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Sri Aurobindo

1872 - 1950 | مغربی بنگال

کی

باعتبار

मानव को अपने राष्ट्र की सेवा के ऊपर किसी विश्व-भावना आदर्श को पहला स्थान नहीं देना चाहिए।... देशभक्ति तो मानवता के लक्ष्य विश्वबंधुत्व का ही एक पक्ष है।

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सारा जीवन धर्म-क्षेत्र है और संसार भी धर्म है। केवल आध्यात्मिक ज्ञान की आलोचना और भक्ति का भाव ही धर्म नहीं है, कर्म भी धर्म है। हमारे सारे साहित्य में यही उच्च शिक्षा अति प्राचीन काल से सनातन भाव से व्याप्त हो रही है।

सारा धन भगवान का है और यह जिन लोगों के हाथ में है, वे उसके रक्षक हैं, स्वामी नहीं।

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देशभक्त स्वदेश के लिए जीता है क्योंकि उसे जीना ही चाहिए, स्वदेश के लिए ही मर जाता है क्योंकि देश की यह माँग होती है।

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संयोग की बिखरी हुई ईंटों से इस संसार का निर्माण नहीं हुआ है। कोई अंधा ईश्वर भाग्य-निर्माता नहीं है। एक सचेत शक्ति ने जीवन की योजना बनाई है। हर वक्रता और रेखा का अपना अर्थ है।

जब ज्ञान से आलोकित तथा कर्म के द्वारा नियंत्रित और भीमशक्ति प्राप्त प्रबल स्वभाव परमात्मा के प्रति प्रेम एवं आराधना-भाव में उन्नत होता है, तब वही भक्ति टिक पाती है तथा आत्मा को परमात्मा से सतत संबद्ध बनाए रखती है।

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हमारे लिए तो ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या कहने की अपेक्षा ब्रह्म को सत्य और जगत को ब्रह्म कहना अधिक उचित और हितकर है।

भूतकाल के साँचों को तोड़ डालो परंतु उनकी स्वाभाविक शक्ति और मूल भावना को सुरक्षित रखो, अन्यथा तुम्हारा कोई भविष्य ही नहीं रह जाएगा।

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सबसे पहले भारतीय बन जाओ। अपने पूर्व-पुरुषों की पैतृक संपत्ति को फिर से प्राप्त करो। आर्य-विचार, आर्य अनुशासन, आर्य चरित्र और आर्य जीवन को पुनः प्राप्त करो। वेदांत, गीता और योग को फिर से प्राप्त करो। उन्हें केवल बुद्धि या भावना से ही नहीं, अपितु जीवन द्वारा पुनः जीवित कर दो।

ईश्वरीय पुकार दुर्लभ है परंतु वह हृदय जो उस पर ध्यान देता है, दुर्लभतर है।

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हमें, दो माता! प्राण में, मन में असुर की शक्ति, असुर का उद्यम। दो माता! हृदय में, बुद्धि में देवता का चरित्र, देवता का ज्ञान।

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अपनी आत्मा को जानो, अपने वास्तविक आत्मा को ईश्वर जानो और उसे अन्य सब के आत्मा के साथ एक जानो।

पैग़म्बर सत्य को परमात्मा की वाणी या आदेश के रूप में घोषित करता है और वह स्वयं संदेशवाहक होता है। कवि हमें सत्य को उसकी सौंदर्य-शक्ति में, उसके प्रतीक या बिंब में दिखाता है या प्रकृति के कार्यों या जीवन के कार्यों में उसे प्रकट करता है—उसका स्पष्ट वक्ता बनने की उसे आवश्यकता नहीं होती।

उपासना और उपास्य बनने का प्रयत्न करो।

माता दुर्गे! तुम्हारी संतान हैं हम। हम तुम्हारे प्रसाद से, तुम्हारे प्रभाव से महत् कार्य के, महत् भाव के उपयुक्त हो जाएँ। विनाश करो क्षुद्रता का, विनाश करो स्वार्थ का, विनाश करो भय का।

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जीवन में ईश्वर को अभिव्यक्त करना ही मानव का मानवत्व है। वह पशु-जीवन उसकी क्रियाओं से यात्रा प्रारंभ करता है किंतु दिव्य जीवन ही उसका लक्ष्य है।

