यदि मनुष्य का जन्म लेकर मैं मानवीय अस्तित्व के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकूँ, यदि मैं उसकी नियति को चरितार्थ नहीं कर सकूँ, तो उसकी सार्थकता ही क्या है?
एक सुसंस्कृत दिमाग़ को अपने दरवाज़े और खिड़कियाँ खुली रखनी चाहिए।
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विश्वबंधुत्व द्वारा शांति की स्थापना संसार का सर्वोच्च आदर्श है।
संकीर्णता के निकट जाने से मन संकीर्ण हो जाता है, एवं विस्तृति के निकट जाने से मन विस्तृति लाभ करता है। उसी प्रकार भक्त के निकट जाने से मन उदार होता है, और जितनी उदारता है उतनी ही शांति।
मानव में रूप, गुण और यौवन के होते हुए भी यदि उदारता नहीं है, तो सभी विशेषताएँ निरर्थक हो जाती हैं।
हिंदू-मुस्लिम विद्वेष या राजनीतिक विडंबना को दूर करने का प्रयत्न तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक कि प्रत्येक देशवासी, भारतवर्ष के वातावरण को सौहार्द और पारस्परिक औदार्य से परिप्लावित न कर देगा।
भक्ति ला देती है ज्ञान; ज्ञान से होता है सर्वभूतों में आत्मबोध, सर्वभूतों में आत्मबोध होने से ही आती है अहिंसा और अहिंसा से ही आता है प्रेम। तुम जितना भर इनमें से जिस किसी एक का अधिकारी होगे, उतना ही भर इन सभी के अधिकारी होगे।
शिक्षा के क्षेत्र में एक पुरुष अपनी स्वभाव-सुलभ कठोरता से असफल रह सकता है, परंतु माता के सहज स्नेह से पूर्ण हृदय लेकर; जब एक स्त्री उसी उग्रता का अनुकरण करके अपने उत्तरदायित्व को भूल जाती है, तब उसकी स्थिति दयनीय के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहती।
जहाँ कहीं महानता, हृदय की विशालता, मन की पवित्रता एवं शांति पाता हूँ, वहाँ मेरा मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता है।
पवित्रता ही आध्यात्मिक सत्य है। “पवित्र हृदयवाले धन्य हैं, क्योंकि वे ईश्वर का दर्शन करेंगे।” इस एक वाक्य में सब धर्मों का निचोड़ है। यदि तुम इतना ही सीख लो, तो भूतकाल में जो कुछ इस विषय में कहा गया है और भविष्यकाल में जो कुछ कहा जा सकता है, उस सबका ज्ञान तुम प्राप्त कर लोगे। तुम्हें और किसी ओर दृष्टिपात करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि तुम्हें उस एक वाक्य से ही सभी आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति हो चुकी। यदि संसार के सभी धर्म-शास्त्र नष्ट हो जाएँ, तो अकेले इस वाक्य से ही संसार का उद्धार हो सकता है।
उदारता, सत्य, कृतज्ञता, संतोष, करूणा और मैत्री—ये दिव्य जीवन प्राप्त करने के श्रेष्ठ साधन है।
यदि देश का प्रत्येक शिक्षित युवक, ऊँच-नीच के घृणित विचारों को छोड़कर; अपने आस-पास रहने वाले चार बालकों अथवा बालिकाओं को भी प्रतिवर्ष अशिक्षित से शिक्षित बना देने का संकल्प कर लेवे, तो परिणाम अत्यंत उत्साहवर्द्धक हो।
राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है। राष्ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है, उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं।
वीरता से आगे बढ़ो। एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य-जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे।
स्वयं अच्छे बनो और जो कष्ट पा रहे हैं, उनके प्रति दया-संपन्न होओ। जोड़-गाँठ करने की चेष्टा मत करो, उससे भवरोग दूर नहीं होगा। वास्तव में हमें जगत् के अतीत जाना पड़ेगा।
जब संकट आता है, जब बम गिरते हैं या बाढ़ आती है—तभी हम मनुष्य अपने श्रेष्ठतम रूप में प्रकट होते हैं।
