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उदारता पर उद्धरण

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यदि मनुष्य का जन्म लेकर मैं मानवीय अस्तित्व के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकूँ, यदि मैं उसकी नियति को चरितार्थ नहीं कर सकूँ, तो उसकी सार्थकता ही क्या है?

सुभाष चंद्र बोस
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एक सुसंस्कृत दिमाग़ को अपने दरवाज़े और खिड़कियाँ खुली रखनी चाहिए।

जवाहरलाल नेहरू
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वीरता से आगे बढ़ो। एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य-जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे।

स्वामी विवेकानन्द
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जैसे पशु बलवान् होकर निर्बलों को दुःख देते और मार भी डालते हैं। जब मनुष्य शरीर पा कर वैसा ही कर्म करते हैं, तो वे मनुष्य स्वभावयुक्त नहीं, किंतु पशुवत् हैं। और जो बलवान् होकर निर्बलों की रक्षा करता है, वही मनुष्य कहाता है और जो स्वार्थवश होकर परहानि मात्र करता रहता है, वह जानो पशुओं का भी बड़ा भाई है।

दयानंद सरस्वती
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हर एक मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे मनुष्य को इसी तरह, अर्थात् ईश्वर समझकर सोचे और उससे उसी तरह अर्थात् ईश्वर-दृष्टि से बर्ताव करे; उसे घृणा करे, उसे कलंकित करे और उसकी निंदा ही करे। किसी भी तरह से उसे हानि पहुँचाने की चेष्टा भी करे। यह केवल संन्यासी का ही नहीं, वरन् सभी नर-नारियों का कर्त्तव्य है।

स्वामी विवेकानन्द
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मानव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, वह किसी देश के संकीर्ण दायरे में आबद्ध नहीं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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विश्वबंधुत्व द्वारा शांति की स्थापना संसार का सर्वोच्च आदर्श है।

परमहंस योगानंद
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संकीर्णता के निकट जाने से मन संकीर्ण हो जाता है, एवं विस्तृति के निकट जाने से मन विस्तृति लाभ करता है। उसी प्रकार भक्त के निकट जाने से मन उदार होता है, और जितनी उदारता है उतनी ही शांति।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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मानव में रूप, गुण और यौवन के होते हुए भी यदि उदारता नहीं है, तो सभी विशेषताएँ निरर्थक हो जाती हैं।

वात्स्यायन
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हिंदू-मुस्लिम विद्वेष या राजनीतिक विडंबना को दूर करने का प्रयत्न तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक कि प्रत्येक देशवासी, भारतवर्ष के वातावरण को सौहार्द और पारस्परिक औदार्य से परिप्लावित कर देगा।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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भक्ति ला देती है ज्ञान; ज्ञान से होता है सर्वभूतों में आत्मबोध, सर्वभूतों में आत्मबोध होने से ही आती है अहिंसा और अहिंसा से ही आता है प्रेम। तुम जितना भर इनमें से जिस किसी एक का अधिकारी होगे, उतना ही भर इन सभी के अधिकारी होगे।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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शिक्षा के क्षेत्र में एक पुरुष अपनी स्वभाव-सुलभ कठोरता से असफल रह सकता है, परंतु माता के सहज स्नेह से पूर्ण हृदय लेकर; जब एक स्त्री उसी उग्रता का अनुकरण करके अपने उत्तरदायित्व को भूल जाती है, तब उसकी स्थिति दयनीय के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहती।

महादेवी वर्मा
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मनुष्यत्व के पराभव को अंतहीन, प्रतिकारहीन और चरम समझना मेरी दृष्टि में अपराध है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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मानव-समाज का सर्व प्रधान तत्त्व है, मनुष्य-मात्र का ऐक्य। सभ्यता का अर्थ है, एकत्र होने का अनुशीलन।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जहाँ कहीं महानता, हृदय की विशालता, मन की पवित्रता एवं शांति पाता हूँ, वहाँ मेरा मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता है।

स्वामी विवेकानन्द
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स्वयं अच्छे बनो और जो कष्ट पा रहे हैं, उनके प्रति दया-संपन्न होओ। जोड़-गाँठ करने की चेष्टा मत करो, उससे भवरोग दूर नहीं होगा। वास्तव में हमें जगत् के अतीत जाना पड़ेगा।

स्वामी विवेकानन्द
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मानवीय मूल्य मनुष्य के जैविक आत्म में उपजता है।

आशीष नंदी
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जब संकट आता है, जब बम गिरते हैं या बाढ़ आती है—तभी हम मनुष्य अपने श्रेष्ठतम रूप में प्रकट होते हैं।

रुत्ख़ेर ब्रेख़्मान
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इतिहास विज्ञान है, कल्प-कथा नहीं है। जब तक वैज्ञानिक दृष्टि से, धार्मिक द्वेष से मुक्त, तथ्यपरक इतिहास नहीं पढ़ाया जाएगा, तब तक साम्प्रदायिक द्वेष जा नहीं सकता।

