार ही कहा जाता है। ऐसा परिश्रम हरेक को अवश्य करना चाहिए।
आहार-विहार की भूलों को दूर किए बिना, सिर्फ़ हवा-पानी के सुधार से रोग दूर करने की इच्छा करना—शरीर को साफ़ पानी से धोकर मैले गमछे से पोंछने जैसा है।
जो आदमी अपने हाथ साफ़ नहीं रखता, वह साफ़ चीज़ क्या देखेगा और उसकी कहाँ तक क़दर करेगा।
ईंट-चूने की चुनाई पहले हृदय-मंदिर की चुनाई बहुत ज़रूरी है अगर यह हो जाए तो और सब तो हुआ ही है।
हमारी आँखों को ऐसा अभ्यास होना चाहिए कि वे गंदगी को देखकर खामोश न रह सकें।
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जब चीज़ें साफ़ होती हैं, काफ़ी देर हो चुकती है।
दीन होने का अर्थ गंदा बने रहना नहीं है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere