जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का ख़ून बिना छना पी जाते हैं।
हिंदी में सबसे प्रचलित और लोकप्रिय पद्धति है—अपनों की प्रशंसा और परायों की निंदा।
ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, सब माया है—यह शंकराचार्य सिखाते हैं, पर सोने के सिंहासन पर बैठते हैं और सोने के कमंडल से पानी पीते हैं।
हृदय-विनिमय प्रेम का लक्षण है और तुम यदि उसी हृदय को गोपन करते हो, तो यह निश्चित है कि तुम स्वार्थभावापन्न हो, उनको केवल बातों से प्रेम करते हो।
राजनीतिक दाँव-पेंच में पड़कर; हमें कम-से-कम इतना तो न भूलना चाहिए कि वर्तमान काल ही सब कुछ नहीं है—भूत और भविष्य काल भी कोई वस्तु है।
श्रद्धा का मूल तत्त्व है—दूसरे का महत्त्व स्वीकारना। अतः जिनकी स्वार्थबद्ध दृष्टि अपने से आगे नहीं जा सकती, अथवा अभिमान के कारण जिन्हें अपनी ही बड़ाई के अनुभव की लत लग गई है—उनकी इतनी समाई नहीं कि वे श्रद्धा ऐसे पवित्र भाव को धारण करें।
सज्जनता तथा करूणा-संपन्न होने का अर्थ है—दूसरों के प्रति सहानूभूति रखना, मनुष्य मात्र के प्रति प्रेम रखना, और अपने स्वार्थ का त्याग करना।
समाज में एक बड़ी संख्या अभी भी उन व्यक्तियों की है, जो अपने मूल पशुत्व और स्वार्थ पर सभ्यता का सिर्फ़ मुलम्मा चढ़ाए हुए हैं—एक दिखावटी आवरण।
एक वर्ग ऐसा रहा है, जो आदमी को हमेशा इस्तेमाल करता रहा है। पहले वह फ़िंक्शन के जरिए उसे एक्स्प्लायट करता था। उस के बाद फ़ेथ (विश्वास) के जरिये इस्तेमाल करता रहा, और अब फ़ैक्ट (तथ्य) के नाम पर इस्तेमाल कर रहा है।
सरकार का विरोध करना भी, सरकार से लाभ लेने और उसमें संरक्षण प्राप्त करने की एक तरक़ीब है। लेखक न अब 'बेचारा' रह गया है, न भोला। वह जानता है कि सरकार का विरोध करने से कभी-कभी समर्थन से अधिक फ़ायदे मिलते हैं।
साहित्य में बंधुत्य से अच्छा धंधा हो जाता।
आत्मभ्रांति के समान कोई रोग नहीं है। सद्गुरु के समान कोई वैद्य नहीं है। सद्गुरु की आज्ञा के समान कोई उपचार नहीं हैं। विचार और ध्यान के समान कोई औषधि नहीं है।
जिस तरह स्वार्थ और शिकायत से मन रोगी और धुँधला हो जाता है, उसी तरह प्रेम और उसके उल्लास से दृष्टि तीखी हो जाती है।
इतिहास में कभी भी किसी गिलहरी ने; अपने साथी जीवों की समूची प्रजाति को गिनने, बंदी बनाने और नेस्तनाबूद करने की प्रेरणा महसूस नहीं की। ये अपराध अद्वितीय रूप से मनुष्य द्वारा किए जाते हैं।
लोकरुचि अथवा लोक-उक्तियों के अनुसार जो अपना जीवन-यापन करते हैं, वे अपने पड़ोसियों की प्रशंसा के पात्र भले ही बन जाएँ, पर उनका जीवन औरों के लिए नहीं होता है।
जहाँ रुपए-पैसे का संबंध है, वहीं भ्रम होने की संभावना है।
उत्पीड़क संपूर्ण समुदाय की उन्नति के पक्ष में नहीं, बल्कि उसके कुछ गिने-चुने नेताओं की उन्नति के पक्ष में होते हैं।
