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अवास्तविक पर उद्धरण

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पाखंडी लोग कितनी आसानी से इस जगत् को धोखे में डाल देते हैं। सभ्यता के प्राथमिक विकास-काल से लेकर भोली-भाली मानव-जाति पर, जाने कितना छल-कपट किया जा चुका है।

स्वामी विवेकानन्द
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दरअसल इस संक्राति-युग में भी; जो कवि मध्यवर्गीय मनःस्थिति को लेकर भावुकता से भरी हुई अनेक सफल कविताएँ लिख लेते हैं, उनके बारे में यह समझना चाहिए कि या तो वे वास्तविकता का अतिसरलीकरण करते हैं, अथवा वे उसकी उलझनों से घबड़ाकर ऊपरी सतह की रंगीनियों में रस लेते हैं।

नामवर सिंह
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यथार्थ के प्रति मनुष्य की जानकारी बदलती रहती है या दूसरे शब्दों में वह विकसित होती रहती है। तब उस यथार्थ विशेष का बोध कराने वाले शब्द का अर्थ भी बदलता रहता है।

विजयदान देथा
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आँखें एक जैसी होने पर भी देखने-देखने में फ़र्क़ होता है।

रघुवीर चौधरी
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दुनिया में दु:ख तो बहुत हैं, परंतु अगम-अगाध गंभीर दु:ख बहुत ही कम! ठीक वैसे ही जैसे कामबोध की खुजलाहट तो सबके पास है, परंतु निर्मल उदात्त प्रेम की क्षमता बिरले के ही पास होती है।

कुबेरनाथ राय
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शरीर अंततः अवास्तविक है।

रघुवीर चौधरी
  • संबंधित विषय : देह
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समाज में एक बड़ी संख्या अभी भी उन व्यक्तियों की है, जो अपने मूल पशुत्व और स्वार्थ पर सभ्यता का सिर्फ़ मुलम्मा चढ़ाए हुए हैं—एक दिखावटी आवरण।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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साहित्य के आचार्यों की बात करनी चाहिए। ये रसवादी प्रकार के आचार्य हैं। ये रँडुए होकर भी अपने-आप हृदय में शृंगार रस जाने कैसे पैदा कर लेते हैं? इन्हें आलम्बन भी नहीं चाहिए शायद, क्योंकि आलम्बन और चेतना का द्वंद्व होने लगता है।

हरिशंकर परसाई
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कोरी साधुता का उपदेश पाखंड है, कोरी वीरता का उपदेश उद्दंडता है, कोरे ज्ञान का उपदेश आलस्य है, और कोरी चतुराई का उपदेश धूर्तता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जो केवल मुक्ताभास-हिमबिंदुमंडित मरकताभशाद्वलजाल, अत्यंत विशाल गिरिशिखर से गिरते हुए जलप्रपात के गंभीर गर्त से उगी हुई; सीकर नीहारिका के बीच विविध-वर्णस्फुरण की विशालता, भव्यता और विचित्रता में ही अपने हृदय के लिए कुछ पाते हैं, वे तमाशबीन हैं—सच्चे भावुक या सहृदय नहीं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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विज्ञापनों द्वारा की गई दुनिया की व्याख्या और वास्तविक दुनिया में बहुत विरोध है।

जॉन बर्जर
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भक्ति, वीरता और सैक्स की मिली-जुली मानसिकता; फ़िल्मी हीरो को नेता, उद्धारक और पथ-प्रदर्शक बना देती है।

हरिशंकर परसाई
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जिसमें भाव का पता देनेवाला अथवा भाव जाग्रत करनेवाला, कोई शब्द या वाक्य अथवा प्रस्तुत प्रसंग के प्रति किसी प्रकार का भाव उत्पन्न कराने में समर्थ अप्रस्तुत वस्तु या व्यापार हो, केवल दूर की सूझ या शब्दासाम्यमूलक विलक्षणता हो, वह उक्ति काव्याभास होगी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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विज्ञान में सत्य-मिथ्या का विचार ही अंतिम विचार होता है। इसी कारण से वैज्ञानिक की अंतिम अपील, विचारक के व्यक्तिगत संस्कार के ऊपर प्रमाण में होती है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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राजनीति में जब एक गुट पिट जाता है, तो वह असंतुष्ट होकर जनता के दुःखों पर विलाप करने लगता है।

हरिशंकर परसाई
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कोरे उपदेशों का ग्रहण ऊपर से होता है। वे तो हृदय के मर्म को ही भेद सकते हैं, बुद्धि की कसौटी पर स्थिर भाव से जमे रह सकते हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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पुस्तकालयों पर सभी की नज़र रहती है—ठीक वैसी ही जैसी किसी अजायबघर पर। बाहर से कोई आया तो हम अपने वाचनालय और पुस्तकालय दिखला देते हैं, ताकि उन्हें विश्वास हो कि हमारा बौद्धिक स्तर क्या है।

हरिशंकर परसाई
  • संबंधित विषय : नक़ल
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एक बार वास्तविक समझ ली जाने पर भ्रांतियाँ अनुभव की अवहेलना करने लग जाती हैं।

