Font by Mehr Nastaliq Web
Rabindranath Tagore's Photo'

Rabindranath Tagore

1861 - 1941 | مغربی بنگال

کی

53
Favorite

باعتبار

भीतर के साथ बाहर का निश्चित विभाजन अगर बना रहे तो हमारा जीवन सुविहित, सुश्रृंखलित, सुसंपूर्ण हो जाता है, किंतु वही हमारे जीवन में नहीं हो पा रहा है।

  • विषय :
    اور 3 مزید

संग्रहणीय वस्तु हाथ आते ही उसका उपयोग जानना, उसका प्रकृत परिचय प्राप्त करना, और जीवन के साथ-ही-साथ जीवन का आश्रयस्थल बनाते जाना—यही है रीतिमय शिक्षा।

कलावान् गुणीजन भी जहाँ पर वास्तव में गुणी होते हैं; वहाँ पर वे तपस्वी होते हैं, वहाँ यथेच्छाचार नहीं चल सकता, वहाँ चित्त की साधना और संयम—है ही है।

नियम साधना का लोभ भी कष्ट की मात्रा का हिसाब लगाकर आनंद पाता है। अगर कड़े बिछौने पर सोने से शुरू किया जाए; तो आगे चलकर मिट्टी पर बिछौना बिछाकर, फिर सिर्फ़ एक कंबल बिछाकर, फिर कंबल को भी छोड़कर निखहरी ज़मीन पर सोने का लोभ क्रमशः बढ़ता ही रहता है।

जगत से मन अपनी चीज़ संग्रह कर रहा है, उसी मन से विश्व-मानव-मन फिर अपनी चीज़ चुनकर, अपने लिए गढ़े ले रहा है।

अहं का स्वभाव होता है अपनी ओर खींचना, और आत्मा का स्वभाव होता है बाहर की तरफ़ देना—इसलिए दोनों के जुड़ जाने से एक भयंकर जटिलता की सृष्टि हो जाती है।

अपने जीवन से मनुष्य को सबसे बड़ी शिक्षा यह लेनी चाहिए कि संसार में दुःख है, किंतु उसे सुख में बदलना उसके हाथ में है।

हमारी यथार्थ अर्थवत्ता हमारे अपने बीच में नहीं है, वह समस्त जगत के मध्य फैली हुई है।

परित्राण का अर्थ यह है कि व्यर्थता और असफलता से अपनी रक्षा करना, अपने भीतर सत्यरूपी जो रत्न छिपा हुआ है, उसका उद्धार करना।

कविता-कहानी-नाटक के बाज़ार में जिन्हें समझदारों का राजपथ नहीं मिलता; वे आख़िर देहात में खेत की पगडंडियों पर चलते हैं, जहाँ किसी तरह का महसूल नहीं लगता।

  • विषय :
    اور 3 مزید

असंयम को अमंगल जानकर छोड़ने में जिनके मन में विद्रोह जागता है, उनसे वह कहना चाहता है कि उसे असुंदर जानकर अपनी इच्छा से छोड़ दो।

असंगति जब हमारे मन के ऊपरी स्वर पर आघात करती है; तब हमको कौतुक जान पड़ता है, गहरे स्तर पर आघात करती है तो हमको दुःख होता है।

भीतर को बाहर के आक्रमण से बचाओ।

  • विषय :
    اور 3 مزید

मुक्ति का अर्थ किसी विद्यमान वस्तु का विनाश करना नहीं है, बल्कि केवल अविद्यमान और सत्य मार्ग के अवरोधक कोहरे का निवारण करना है। जब अविद्या का यह अवरोध हट जाता है, तभी पलकें ऊपर उठ जाती हैं—पलकों का हटना आँखों की क्षति नहीं कहा जा सकता।

इच्छा का यह जो सहज धर्म है कि वह दूसरे की इच्छा को चाहती है, केवल ज़ोर-ज़बरदस्ती पर ही उसका आनंद निर्भर नहीं है।

साहित्य में विषयवस्तु निश्चेष्ट हो जाती है, यदि उसमें प्राण रहे।

  • विषय :
    اور 2 مزید

साहित्य का विषय व्यक्तिगत होता है, श्रेणीगत नहीं। यहाँ पर मैं ‘व्यक्ति’ शब्द के धातुमूलक अर्थ पर ही ज़ोर देना चाहता हूँ।

  • विषय :
    اور 2 مزید

भाषा नदी की धारा जैसी होती है, उस पर किसी का नाम खोदकर नहीं रखा जा सकता।

  • विषय :
    اور 1 مزید

मैं उनमें से नहीं हूँ जो नाम को केवल नाम समझते हैं।

  • विषय :
    اور 3 مزید

साहित्य व्याकरण के सिद्धांतों को पुष्ट अवश्य करता है; किंतु वह उससे स्वतंत्र, आनंदमय रचना है।

  • विषय :
    اور 2 مزید

प्रकृति में प्रत्यक्ष की हम प्रतीति करते हैं, साहित्य और ललिल कला में अप्रत्यक्ष हमारे निकट प्रतीयमान होता है।

  • विषय :
    اور 3 مزید

सुख देखते ही तीनों लोकों में दुःख के चिन्ह लुप्त हो जाते हैं, एवं दुःख उपस्थित होते ही कहीं भी लेशमात्र भी सुख दिखाई नहीं देता।

समाज में जब कोई प्रबल, संक्रामक भावना जाग उठती है तो वह किसी वेष्टन को नहीं मानती।

  • विषय :
    اور 2 مزید

रस-सामग्री से तो अशिक्षित रुचि भी, किसी-न-किसी तरह स्वाद प्राप्त कर लेती है।

  • विषय :
    اور 1 مزید

यह प्रायः देखा जाता है कि जो तत्कालीन और तत्स्थानीय होता है, वही अधिकांश लोगों के निकट सबसे प्रधान आसन अधिकृत कर लेता है।