मानव जन्मा ही इसलिए है कि हे मृत्यु! तुम पर विजय पा सके।

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प्रेम और एकता का अनुभव करना हो जीवन है।

भक्ति तब तक पूर्णत: चरितार्थ नहीं होती, जब तक वह कर्म और ज्ञान नहीं बन जाती।

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भगवान् को सर्वभावेन जानना यह जानना है कि वे ही एक भगवान् आत्मा में हैं, व्यक्त चराचर जगत् में हैं और समस्त व्यक्त के परे हैं, और यह सब एकीभाव से और एक साथ हैं।

यदि तुम्हारा लक्ष्य महान हो और तुम्हारा साधन सामान्य हो तो भी कार्य करो क्योंकि केवल कार्य के द्वारा ही तुम्हारे साधनों में वृद्धि हो सकती है।

मनुष्य की आत्मा उसके भाग्य से अधिक बड़ी होती है।

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प्रत्येक सद्ग्रंथ में दो तरह की बातें हुआ करती हैं, एक सामयिक, नश्वर, देशविशेष और कालविशेष से संबंध रखनेवाली और दूसरी शाश्वत, अविनश्वर, सब कालों और देशों के लिए समान रूप से उपयोगी और व्यवहार्य।

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गीता जिस कर्म का प्रतिपादन करती है, वह मानव-कर्म नहीं अपितु दिव्य कर्म है।

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परास्त होने पर भी जीवन तो संघर्ष करता ही रहेगा।

ग़लती तो हमारे मानवीय चिंतन की साथी है।

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स्वभाव में शक्ति, मन में बुद्धि, हृदय में प्रेम—ये भव्य मानवता का त्रिक पूरा करते हैं।

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(मृत्यु में) मेरा घर नष्ट होता है, मैं नहीं।

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ईश्वर के अनेक रूप हैं जिससे वह मानव में विकसित होता है।

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आख़िर ईश्वर है क्या? एक शाश्वत बालक जो शाश्वत उपवन में शाश्वत क्रीड़ा में लगा हुआ है।

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ब्रह्मचर्य से हम जितना अधिक तप, तेज, विद्युत और ओज का भंडार बढ़ा सकेंगे, उतना ही हम स्वयं को शरीर, हृदय, मन और आत्मा के कार्यों के लिए चरम शक्ति से भर लेंगे।

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भक्ति और कर्म तब तक पूर्ण टिकाऊ नहीं हो सकते, जब तक वे ज्ञान पर आधारित हों।

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पराधीनता की ख़ास नींव अपने धर्म का नाश और दूसरे के धर्म की सेवा करने से पड़ती है।

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भगवान् का सेवक होना कुछ चीज़ है, भगवान् का दास होना उससे भी बड़ी चीज़ है।

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गद्य-लेखक भी कवि हो सकता है, यदि उसमें कवित्व हो।

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स्वर्ग के आनंद पृथ्वी के अपने हो गए होते यदि पृथ्वी पवित्र होती।

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जो कुछ उच्चतम तत्त्व है उसके साथ अपनी सत्ता को सभी भावों में एक हो जाना है- 'योग'।......समस्त प्रकृति और सभी जीवों के साथ एक हो जाना ही है योग।

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जिस आनंद में सभी सहभागी हों, वह अपूर्ण है।

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या तो जीवन ही है, या मृत्यु प्रच्छन्न जीवन है।

हमारा धर्म सनातन धर्म है। यह धर्म त्रिविध, त्रिमार्गगामी तथा त्रिकर्मरत है।

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जैसे सर्वोतम धर्म वह है जो सभी धर्मों के सत्य को स्वीकारे, वैसे ही सर्वोतम दार्शनिक मत वह है जो सभी दर्शनों के सत्य को स्वीकारे और प्रत्येक को उसका उचित स्थान दे।

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दरिद्रता का होना एक अन्यायपूर्ण तथा कुव्यवस्थित समाज का प्रमाण है और हमारी सार्वजनिक दानशीलता केवल एक डाकू के विवेक का प्रथम और धीमा जागरण है।

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धन एक विश्वजनीन शक्ति का स्थूल चिह्न है। यह शक्ति भूलोक में प्रकट होकर प्राण और जड़ के क्षेत्रों में कार्य करती है। बाह्य जीवन की परिपूर्णता के लिए इसका होना अनिवार्य है।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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