एम. एन. राय
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जिस तरह परानुभूति विशिष्ट को केंद्र में लाकर हमें गुमराह करती है, उसी तरह समाचार असामान्य को केंद्र में लाकर हमें छलता है।

रुत्ख़ेर ब्रेख़्मान
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नींद में आदमी जो सपना देखता है, उसे वह सही मानता है। जब उसकी नींद खुलती है तभी उसे अपनी ग़लती मालूम होती है। ऐसी ही दशा सभ्यता के मोह में फँसे हुए आदमी की होती है।

महात्मा गांधी
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प्रत्यक्ष निश्चय कराता है और परोक्ष अनिश्चिय में डालता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जो प्रतिज्ञा प्रत्यक्ष प्रमाण से ही बाधित हो, अर्थात् प्रत्यक्ष प्रमाण से ही अयथार्थ (असत्य) सिद्ध हो जाए, उसे प्रत्यक्षबाधिनी प्रतिज्ञा कहते हैं। यथा, अग्नि शीतल है, रूप का अस्तित्व नहीं है, चंद्रमा उष्ण है।

भामह
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कोरा किताबी ज्ञान मनुष्य को धोखा भी दे सकता है, किन्तु संघर्षों से निकली हुई शिक्षा कभी भी झूठी नहीं होती।

रामधारी सिंह दिनकर
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किसी किसी जादू या टोने में यक़ीन किए बग़ैर, कवि या लेखक बने रहना शायद ही संभव हो।

कृष्ण कुमार
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हम अपनी काल्पनिक सृष्टि से सत्य को ढकने की कोशिश करते हैं और असलियत से अपने को बचाकर, सपनों की दुनिया में विचरने का प्रयत्न करते हैं।

जवाहरलाल नेहरू
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प्राण-संशय होने पर प्राणियों के लिए कुछ भी अकरणीय नहीं होता है।

कल्हण
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नाटक में सत्य एक शाश्वत मरीचिका है।

हेरॉल्ड पिंटर
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आधुनिकता का प्रभाव बीमारी के रूप में लोगों के मन में घुस गया है। इस बीमारी का पहला दुष्परिणाम यह है कि आदमी जो जीता है, उससे भिन्न रूप दिखाता है।

कृष्ण बिहारी मिश्र
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भोलेपन से ख़ाली तथा दगीली ख़ूबसूरती पहले तो कोई ख़ूबसूरती ही नहीं है, और कदाचित् हो भी तो कुटिलाई और बाँकपन लिए; हाव-भाव दूषित, मलिन और अपवित्र मन की खोटाई के साथ, ऊपर से रंगी-चुंगी सुंदरता छूत के समान देखने वालों के मन में अवश्य अपवित्र और दूषित भाव पैदा करेगी।

बालकृष्ण भट्ट
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यथार्थ और भ्रम के अपने-अपने आकर्षण हैं। यथार्थ को जानते हुए भ्रम में रहना एक तीसरा रास्ता है, और उसके आकर्षण कम नहीं।

कृष्ण कुमार
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यथार्थ क्या है और अयथार्थ क्या है–इसका कोई स्पष्ट भेद नहीं रहा है और ही सच्च झूठ में कोई अंतर रहा है।

हेरॉल्ड पिंटर
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कल्पना और काल्पनिकता—दोनों में बड़ा अंतर है। सच्ची कल्पना युक्ति, संयम और सत्य के द्वारा सुनिर्दिष्ट आकार में बँधी होती है, काल्पनिकता में सत्य का आभास-मात्र होता है। लेकिन वह अद्भुत अतिरंजना से असंहत रूप में फूली हुई होती है, उसमें जो थोड़ा-बहुत प्रकाश होता है—उससे सौ गुना ज़्यादा धुआँ होता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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प्रकृति उन्हें धिक्कारती है, जो कि प्रत्यक्ष की अवज्ञा या अग्राह्य कर परोक्ष का आलिंगन करते हैं। और परोक्ष जिनके प्रत्यक्ष को रज्जित वा लांछित करता है—ये ही धोखे के अधिकारी होते हैं।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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जब आप राजनीति में शुद्धता की तलाश शुरू करते हैं, तब आप अंततः अवास्तविकता तक पहुँच जाते हैं।

मारियो वार्गास ल्योसा
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वृहत्तर अर्थों में प्रसन्नता कोई ऐसी यथार्थवादी खोज नहीं है। प्रसन्नता एक क्षण है। प्रसन्नता एक तितली है। मैं जब कोई रचना पूरी कर लेता हूँ तो मुझे प्रसन्नता महसूस होती है।

महमूद दरवेश
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जो केवल प्रफुल्लप्रसूनप्रसार के सौरभ-संचार, मकरंदलोलुपधुपगुंजार, कोकिलकूजित निकुंज और शीतल सुखस्पर्श समीर इत्यादि की ही चर्चा किया करते हैं, वे विषयी भोगलिप्सु हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

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