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U. R. Ananthamurthy

1932 - 2014 | دوسرا, کرناٹک

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वेदव्यास और वाल्मीकि में से कोई भी जाति के आधार पर महान नहीं बने थे।

  • विषय : 1

कन्नड़ भाषा और संस्कृति को चाहने वाले लेखकों की तरह मुझे भी अन्य भाषा की निंदा-तिरस्कार करना पसंद नहीं है।

गांधी मानते हैं कि मनुष्य का लोभ ही उसके नाश का कारण है। लेकिन मार्क्स के अनुसार यह लोभ ही मानव के इतिहास की प्रगति का लक्षण है। मार्क्स की तरह गांधी पूर्वग्रह से पीड़ित नहीं थे।

जब भाषा अपने निजीपन को खोकर भी; लक्ष्य-भाषा-संस्कृति में अपने स्वभाव-गुणों को क़ायम रखती है, तभी अनुवाद अच्छा कहलाएगा।

हममें ऐसे उन्मुक्त संवेदनशील संसार का निर्माण करने की ललक होनी चाहिए कि संसार का कोई भी व्यक्ति; स्वेच्छा से कर्नाटक वाला बन सके और उसी तरह कर्नाटक का कोई व्यक्ति संसार के किसी भी प्रदेश वाला बन सके।

  • विषय :

गांधी और मार्क्स, दोनों अपनी-अपनी संस्कृति के विशेष अनुभव के कारण ही सार्वत्रिक सच की स्थापना कर सके।

गांधी जी ने जो परिवर्तन चाहा था; वह व्यक्ति का भीतरी परिवर्तन था और वह समाज का था, क्योंकि भीतर और बाहर में कोई विभेद करने वाला दर्शन था वह। सामाजिक पीड़ा को भी गांधी जी ने व्यक्ति की आंतरिक वेदना के रूप में देखा।

हमें पश्चिम के विचार क्यों आदर्श लगें? क्या हम 'संपूर्ण' भारतीय बनकर नहीं लिख सकते हैं। अँग्रेज़ी शिक्षण से प्रभावित होकर क्या हम उनके अनुकरण के सिवाए कुछ बकर सकते हैं? हममें हीनभावना क्यों है?

  • विषय :

हमारा भाषा-आंदोलन तो मुक्ति का आंदोलन है, जिसमें शूद्र को शूदत्व से मुक्ति और ब्राह्मण को ब्राह्मणत्व के अहं से मुक्ति है।

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संगीतकार, लेखक या चित्रकार का समय, ऐतिहासिक समय से बहुत अलग होता है।

  • विषय : 1

अगर लोग कभी भी मरते रहते होते तो हिटलर अब भी जीवित होता, स्टालिन अब भी जीवित होता। वे सारे लोग जिनसे हम नफ़रत करते हैं, वे अब भी जीवित होते और यह संसार एक भयानक जगह हो गया होता।

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मात्र शुद्र प्रज्ञा से केवल लोक-साहित्य प्रसूत होता है। मात्र ब्राह्मण प्रज्ञा से निर्वीर्य, सुनिपुण और परिष्कृत और स्नायुशक्तिहीन साहित्य की रचना होती है। इन दोनों का मिलन होने पर ही पूर्ण प्रज्ञा का साहित्य संभव हो पाता है।

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हमारे देश की संस्कृति में मुस्लिम कभी भी अड़चन नहीं रहे।

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अगर आप लेखक या कलाकार हैं तो मुझे लगता है, आप प्रगति की अवधारणा पर गहरा संदेह करेंगे। आज प्रगति की अवधारणा एक ऐसी पवित्र अवधारणा हो गई है कि अगर आप किसी की प्रशंसा भी करना चाहते हैं तो आप कहेंगे कि वह बहुत प्रगतिशील व्यक्ति है।

  • विषय :
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हमारी सारी बौद्धिक गतिविधियाँ, शब्दकोष से सीखी गई कृत्रिम अँग्रेज़ी के सहारे चलती हैं।

  • विषय :
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दिल्ली सांस्कृतिक केंद्र नहीं है। इसी तरह वहाँ की राजनीति के अधिकार भी विकेंद्रित होने चाहिए।

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भारतवासियों के अनुभवों को लिखने वाली, बताने वाली भाषा के रूप में हिंदी का विकास होना चाहिए।

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अचानक किसी मृत्यु की याद, किसी प्रेम की स्मृति, विफलता की स्मृति—ये सब एक छोटी-सी घटना के सहारे आपस में जुड़ जाती हैं; यही प्रभु-प्रकाश है। अगर यह कला की सामग्री है तो मैं सोचता हूँ कि इक्कीसवीं शती में भी कला की सामग्री यही रहेगी।

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तकशी, कारंत, कुवेंपू जैसे उपन्यासकार, सलमान रुश्दी से श्रेष्ठ लेखक हैं। रुश्दी अमीरों के लिए होशियारी से लिखता है। आम लोगों के बारे में सही ढंग से लिखने वालों को अधिक जीवनानुभव की आवश्यकता होती है।

प्रगतिशील देशों के सामने एक ही आदर्श है—अमरीका। अमरीका जैसा बनना ही उनका उद्देश्य है। लेकिन अमरीका में भी कुछ लोगों को संभवतः मालूम है कि वह व्यवस्था ज़हरीली है।

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संसार में क्रांतिकारी शक्ति केवल मृत्यु है। वे शक्तियाँ क्रांतिकारी नहीं, जिन्हें हमने बनाया है।

  • विषय :
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शताब्दियों के संदर्भ में सोचना; जैसा कि हम करते हैं—एक तरह से कृत्रिम है क्योंकि यह डायरी की केवल एक तारीख़ है।