हरिशंकर परसाई
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उदारता, सत्य, कृतज्ञता, संतोष, करूणा और मैत्री—ये दिव्य जीवन प्राप्त करने के श्रेष्ठ साधन है।

ज़रथुस्त्र
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यदि देश का प्रत्येक शिक्षित युवक, ऊँच-नीच के घृणित विचारों को छोड़कर; अपने आस-पास रहने वाले चार बालकों अथवा बालिकाओं को भी प्रतिवर्ष अशिक्षित से शिक्षित बना देने का संकल्प कर लेवे, तो परिणाम अत्यंत उत्साहवर्द्धक हो।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है। राष्ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है, उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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पवित्रता ही आध्यात्मिक सत्य है। “पवित्र हृदयवाले धन्य हैं, क्योंकि वे ईश्वर का दर्शन करेंगे।” इस एक वाक्य में सब धर्मों का निचोड़ है। यदि तुम इतना ही सीख लो, तो भूतकाल में जो कुछ इस विषय में कहा गया है और भविष्यकाल में जो कुछ कहा जा सकता है, उस सबका ज्ञान तुम प्राप्त कर लोगे। तुम्हें और किसी ओर दृष्टिपात करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि तुम्हें उस एक वाक्य से ही सभी आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति हो चुकी। यदि संसार के सभी धर्म-शास्त्र नष्ट हो जाएँ, तो अकेले इस वाक्य से ही संसार का उद्धार हो सकता है।

स्वामी विवेकानन्द
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एक व्यक्ति के महान होने के लिए उसमें तीव्र और व्यापक कल्पनाशक्ति का होना आवश्यक है, जिससे वह स्वयं को दूसरों की स्थिति में रख सके। उसे अपने समाज के सुख-दुःख को अपना ही समझने की संवेदना विकसित करनी चाहिए।

पी. बी. शेली
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मनुष्य के कठोर, मधुर और तीक्ष्ण—दो पक्ष हैं और बराबर रहेंगे। काव्यकला की पूरी रमणीयता इन दोनों पक्षों के समन्वय के बीच, मंगल या सौंदर्य के विकास में दिखाई पड़ती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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संख्या-शक्ति, धन, पांडित्य, वाक्चातुर्य—कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुद्ध जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी।

स्वामी विवेकानन्द
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मनुष्य का सर्वोपरि उद्देश्य, सर्वश्रेष्ठ पराक्रम धर्म ही है और यह सब से आसान है।

स्वामी विवेकानन्द
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सामान्य मनुष्य में जो त्याग, करुणा, सहानुभूति, परोपकार, साहस आदि होते हैं—उन्हीं पर यह दुनिया टिकी है।

हरिशंकर परसाई
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अनंत शक्ति के साथ धीरता, गंभीरता और कोमलता—'राम' का प्रधान लक्षण है। यही उनका 'रामत्व' है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कोई आवश्यक नहीं कि मनुष्य उत्तम कवि दार्शनिक हो, पर यह उसका प्रधान कर्तव्य है कि वह सात्विकशील हो।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जो विनम्र होता है, वह अपने को पूर्ण रूप से सुरक्षित रख सकता है। जो झुकना जानता है, वही तनकर खड़ा हो सकता है। जो सब कुछ त्याग कर सकता है, वह पूर्णकाम होता है। जो जर्जर हो जाता है, वह नव जीवन प्राप्त करता है। जो थोड़े में संतुष्ट रहता है, वह सफल हो जाता है। जो बहुत संचय करने का प्रयत्न करता है, वह पथभ्रष्ट हो जाता है।

लाओत्से
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मनुष्य से बड़ा कोई नहीं है। मनुष्य का जिससे कल्याण होता है, वही धर्म है। जो मनुष्य का हित करता है, वही साधु है। जो मनुष्य को ऊपर उठाता है, वही संत है। ईश्वर की सत्ता भी मनुष्य ने इसीलिए स्वीकार की है कि वह त्राता है, रक्षक है, लोक-हितकारी है।

हरिशंकर परसाई
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जो पंजे के बल पर खड़ा होना चाहता है, वह ठीक से खड़ा नहीं हो सकता। जो अपने दोनों पैर फैला देता है, वह चल नहीं सकता। जो आत्म प्रंशसा करता है, वह यश प्राप्त नहीं कर सकता। अहंकारी मनुष्य में गुण नहीं रह सकते। जो अपने को सबसे ऊपर मानता है, वह ऊपर नहीं उठ पाता।

लाओत्से
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बीस वर्ष की अवस्था में मैं अत्यंत असहिष्णु और कट्टर था। कलकत्ते में सड़कों के जिस किनारे पर थिएटर हैं, मैं उस ओर के पैदल-मार्ग से ही नहीं चलता था। अब तैंतीस वर्ष की उम्र में मैं वेश्याओं के साथ एक ही मकान में ठहर सकता हूँ और उनसे तिरस्कार का एक शब्द कहने का विचार भी मेरे मन में नहीं आएगा। क्या यह अधोगति है? अथवा मेरा हृदय विस्तृत होता हुआ मुझे उस विश्वव्यापी प्रेम की ओर ले जा रहा है, जो साक्षात् भगवान है?