इतिहास विज्ञान है, कल्प-कथा नहीं है। जब तक वैज्ञानिक दृष्टि से, धार्मिक द्वेष से मुक्त, तथ्यपरक इतिहास नहीं पढ़ाया जाएगा, तब तक साम्प्रदायिक द्वेष जा नहीं सकता।
जैसे पशु बलवान् होकर निर्बलों को दुःख देते और मार भी डालते हैं। जब मनुष्य शरीर पा कर वैसा ही कर्म करते हैं, तो वे मनुष्य स्वभावयुक्त नहीं, किंतु पशुवत् हैं। और जो बलवान् होकर निर्बलों की रक्षा करता है, वही मनुष्य कहाता है और जो स्वार्थवश होकर परहानि मात्र करता रहता है, वह जानो पशुओं का भी बड़ा भाई है।
हर एक मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे मनुष्य को इसी तरह, अर्थात् ईश्वर समझकर सोचे और उससे उसी तरह अर्थात् ईश्वर-दृष्टि से बर्ताव करे; उसे घृणा न करे, उसे कलंकित न करे और न उसकी निंदा ही करे। किसी भी तरह से उसे हानि पहुँचाने की चेष्टा भी न करे। यह केवल संन्यासी का ही नहीं, वरन् सभी नर-नारियों का कर्त्तव्य है।
मनुष्य के कठोर, मधुर और तीक्ष्ण—दो पक्ष हैं और बराबर रहेंगे। काव्यकला की पूरी रमणीयता इन दोनों पक्षों के समन्वय के बीच, मंगल या सौंदर्य के विकास में दिखाई पड़ती है।
न संख्या-शक्ति, न धन, न पांडित्य, न वाक्चातुर्य—कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुद्ध जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी।
मनुष्य का सर्वोपरि उद्देश्य, सर्वश्रेष्ठ पराक्रम धर्म ही है और यह सब से आसान है।
सामान्य मनुष्य में जो त्याग, करुणा, सहानुभूति, परोपकार, साहस आदि होते हैं—उन्हीं पर यह दुनिया टिकी है।
अनंत शक्ति के साथ धीरता, गंभीरता और कोमलता—'राम' का प्रधान लक्षण है। यही उनका 'रामत्व' है।
संसार को ऐसे लोग चाहिए, जिनका जीवन स्वार्थहीन ज्वलंत प्रेम का उदाहरण है। वह प्रेम एक-एक शब्द को वज्र के समान प्रभावशाली बना देगा।
संसार के मानव-समुदाय में वही व्यक्ति स्थान और सम्मान पा सकता है; वही जीवित कहा जा सकता है, जिससे हृदय और मस्तिष्क ने समुचित विकास पाया हो और जो अपने व्यक्तित्व द्वारा मनुष्य-समाज से रागात्मक के अतिरिक्त, बौद्धिक संबंध भी स्थापित कर सकने में समर्थ हो।
यदि कोई नैष्कर्म्य एवं निर्गुणत्व को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अपने मन में किसी प्रकार का जाति-भेद रखना हानिकर है।
जो विनम्र होता है, वह अपने को पूर्ण रूप से सुरक्षित रख सकता है। जो झुकना जानता है, वही तनकर खड़ा हो सकता है। जो सब कुछ त्याग कर सकता है, वह पूर्णकाम होता है। जो जर्जर हो जाता है, वह नव जीवन प्राप्त करता है। जो थोड़े में संतुष्ट रहता है, वह सफल हो जाता है। जो बहुत संचय करने का प्रयत्न करता है, वह पथभ्रष्ट हो जाता है।
मनुष्य से बड़ा कोई नहीं है। मनुष्य का जिससे कल्याण होता है, वही धर्म है। जो मनुष्य का हित करता है, वही साधु है। जो मनुष्य को ऊपर उठाता है, वही संत है। ईश्वर की सत्ता भी मनुष्य ने इसीलिए स्वीकार की है कि वह त्राता है, रक्षक है, लोक-हितकारी है।
संतुलित बुद्धि और उदार संवेदनशीलता से साहित्य अपने चारों तरफ़ देखता है—केवल राजनीति की ही तरफ़ नहीं, न किसी एक ही जगह खड़े होकर।
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बीस वर्ष की अवस्था में मैं अत्यंत असहिष्णु और कट्टर था। कलकत्ते में सड़कों के जिस किनारे पर थिएटर हैं, मैं उस ओर के पैदल-मार्ग से ही नहीं चलता था। अब तैंतीस वर्ष की उम्र में मैं वेश्याओं के साथ एक ही मकान में ठहर सकता हूँ और उनसे तिरस्कार का एक शब्द कहने का विचार भी मेरे मन में नहीं आएगा। क्या यह अधोगति है? अथवा मेरा हृदय विस्तृत होता हुआ मुझे उस विश्वव्यापी प्रेम की ओर ले जा रहा है, जो साक्षात् भगवान है?