  • विषय :
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गांधी जी जानते थे कि जो कुछ हम देखना चाहते हैं; उसे उसकी अतिरेक अवस्था में देखने की क्षमता यदि हममें हो, तो सत्य का द्वार खुल जाता है।

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गांधी जितने हिंदू हैं, उतने ही ईसाई भी।

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गांधी भी थोरो, रस्किन, टॉलस्टॉय से अवश्य प्रभावित हुए थे। भारतीय लेखकों के भी अपनी परंपरा से अलग सार्त्र, काफ़्का या दक्षिण अफ़्रीक़ा के अचिबे जैसे लोगों से प्रेरित कोने में कोई ग़लती नहीं है। लेकिन उपनिवेश की प्रेरणा आपसी लेन-देन की प्रक्रिया में, निर्यात से अधिक आयात हो जाना अत्यंत बुरा है।

  • विषय : 1

हमेशा पहले शासित लोगों की भाषा से शासक लोगों की भाषा में अनुवाद होना चाहिए।

आप किस प्रकार के तकनीकी ज्ञान से उत्पादन और वितरण में लगे हैं—इसके आधार पर समाज या सभ्यता का निर्माण होता है।

शासन का भय घटता जाए और हम स्व-प्रेरणा से काम करने वाले नागरिक बन जाएँ।

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सृजनात्मकता अत्यंत गहरी होती है। कभी जो सुनते, पढ़ते, देखते आते हैं—वही सब अचानक कलात्मक रूप ले लेता है।

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सार्वजनिक जीवन रहना चाहिए। वाच्यार्थ स्पष्ट रहना चाहिए। ध्वन्यार्थ भी स्पष्ट रहना चाहिए। लेकिन आज के कई राजनीतिज्ञों में 'शर्म' जैसी नैतिक भावना ही नहीं है।

अछूत दलित की अवमानना की अवस्था केवल व्यक्तिगत नहीं होती।

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पूरे भारत की संवेदना को अभिव्यक्त करने की क्षमता हिंदी में आनी चाहिए।

  • विषय : 1

सारे मनुष्यों को इस संसार में रहते हुए ही संपूर्ण सत्य का साक्षात्कार करना पड़ता है। किसी भी स्थिति में हमें इस दुनिया की समस्याओं से भागना नहीं है। हमारी किसी भी अवस्था में इस सांसारिक स्थिति से छुटकारा नहीं।

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किसी भी कला या सृजनशीलता का अपने से दूर जाकर ही अच्छी तरह उद्भव हो सकता है।

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राम का जन्म अयोध्या में नहीं हुआ था बल्कि जब गोडसे ने गांधी को पिस्तौल से मारा था, तब गांधी के मुँह से जो राम निकला, वह असली राम था।

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जब एक अपमानित व्यक्ति स्वाभिमानी बन जाता है तब उससे निर्मित होने वाले साहित्य की अपनी एक विशेषता होती है। गुणात्मकता की दृष्टि से हम उसे प्रतिरोधी साहित्य कहते है।

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संस्कृति हर तरह की भावनाओं, मानसिकता, हर तरह के सुख-दुख, धर्म, जाति—सब का अभिव्यक्त-अव्यक्त रूप है। संस्कृति मेरी नजर में 'More anthropological' है।

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लोक-जीवन की संस्कृति की जानकारी होने से बुद्धिवादी ओरी से लटकने वाला ब्रह्मराक्षस बन जाता है।

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भारतीय संस्कृति अगस्त्य ऋषि का पेट है। सृष्टि के वैविध्य और वैषम्य—दोनों को आसानी से पचा लेने की प्रवृत्ति हमारी है। यह एक जठराग्नि है।

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ईलियट ने कहीं कहा है कि दांते अपनी 'डिवाइन कॉमेडी' इसलिए लिख सके क्योंकि मध्ययुग में सभी बच्चों को बिंबों और रूपकों के सहारे देखना सिखाया जाता था।

मैं अब ‘संस्कृति’ शब्द का प्रयोग नहीं करूँगा, मैं अब ‘सभ्यता’ शब्द का प्रयोग करना चाहता हूँ।

हिंदी को सबके स्वीकार की भाषा होना था।

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शासन अक्सर एक समस्या ही है। यह या तो आवश्यकता से अधिक होता है अथवा शक्तिहीन होकर अराजकता का कारण बन जाता है। विडंबना यह है कि शासन का आवश्यकता से अधिक होना भी विरोध का कारण बन जाता है और अराजकता पैदा होती है।

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हिंदी के लोग भारत की अन्य प्रांतीय भाषाएँ सीखते नहीं, इसलिए हिंदी का विकास नहीं हुआ है।

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हमारी संस्कृति को उन्हीं ग्रामीण लोगों ने जीवित रखा हुआ है जो अँगूठाछाप हैं।

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प्यार से उत्पन्न प्रणय के शांत-रस का आस्वादन एक लंपट व्यक्ति नहीं कर सकता।

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मेरे अनुसार साहित्य में परिपूर्ण साक्षात्कार की सिद्धि प्राप्त होती है क्योंकि साहित्य में प्रैक्टिकल सच के अलावा भावना से परे सच की सिद्धि भी संभव है।

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भारत को बचाने वाली एक चीज़ यह रही है कि यहाँ अनेक शताब्दियाँ एक साथ रहती हैं।

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यदि हम चरख़ा जैसे प्रतीक यंत्र की तलाश में होते तो शायद भारत विश्व में एक महान संस्कृति बन जाता।

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हम रूस को समझने के लिए, यूरोप को समझने के लिए जितना कष्ट उठाते हैं, उतना वे लोग हमारी संस्कृति को समझने के लिए नहीं उठाते।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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