स्वामी विवेकानन्द
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संसार के मानव-समुदाय में वही व्यक्ति स्थान और सम्मान पा सकता है; वही जीवित कहा जा सकता है, जिससे हृदय और मस्तिष्क ने समुचित विकास पाया हो और जो अपने व्यक्तित्व द्वारा मनुष्य-समाज से रागात्मक के अतिरिक्त, बौद्धिक संबंध भी स्थापित कर सकने में समर्थ हो।

महादेवी वर्मा
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यदि कोई नैष्कर्म्य एवं निर्गुणत्व को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अपने मन में किसी प्रकार का जाति-भेद रखना हानिकर है।

स्वामी विवेकानन्द
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संतुलित बुद्धि और उदार संवेदनशीलता से साहित्य अपने चारों तरफ़ देखता है—केवल राजनीति की ही तरफ़ नहीं, किसी एक ही जगह खड़े होकर।

कुँवर नारायण
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किसी कर्म में प्रवृत्त होने से पहले, यह स्वीकार करना आवश्यक होता है कि वह कर्म या तो हमारे लिए या समाज के लिए अच्छा है। इस प्रकार की स्वीकृति कर्म की पहली तैयारी है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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भारत का सत्य परिचय उसी मनुष्य में मिलता है, जिसके हृदय में मनुष्य-मात्र के लिए सम्मान है, स्वीकृति है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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दूसरे के पास जाने से; होने वाली अत्यंत चिंता रूप अग्नि की सैकड़ों ज्वालाओं से जिनका अंतःकरण अस्पृष्ट रहता है, ऐसे वे वृक्ष ही अच्छी प्रकार जीते हैं।

पण्डितराज जगन्नाथ
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धर्म के सिद्धांत संबंधी अंशों का उपदेश, आमतौर से जनता में दिया जा सकता है और सामुदायिक भी बनाया जा सकता है, पर उच्चतर धर्म सार्वजनिक रीति से प्रकट नहीं किया जा सकता।

स्वामी विवेकानन्द
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मनुष्य उसी समय तक मनुष्य है, जब तक उसकी दृष्टि के सामने कोई ऐसा ऊँचा आदर्श है, जिसके लिए वह अपने प्राण तक दे सके।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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सभी धर्म मेरे लिए पवित्र हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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यद्यपि मेघ को किसी वस्तु की इच्छा नहीं है, ही उसमें स्वतः सामर्थ्य है, किसी के प्रति विशेष प्रेम है और किसी के साथ संसर्ग ही, फिर भी अति महान् वह जलद् संत्पत जनों के संताप को मिटाता ही है।

पण्डितराज जगन्नाथ
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समाजोत्सव देखने के लिए बाहर से आए हुए आगंतुकों का पूजन, सत्कार, सम्मान करना चाहिए और विपत्ति में उनकी सहायता करनी चाहिए—यही समाज का मुख्य धर्म है।

वात्स्यायन
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चरित्र की ही सर्वत्र विजय होती है।

स्वामी विवेकानन्द
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हर राष्ट्र के लिए और हर व्यक्ति के लिए जिसको बढ़ना है, काम-काज और सोच-विचार के उन सँकरे घेरों को—जिनमें ज़्यादातर लोग बहुत अरसे से रहते आए हैं—छोड़ना होगा और समन्वय पर ख़ास ध्यान देना होगा।

जवाहरलाल नेहरू
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किसी मूर्त आदर्श में; जिनकी कर्ममय अटूट आसक्ति ने समय या सीमा को अतिक्रम कर, उन्हें सहज भाव से भगवान बना दिया है, जिनके काव्य, दर्शन एवं विज्ञान मन के भले-बुरे विच्छिन्न संस्कारों को भेद कर; उस आदर्श में ही सार्थक हो उठे हैं—वे ही हैं सद्‌गुरु।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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सत्य ही मेरा ईश्वर है तथा समग्र विश्व मेरा देश है।

स्वामी विवेकानन्द
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जिनकी भावना किसी बात के मार्मिक पक्ष का चित्रानुभव करने में तत्पर रहती है, जिनके भाव चराचर के बीच किसी को भी आलम्बनोपयुक्त रूप या दशा में पाते ही उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं, वे सदा अपने लाभ के ध्यान से या स्वार्थबुद्धि द्वारा ही परिचालित नहीं होते।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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