इतिहास सिखाता है कि पके हुए बालों की जटा को जब सनातन समझकर उसकी पूजा की जाती है, तो वही जटा फाँस बनकर गला घोटती है।

  • विषय :
    اور 4 مزید

मनुष्य के पास केवल जगत-प्रकृति ही नहीं, समाज-प्रकृति नामक एक और आश्रय भी है। इस समाज के साथ मनुष्य का कौन-सा संबंध सत्य है—इस बात पर विचार करना चाहिए।

अपव्यय और कष्ट जितना ही अधिक प्रयोजनहीन होता है; संचय और परिणामहीन, जय-लाभ का गौरव उतना ही अधिक जान पड़ता है।

जगत के साथ मन का जो संबंध होता है, मन के साथ साहित्यकार की प्रतिभा का भी वही संबंध होता है।

  • विषय :
    اور 1 مزید

भारतवर्षीय संहिता में नर-नारी का संयत संबंध, कठिन अनुशासन के भीतर आदिष्ट है—कालिदास के काव्य में वही सौंदर्य के उपकरण में गठित है।

  • विषय :
    اور 6 مزید

मनुष्यत्व के पराभव को अंतहीन, प्रतिकारहीन और चरम समझना मेरी दृष्टि में अपराध है।

हमारे हृदय में ज्ञान, प्रेम और कर्म का जिस मात्रा में पूर्ण मिलन होता है, उसी मात्रा में हमारे हृदय में पूर्ण आनंद रहता है।

  • विषय :
    اور 3 مزید

मानव-समाज का सर्व प्रधान तत्त्व है, मनुष्य-मात्र का ऐक्य। सभ्यता का अर्थ है, एकत्र होने का अनुशीलन।

  • विषय :
    اور 4 مزید

प्रकृति मानव के समस्त सुख-दुःख में 'अनंत' का स्वर मिलाए रखती है।

मानव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, वह किसी देश के संकीर्ण दायरे में आबद्ध नहीं।

  • विषय :
    اور 4 مزید

हम सहज ही भूल जाते हैं कि जाति-निर्णय विज्ञान में होता है, जाति का विवरण इतिहास में होता है। साहित्य में जाति-विचार नहीं होता, वहाँ पर और सब-कुछ भूलकर व्यक्ति की प्रधानता स्वीकार कर लेनी होगी।

  • विषय :
    اور 5 مزید

हमें समग्र के लिए अंश का त्याग करना है―नित्य के लिए क्षणिक का, प्रेम के लिए अहंकार का, आनंद के लिए सुख का त्याग करना है।

साहित्यकारों की श्रेष्ठ चेष्टा केवल वर्तमान काल के लिए नहीं होती, चिरकाल का मनुष्य-समाज ही उनका लक्ष्य होता है।

चाहे साइंस हो, चाहे आर्ट हो—निरासक्त मन ही सर्वश्रेष्ठ वाहन है। यूरोप ने साइंस में वह पाया है, किंतु साहित्य में नहीं पाया।

  • विषय :
    اور 3 مزید

मनुष्य का सबसे उत्तम परिचय यह है कि 'मनुष्य स्रष्टा है', किंतु आज की सभ्यता उसे मज़दूर बनाती है, मिस्त्री बनाती है, महाजन बनाती है, लोभ दिखाकर स्रष्टा को छोटा बनाती है।

मनुष्य के अंत:करण का धर्म यही है कि वह परिश्रम से केवल सफलता नहीं, बल्कि आनंद भी प्राप्त करता है।

  • विषय :
    اور 3 مزید

हमें अपनी तीन अवस्थाएँ दिखाई देती हैं। तीनों ही बड़े स्तरों पर मानव जीवन का निर्माण कर डालती हैं। एक अवस्था है प्राकृतिक, दूसरी धार्मिक नैतिकता की और तीसरी होती है आध्यात्मिकता की।

ज्ञान, प्रेम और शक्ति—इन तीन धाराओं का जहाँ एक साथ संगम होता है, वहीं पर आनंदतीर्थ बन जाता है।

  • विषय :
    اور 5 مزید

परिचय का अर्थ यही है कि जो चीज़ छोड़ने की है उसे छोड़कर, जो चीज़ लेने की है उसे ले लिया जाए।

  • विषय :
    اور 1 مزید

प्रतिदिन प्रातःकाल हम जो यह उपासना कर रहे हैं, यदि उसमें थोड़ी भी सत्यता हो, तो हम उसकी सहायता से प्रतिदिन धीरे-धीरे त्याग के लिए प्रस्तुत होते रहते हैं।

आध्यात्मिक गृहस्थी में हमें कल के कारण आज के बारे में नहीं सोचना चाहिए।

हमारी सारी क्रियाओं को जगाए रखने का भार सबसे पहले बाह्य-संसार पर ही आधारित होता है।

ज्ञान की भित्ति अगर कठोर होती, तो वह एक बेतुका स्वप्न बन जाता और आनंद की भित्ति अगर कठोर होती, तो वह सरासर पागलपन बन जाता।

जगत् के सृष्टि-कार्यों में जैसे उत्ताप महत्त्वपूर्ण है, वैसे ही मानव जीवन के गठन में दुःख भी एक बहुत बड़ी रासायनिक शक्ति है।

संसार का चमत्कार यह नहीं है कि यहाँ कष्ट और बाधाएँ हैं, बल्कि इसमें है कि यहाँ व्यवस्था, सौंदर्य, आनंद, कल्याण और प्रेम का वास है।

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

रजिस्टर कीजिए