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Kedarnath Singh

1934 - 2018 | بلیا, اتر پردیش

کی

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कवि को लिखने के लिए कोरी स्लेट कभी नहीं मिलती है। जो स्लेट उसे मिलती है, उस पर पहले से बहुत कुछ लिखा होता है। वह सिर्फ़ बीच की ख़ाली जगह को भरता है। इस भरने की प्रक्रिया में ही रचना की संभावना छिपी हुई है।

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कविता विचारहीन नहीं हो सकती, परंतु विचारात्मक प्रतिबद्धता को मैं कविता के लिए अनिवार्य नहीं मानता।

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मैं बोलता हूँ, इसलिए लिखता हूँ। मनुष्य के इतिहास में लिखना बोलने का अनुवर्ती है—लगभग यही बात रचना-प्रक्रिया पर भी लागू होती है।

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काग़ज़ के पन्ने पर जो घटित होता है, वह कई बार बाहर और भीतर का एक मूक संलाप होता है, कई बार एक मुखर बहस और कई बार एक अजब-सी अनबन या टकराव—जिसका दबाव शब्द चुपचाप झेलते हैं।

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अगर किसी चीज़ को हम अमर मानकर चलें, तो जड़ता पैदा होगी और हर जड़ता से लड़ना होता है।

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ठेठ गाँव के आदमी के लिए; शहर का आदमी लगभग सत्ता पक्ष का आदमी होता है, और लगातार एक ख़ास तरह के संदेह के दायरे में रहता है।

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मानवीय संवेदनाएँ जिस हद तक मानवीय होती हैं, युद्ध-विरोधी भी होती हैं।

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कवि को लिखने के लिए कोरी स्लेट कभी नहीं मिलती है। जो स्लेट उसे मिलती है; उस पर पहले से बहुत कुछ लिखा होता है, वह सिर्फ़ बीच की खाली जगह को भरता है। इस भरने की प्रक्रिया में ही रचना की संभावना छिपी हुई है।

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पर्यावरण की समस्या केवल प्राकृतिक संतुलन के बिगड़ने की समस्या नहीं है, बल्कि इसका संबंध आदमी की पूरी सोच और जीवन के प्रति उसके समग्र दृष्टिकोण से है।

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साहित्य में सच्ची प्रतिबद्धता वहीं जन्म लेती है, जहाँ कला लेखक की संवेदना और उसके वैचारिक झुकाव को एक विलक्षण जादुई संतुलन में बदल लेती है।

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एक ख़ास तरह का मध्यवर्ग शहरों में विकसित होता रहा है, जो गाँवों से आया है। आधुनिक हिंदी साहित्य उन्हीं लोगों का साहित्य है।

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मैं आज की कविता को जब अत्यधिक नागरिक होते देखता हूँ, तो मुझे कई बार अपने भीतर एक डर पैदा होता है कि कहीं वह अपना जातीय स्वरूप खो दे।

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गद्य पुराने शब्दों को छोड़ देता है। इसमें करेंट होने की कोशिश होती है। कविता पुराने शब्दों को छोड़ती नहीं है।

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परिवार समाज की वह पहली संस्था है; जो हमें वृहत्तर समाज के लिए तैयार करती है, और जिससे जुड़ने के लिए हमें अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ती।

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एक भारतीय लेखक की प्रतिबद्धता, भारतीय जन की मुक्ति के लिए होने वाले संघर्षों में ही अपना आकार खोज सकती है।

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बिंब, कविता का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है और मैं ऐसा कतई नहीं मानता कि बिंब-प्रधान कविता प्रगति-विरोधी या जन-विरोधी होती है।

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अज्ञेय हिंदी के पहले ख़ालिस अरबन कवि हैं, और इसीलिए हिंदी की मुख्य सृजनात्मक धारा से अलग-थलग भी पड़ते हैं—लगभग 'नदी के द्वीप' की तरह।

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कविता क्रांति ले आएगी, ऐसी ख़ुशफ़हमी मैंने कभी नहीं पाली, क्योंकि क्रांति एक संगठित प्रयास का परिणाम होती है, जो कविता के दायरे के बाहर की चीज़ है।

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कविता से मैं उतनी ही माँग करना चाहता हूँ, जितना वह दे सकती है। कविता, सिर्फ़ इस कारण कि वह कविता है, दुनिया को बदल देगी—ऐसी ख़ुशफ़हमी मैंने कभी नहीं पाली।

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बनारस शहर है ज़रूर, लेकिन उसका चरित्र आज भी ऐसा है कि वह एक बड़ा गाँव होने का आभास देता है। उसका चरित्र एक देसीपन लिए हुए है।

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कविता में बिंब हो, ठीक है। लेकिन कविता बिंब-बहुल हो, बिंब से बोझिल हो। उससे बचना चाहिए। बिंब-बहुल कविता अपने आशय को क्षतिग्रस्त करती हैं।