जो पंजे के बल पर खड़ा होना चाहता है, वह ठीक से खड़ा नहीं हो सकता। जो अपने दोनों पैर फैला देता है, वह चल नहीं सकता। जो आत्म प्रंशसा करता है, वह यश प्राप्त नहीं कर सकता। अहंकारी मनुष्य में गुण नहीं रह सकते। जो अपने को सबसे ऊपर मानता है, वह ऊपर नहीं उठ पाता।
कोई आवश्यक नहीं कि मनुष्य उत्तम कवि व दार्शनिक हो, पर यह उसका प्रधान कर्तव्य है कि वह सात्विकशील हो।
किसी कर्म में प्रवृत्त होने से पहले, यह स्वीकार करना आवश्यक होता है कि वह कर्म या तो हमारे लिए या समाज के लिए अच्छा है। इस प्रकार की स्वीकृति कर्म की पहली तैयारी है।
सभी धर्म मेरे लिए पवित्र हैं।
यद्यपि मेघ को किसी वस्तु की इच्छा नहीं है, न ही उसमें स्वतः सामर्थ्य है, न किसी के प्रति विशेष प्रेम है और न किसी के साथ संसर्ग ही, फिर भी अति महान् वह जलद् संत्पत जनों के संताप को मिटाता ही है।
दूसरे के पास जाने से; होने वाली अत्यंत चिंता रूप अग्नि की सैकड़ों ज्वालाओं से जिनका अंतःकरण अस्पृष्ट रहता है, ऐसे वे वृक्ष ही अच्छी प्रकार जीते हैं।
मनुष्य उसी समय तक मनुष्य है, जब तक उसकी दृष्टि के सामने कोई ऐसा ऊँचा आदर्श है, जिसके लिए वह अपने प्राण तक दे सके।
धर्म के सिद्धांत संबंधी अंशों का उपदेश, आमतौर से जनता में दिया जा सकता है और सामुदायिक भी बनाया जा सकता है, पर उच्चतर धर्म सार्वजनिक रीति से प्रकट नहीं किया जा सकता।
चरित्र की ही सर्वत्र विजय होती है।
समाजोत्सव देखने के लिए बाहर से आए हुए आगंतुकों का पूजन, सत्कार, सम्मान करना चाहिए और विपत्ति में उनकी सहायता करनी चाहिए—यही समाज का मुख्य धर्म है।
मज़हबी कर्मकांड तथा रस्मो-रिवाज की रक्षा करने के स्थान पर देश तथा राष्ट्र की रक्षा करना, अपनी तथा मनुष्य जाति की उन्नति के लिए कहीं अधिक आवश्यक है।
तमोगण से हमारा देश छाया हुआ है—जहाँ देखो वहीं तम; रजोगुण चाहिए, उसके बाद सत्व; वह तो अत्यंत दूर की बात है।
तुम्हारे चरित्र के किसी भी उदाहरण से यदि किसी का मंगल हो, तो उससे उसको गुप्त मत रखो। तुम्हारा सत्स्वभाव कर्म में प्रस्फ़ुटित हो, किंतु अपनी भाषा में व्यक्त न हो, नज़र रखो।
किसी परिमित वर्ग के कल्याण से संबंध रखनेवाले धर्म की अपेक्षा, विस्तृत जनसमूह के कल्याण से संबंध रखनेवाले धर्म उच्च कोटि का है।
जिन्होंने रक्त की जगह पसीना भी न बहाया हो, जो स्वयं निरंकुश हों और जिन्होंने करोड़ों भाई-बहनों को ग़ुलामी की बेड़ी से जकड़ रखा हो, उन्हें हाथ-पैर हिलाए और ऊँचे उठे बिना आशा भी नहीं रखनी चाहिए कि संसार कि संसार उन्हें मनुष्य भी समझेगा।
मेरी परिकल्पना और मेरी रूझान के अनुकूल, आकर्षण के केन्द्र हैं आरंभ से ही—त्यागी की वृत्ति, सादा जीवन और उच्च विचार, तथा देश-सेवा के लिए हार्दिक अनुरक्ति।
किसी धर्म का सिद्धांत कितना ही उदात्त एवं उसका दर्शन कितना ही सुगठित क्यों न हो, जब तक वह कुछ ग्रंथों और मतों तक ही परिमित है, मैं उसे नहीं मानता।
किसी का भला न होता हो, तो उसका पवारा पसारना सामाजिक अपराध ही है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere