‘यह सुरक्षित कुसुम ग्रहण करने योग्य है; यह ग्राम्य है, फलतः त्याज्य है; यह गूँथने पर सुंदर लगेगा; इसका यह उपयुक्त स्थान है और इसका यह’—इस प्रकार जैसे पुष्पों को भली-भाँति पहचानकर माली माला का निर्माण करता है, उसी प्रकार सजग बुद्धि से काव्यों में शब्दों का विन्यास करना चाहिए।
सभ्यता इस तरह होनी चाहिए कि आदमी को अपने जीवन का अर्थ खोजने के लिए आज़ादी मिले।
व्याकरण रूपी सागर के सूत्र जल हैं, वार्तिक आवर्त्त (भँवर) हैं, पारायण (भाष्य, कौमुदी आदि) रसातल हैं, धातुपाठ, उणादि, गणपाठ आदि ग्राह हैं। (उस व्याकरण रूपी सागर) को पार करने के लिए चिंतन-मनन विशाल नाव है। धीर व्यक्ति उसके तट को लक्ष्य बनाते हैं और बुद्धिहीन व्यक्ति उसकी निंदा करते हैं। समस्त अन्य विद्या रूपी हथिनियाँ उसका निरंतर उपभोग करती हैं। इस दुरवगाह्य व्याकरण रूपी सागर को बिना पार किए कोई व्यक्ति शब्द रूपी रत्न तक पहुँचने में समर्थ नहीं हो पाता।
हमारी यथार्थ अर्थवत्ता हमारे अपने बीच में नहीं है, वह समस्त जगत के मध्य फैली हुई है।
जो सार्थक है, वही समकालीन है—वह नया हो या पुराना।
सत्यकाव्य का प्रणयन पुरुषार्थचतुष्टय एवं कलाओं में निपुणता, आनंद और कीर्ति प्रदान करता है।
यौन आवेग से प्रभावित होकर सौंदर्य-संबंधी मान्यताएँ बदल जाती हैं। प्रेमी की दृष्टि से बहुत-सी बातें सुंदर होती हैं, जो अप्रेमी की दृष्टि से सुंदर नहीं हैं और प्रेमी जिस हद तक अपने आवेग से विचलित होगा, उसी हद तक उसकी सौंदर्य-संबंधी मान्यताएँ बदल जाएँगी।
जीवन का रहस्य ही अंतिम जिज्ञासा है। यही तो मानवीय प्रज्ञा का सुंदर पहलू है।
कविता हमारे मनोभावों को उच्छ्वसित करके, हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है।
एक कवि में अगर दूर तक सोच सकने की ताक़त नहीं; तो उसकी कविता या तो यथार्थ की सतह को खरोंचकर रह जाएगी, या किसी भी आदर्श से चिपककर।
सच्चा कवि उसी व्यक्ति या वस्तु का स्वरूप कल्पना में लाएगा, जिसके प्रति उसकी किसी प्रकार की अनुभूति होगी।
भारतीयता, समकालीनता, स्थानीयता, सामाजिकता आदि के हम कला में क्या अर्थ लगाते हैं, यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि इनका आज हमारे जीवन में क्या अर्थ है।
सुंदर अर्थ की शोभा बढ़ाने में जो अलंकार प्रयुक्त नहीं, वे काव्यालंकार नहीं हैं। वे ऐसे ही हैं, जैसे शरीर पर से उतारकर किसी अलग कोने में रखा हुआ गहनों का ढेर। किसी भाव या मार्मिक भावना से असम्पृक्त अलंकार, चमत्कार या तमाशे हैं।
घुमक्कड़ प्रकृति या मानवता को तटस्थ दृष्टि से नहीं देखता, उनके प्रति उसकी अपार सहानुभूति होती है और यदि वह वहाँ पहुँचता है; तो केवल अपनी घुमक्कड़ी प्यास ही पूरा नहीं करता, बल्कि दुनिया का ध्यान उन पिछड़ी जातियों की ओर आकृष्ट करता है।
अनुप्रास और यमक आदि शब्दाडंबर कविता के आधार नहीं, जो उनके न होने से कविता निर्जीव हो जाए, या उससे कोई अपरिमेय हानि पहुँचे। कविता का अच्छा या बुरा होना विशेषतः, अच्छे अर्थ और रस-बाहूल्य पर अवलंबित है।
मैं अर्थछठाओं के पीछे भागता हूँ—उन दुर्गाह्य क्षणभंगुर अर्थछठाओं के पीछे। उन्हीं में तो जीवन की चिंगारियाँ छिपी होती है, नाच-गाने भी गले की फाँस नहीं होते, वे रचनात्मक तत्व होते हैं और अगर कथ्य व संदर्भ की मांग हो, तो उनमें अनगिनत संभानाएँ होती हैं। अगर भारत में कोई सच्चा गंभीर कलाकार; इस पर अपने तमाम बुद्धि वैभव को दाँव पर लगा देगा, आख़िर मिजोगुची और कुरोसावा या किनुगासा जैसे लोगों ने नोह और काबुकी को अपने हाथों निचोड़कर ही तो उससे अपने नितांत वैयक्तिक वक्तव्य अर्जित किए थे।
अर्थ-सौरम्य ही कविता का प्राण है। जिस पद्य में अर्थ का चमत्कार नहीं, वह कविता नहीं।
विद्या, भूमि, सुवर्ण, पशु, धान्य, भाँड, वस्त्राभूषणादि घर के उपकरण और मित्र आदि का अर्जन और अर्जित किए हुए का वर्द्धन 'अर्थ' है।
एक महान् कवि या उपन्यासकार केवल कुछ ही कारणों से महान् नहीं होता, कई कारणों से होता है। उसकी महानता की एक कसौटी यह भी है कि उसका कृतित्व अनेक दृष्टिकोणों से व्याख्या को आमंत्रित करता है और उन पर खरा उतरता है।
कवि की इच्छा जो रहे, रसिक अपनी रुचि का अर्थ उस काव्य में से निकाल लेता है।
एक कलाकृति की सतह; उसकी भाषा के दृश्य-संकेत, उतना ही बड़ा सत्य है—जितनी उसके अर्थ की गहराई। दोनों अभिन्न रूप से कला के सम्मुख सत्य के साथ जुड़े हैं; बिना एक को जाने दूसरे को जानना असंभव है। दरअसल कला का रहस्य दोनों के अंतर्निहित रिश्ते में वास करता है।
साहित्य की अखंड दीर्घ परंपरा सभ्यता का लक्षण है। यह परंपरा शब्द की भी होती है और अर्थ की भी।
कबीर या ग़ालिब की भाषा अक्सर यह भ्रम उपजाती है कि वह आसान है, क्योंकि उसमें पहचाने जा सकनेवाले रोज़ की भाषा के शब्द हैं। लेकिन उनकी कविता वस्तुतः शब्द-कठिन नहीं, अर्थ-कठिन कविता है।
कविता में शब्दों की सत्ता, बोलचाल की भाषा में शब्दों की सत्ता से अलग होती है। क्योंकि वे केवल प्रत्यक्ष अर्थ नहीं; परोक्ष अर्थ की ज़रूरतों से भी निदेशित होते हैं, इसलिए उनकी भाषिक संरचना ऊपर से सामान्य दिखते हुए भी सामान्य नहीं होती।
शमशेर को पढ़ना केवल उनकी कविताओं के अर्थ को ग्रहण करना नहीं है, रचनात्मकता के अर्थ को भी अनुभव करना है।
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साहित्य उसी रचना को कहेंगे; जिसमें कोई सच्चाई प्रकट को गई हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित एवं सुंदर हो और जिसमें दिल और दिमाग़ पर असर डालने का गुण हो।
हम पर्याप्त, बल्कि औसत तौर पर अति-मुखरता के अभ्यस्त है। हम चाहते है कि शब्द अर्थ का संपूर्ण वक्तव्य हो, अर्थ का संकेत नहीं।
जो मनुष्य तौला हुआ शब्द बोलेगा, जिस शब्द में अतिशयोक्ति नहीं होगी, सत्य हो, मधुरता हो, फिर भी कार्य की शक्ति हो और बोलनेवाले का चित्त अक्षोभ हो, तो वह शब्द कारगर होगा।
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कविता में शब्द; असली अर्थ में शब्द बनते हैं, जैसे मूर्ति में पत्थर असली अर्थ में पत्थर बनता है।