विज्ञापन के अनुसार सुसंस्कृत होने का मतलब है—किसी भी विवाद से दूर रहना।
मतार्थी जीव को आत्मज्ञान नहीं होता है।
स्वार्थ ही भ्रष्टाचार और विनाश का आरंभ है, चाहे यह किसी राजनीतिज्ञ में हो या किसी धार्मिक आदमी में। स्वार्थ पूरे संसार पर हावी है और इसीलिए द्वंद्व है।
जो केवल अपने विलास या शरीर-सुख की सामग्री ही प्रकृति में ढूँढ़ा करते हैं, उनमें रस रागात्मक 'सत्त्व' की कमी है, जो व्यक्त सत्ता मात्र के साथ एकता की अनुभूति में लीन करके, हृदय के व्यापकत्व का आभास देता है।
एक का स्वार्थ दूसरे पर निर्भर है, इसका विशेष रूप से ज्ञान होने पर सब लोग ईर्ष्या को त्याग देंगे। आपस में मिल-जुलकर किसी कार्य को संपादित करने की भावना, हमारे जातीय चरित्र में सुलभ नहीं है। अतः इस प्रकार की भावना को जाग्रत करने के लिए, तुम्हें अत्यधिक परिश्रम करना पड़ेगा तथा उसके लिए हमें धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा भी करनी होगी।
चारों ओर सब प्रकार के अस्थायी अनुभवों से घिरे रहकर हम सोचते हैं कि हमारा प्यार ही एकमात्र स्थायी प्यार है। यह कैसे हो सकता है? प्यार भी स्वार्थ से भरा है।
आज उपकृत हुआ हूँ; इसलिए कल फिर स्वार्थांध होकर अपकृत होने का बहाना कर, अकृतज्ञता को मत्त बुला लो। इससे बढ़कर इतरता और क्या है? जिस किसी से पूछ लो।
जो लोग स्वार्थवश, व्यर्थ की प्रशंसा और ख़ुशामद करके वाणी का दुरुपयोग करते हैं—वे सरस्वती का गला घोंटते हैं।
राजा से लेकर रंक तक सभी लोग; करारों के ख़ुद को अच्छे लगने वाले अर्थ करके, दुनिया को, ख़ुद को और भगवान को धोखा देते हैं।
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हेतु रखने से जो नहीं सध सकता, वह साहित्य में बिना हेतु रखकर सधता है—यह साहित्य की ख़ूबी है।
मनमुटाव वे नहीं फैलाते, जो प्रेम से वंचित हैं; बल्कि वे फैलाते हैं, जो प्रेम नहीं कर सकते, क्योंकि वे स्वयं से ही प्रेम करते हैं।
गृहस्थी के संचय में, स्वार्थ की उपासना में, तो सारी दुनिया मरती है। परोपकार के लिए मरने का सौभाग्य तो संस्कार वालों को ही प्राप्त होता है।
समस्त अज्ञान का आधार यही है कि हम अविनाशी, नित्य शुद्ध पूर्ण आत्मा होते हुए भी सोचते हैं कि हम छोटे-छोटे मन हैं; हम छोटी-छोटी देह मात्र हैं— यही समस्त स्वार्थपरता की जड़ है।
मनुष्य जिस तरह से जगत् के संबंध में भयानक स्वार्थपरक मीमांसा करता है, उसे ग्रहण करना एक भीषण भूल होगी।
ईश्वर का स्मरण स्वार्थी मनुष्य को नहीं रहता।
वह शुद्ध व्यावसायिक या व्यावहारिक दृष्टिकोण है; जो जनता की समझ, रुचि, और सामर्थ्य को पहले ध्यान में रखती है, उनसे फ़ायदा उठाने के लिए : उन बातों को प्राथमिकता नहीं देती; जिनसे जनता का फ़ायदा न हो क्योंकि उसमें यह ख़तरा होता ही है कि उससे शायद व्यापार में लंबा फ़ायदा न हो, क्योंकि फ़ायदा पहुँचानेवाली चीज़ें कभी-कभी अप्रिय सत्य की तरह कड़वी और मुश्किल भी हो सकती है—जैसे साहित्य की भाषा, या किसी को सुसंस्कृत और शिक्षित करने की कोशिश।