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कविता क्रांति ले आएगी, ऐसी ख़ुशफ़हमी मैंने कभी नहीं पाली, क्योंकि क्रांति एक संगठित प्रयास का परिणाम होती है, जो कविता के दायरे के बाहर की चीज़ है।

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आस्था एक विश्वासमूलक प्रत्यय है, जबकि प्रतिबद्धता एक ऐसी बौद्धिक अवधारणा, जिसका रुख कर्म की ओर है।

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मुझे कई बार लगता है कि पेड़ शायद आदमी का पहला घर है।

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आत्मदया से कोई बड़ी कविता नहीं पैदा हो सकती।

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गाँव रचनाशीलता की एकमात्र कसौटी है—ऐसा मानना एक अतिवाद है, और हर अतिवाद की तरह इससे भी बचना चाहिए।

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अभिव्यक्ति के सारे माध्यम जहाँ निरस्त या समाप्त हो जाते हैं, शब्द वहाँ भी जीवित रहता है।

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अज्ञेय से पहले हिंदी का कोई ऐसा कवि नहीं हुआ जो शुद्ध रूप से नागरिक कवि हो।

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आत्यन्तिकता और अराजकता, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और सामान्य मनुष्य के लिए सबसे बड़ा ख़तरा इन्हीं से है।

क़ब्रिस्तान वह जगह है, जहाँ सारी पंचायतें ख़त्म हो जाती हैं।

जैसा समाज हम बनाएँगे, उसी के अनुसार कला और साहित्य की क़ीमत तय होगी।

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मैं ऐसा नहीं मानता कि विश्व-बाज़ार कविता को निगल जाएगा और कविता हमेशा के लिए अपना प्रभाव खो देगी।

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एक ख़ास तरह का मध्यवर्ग शहर में विकसित होता रहा है, जो गाँवों से आया है। आधुनिक हिंदी साहित्य उन्हीं लोगों का साहित्य है।

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भारत की सारी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ हैं। हिंदी ही सिर्फ़ राष्ट्रभाषा है, यह मानना भी एक खंडित सत्य होगा।

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भाषा का होना कविता के होने की गारंटी है।

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कविता केवल उसी दिन निरस्त हो सकती है, जिस दिन किसी विस्फोटक से मानव-मन से भाषा को उड़ा दिया जाएगा।

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मैं चाहूँ या चाहूँ, अपने समाज में अपने सारे मानववाद के बावजूद, मैं एक जाति-विशेष का सदस्य माना जाता हूँ। यह मेरी सामाजिक संरचना की एक ऐसी सीमा है, जिससे मेरे रचनाकार की संवेदना बार-बार टकराती है और क्षत-विक्षत होती है।

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विश्व-बाज़ार विश्व-समाज की नई गतिविधि है और उसमें बहुत कुछ ऐसा हो सकता है जिससे नए ढंग की कविता जन्म ले।

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निस्संदेह एक श्रेष्ठ मौलिक कवि की शक्ति की पहचान आगे चलकर इसी बात से की जाएगी कि वह अपने समय की रचना के सामूहिक व्यक्तित्व से किस हद तक अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने में समर्थ हो सका है।

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कई बार एक आलोचक जो कहता है, उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण वह होता है जो वह नहीं कहता।

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मीडिया का डर एक व्यर्थ का डर है।

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उपभोक्ता समाज को टी.वी., रेडियो, कॉस्मेटिक्स और संचार के आधुनिक साधन चाहिए। कविता सबसे बाद में चाहिए, या फिर नहीं चाहिए। ऐसा एक समाज हमने बनाया है।

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विचार, अनुभूति और संवेदना—सबका संबंध शब्द से होता है और कविता शब्द है। शब्द—जो कवि के लिए सबसे रहस्यमय वस्तु है।

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कविता एक ऐसी चीज़ है जिसका अपनी चली आई परंपरा के सूत्रों से इतना गहरा रिश्ता है कि उसके बिना कविता संभव ही नहीं है, क्योंकि हम शब्द से कविता लिखते हैं और शब्द हमारी बनाई हुई चीज़ नहीं है।

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भाषा स्मृतियों का पुंज है और विलक्षण यह है कि स्मृतियाँ पुरानी और एकदम ताज़ा भाषा में घुली-मिली होती हैं।

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कविता के लिए मनुष्य की पक्षधरता के अतिरिक्त मैं किसी अन्य पक्षधरता को आवश्यक नहीं मानता।

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मेरा टेलीविज़न लगभग प्रलाप जैसी भाषा में जो लगातार बोलता रहता है, एक ख़ास तरह का प्रदूषण मेरी भाषा की दुनिया में—उसके ज़रिए भी फैलता है।

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कविता की बुनियाद भाषा में है।

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समाज नामक इस विराट इमारत में वह कौन-सा कमरा है, जो माँ का कमरा है?

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हमारी पुरानी स्मृति में पड़े हुए शब्द हमारी कई स्मृतियों को एक साथ जगाते हैं।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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