इज़्ज़तदार आदमी, ऊँचे झाड़ की ऊँची टहनी पर दूसरे के बनाए घोंसले में अंडे देता है।
प्रेम यज्ञ में स्वार्थ और कामना का हवन करना होगा।
मनुष्य की मानसिक मनोवैज्ञानिक स्वार्थ-बुद्धि, ऊँचे आदर्शों को आगे करके उनके झंडे के नीचे काम करती है।
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अस्तेय और अपरिग्रह में बहुत थोड़ा भेद है। जिसकी हमें आज आवश्यकता नहीं है, उसे भविष्य की चिंता से संग्रहकर रखना परिग्रह है।
भक्ति और प्रेम से मनुष्य निःस्वार्थी बन सकता है। मनुष्य के मन में जब किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा बढ़ती है तब उसी अनुपात में स्वार्थपरता घट जाती है।
कामकाजी दृष्टि मनुष्य के स्वार्थ के साथ दृश्य वस्तु को जोड़कर देखती है और एक भावुक की दृष्टि अधिकतर निःस्वार्थ भाव की वस्तुओं का स्पर्श करती है।
न्याय और निष्काम कर्मयोग हृदय का है। बुद्धि से हम निष्कामता को नहीं पहुँच सकते।
जो आदमी सच्चा कलाकार है, वह स्वार्थमय जीवन का प्रेमी नहीं हो सकता।
जो मोहवश अपने हित की बात नहीं मानता है, वह दीर्घसूत्री मनुष्य अपने स्वार्थ से भ्रष्ट होकर केवल पश्चाताप का भागी होता है।
जिस तरह दानशीलता मनुष्य के दुर्गुणों को छिपा लेती है, उसी तरह कृपणता उसके सद्गुणों पर पर्दा डाल देती है।
निःसंदेह स्वार्थ भी त्याग की अपेक्षा रखता है, किंतु स्वार्थी व्यक्ति बाधित होकर ही त्याग करता है। प्रेम में त्याग स्वेच्छा से होता है, वहाँ त्याग में भी आनंद है।
प्रचार का अहंकार, प्रकृत-प्रचार का अंतराय (बाधक) है। वही प्रकृत प्रचारक है—जो अपने महत्व की बात भूलकर भी जबान पर नहीं लाता, और शरीर द्वारा सत्य का आचरण करता है, मन से सत्-चिंता में मुग्ध रहता है एवं मुख से मन के भावानुयायी सत्य के विषय में कहता है।
अमेरिका जब किसी विकासशील देश से औद्योगिक और व्यापारिक सहयोग करता है या सहायता करता है, तो उसमें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मुनाफ़े का उद्देश्य होता है।
लेकिन किसी स्वार्थबुद्धि से दूसरे की सुख्याति नहीं करनी चाहिए, वह तो ख़ुशामद है। ऐसे क्षेत्र में मन-मुख प्रायः एक नहीं रहते। यह बहुत ही ख़राब है और इससे अपने स्वाधीन मत-प्रकाश की शक्ति खो जाती है।
सभी पुरुष स्वार्थी, क्रूर और अविवेकी हैं—और मैं चाहती हूँ कि मुझे उनमें से कोई मिल जाए।
क्षमा और उदारता वही सच्ची है, जहाँ स्वार्थ की भी बलि हो।
यदि थोड़ी-सी लोकनिंदा, उपहास, स्वजनानुरक्ति, स्वार्थहानि, अनादर, आत्म या परगज्जना; तुम्हें अपने प्रेमास्पद से दूर रख सके, तो तुम्हारा प्रेम कितना क्षीण है—क्या ऐसी बात नहीं?
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