जो प्रतिभावान साहित्यिक होता है, उसके ग्रंथ से नित्य नया अर्थ निकलता है।
काव्य में अर्थग्रहण मात्र से काम नहीं चलता, बिंबग्रहण अपेक्षित होता है।
मौसम मेरे चारों ओर है ज़रूर, पर अपना अर्थ खो चुका है।
यदि हर रचना सार्थक शब्द है और उस शब्द का कुछ अर्थ है, तो यह अर्थ और कुछ नहीं—उसका संदर्भ है।
सही मानों में कविता यथार्थ पर उससे कहीं ज़्यादा गहरे संबंधों, विचारों और आत्म-मंथन का नतीजा होती है।
उत्तम साहित्यिक शब्द, स्वल्पाक्षर होते हैं। बहुत पानी डालकर पतले किए हुए नहीं होते। स्वल्पाक्षर होते हैं, यानी थोड़े में अधिक सूचकता होती है और उनमें अनाक्रमणशीलता होती है, जिससे सहज ही बोध मिले।
हमारी मृत्यु हमें धरती पर, अपने समय का ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग करने की प्रेरणा और इच्छा दे सकती है। बहुत अधिक समय तक खींचा गया जीवनकाल, हमारे जीवन को आकस्मिकता और अर्थ रहित कर देगा, जबकि यह ऐसी इच्छा होती है, जिसमें हर दिन कीमती लगता है।
जितना जीवन-विवेक रामचरितमानस में है, उतना मेरी दृष्टि से किसी महाकाव्य में नहीं है। हर अर्धाली का आधा हिस्सा नीति और जीवन-बोध का है।
काव्य में, कवि-परंपरा द्वारा प्रयुक्त्त, श्रुतिपेशल और सार्थक शब्द ही प्रयोग करना चाहिए। पदविन्यास की चारुता अन्य सभी अलंकारों से बढ़कर है।
साहित्यकार की दृष्टि केवल तत्काल पर ही नहीं रहती; क्योंकि वह केवल 'नया' कुछ ही नहीं, 'स्थायी' कुछ भी रचना चाहता है।
शब्द और अर्थ दोनों मिलकर ही काव्य कहलाते हैं। यह काव्य दो प्रकार का होता है : गद्य और पद्य। संस्कृत, प्राकृत और इनसे भिन्न अपभ्रंश—भाषा के आधार पर यह तीन प्रकार का होता है।
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शब्दों के अर्थ केवल व्युत्पत्ति से नहीं बनते, प्रयोग से उभरते हैं।
अर्थ की प्रतीति के लिए कथित अकारादि वर्णों का सार्थक समुदाय ही शब्द कहा जाता है।
साहित्य की ख़ूबी व्यंजना में, लक्षणा में है, सुझाने में है—आज्ञा में नहीं है, साक्षात् उपदेश में नहीं है। जहाँ साक्षात् उपदेश होता है, वहाँ वह परिणाम नहीं करता। जहाँ अप्रत्यक्ष उपदेश होता है, सुझाते हैं, साक्षात् आज्ञा नहीं करते, 'सजेस्टिव ' होता है—वहाँ वह सर्वोत्तम साहित्य माना जाता है।
जो सबको लगे सो अर्थ; एक को लगे, बाकी को न लगे तो अनर्थ।
अँग्रेज़ी शब्द-समूह का हूबहू हिंदी अनुवाद निरर्थक ही नहीं—विपरीत अर्थ सृजित करनेवाला भी हो सकता है। वास्तव में भाषा का विकास ऐसे कृतिम उपायों से नहीं, संस्कृति और चिंतन के विकास के अनुरूप ही होता है।
न वह शब्द है, न अर्थ, न न्याय और न कला ही, जो काव्य का अंग न बन सके, अर्थात् काव्य में सभी शब्दों, अर्थों, दर्शनों, कलाओं आदि का प्रयोग हो सकता है। अहो! कवि का दायित्व कितना बड़ा है।
शब्द का फल है अर्थज्ञान और एक शब्द के दो फल नहीं हो सकते। आपके चिंतन में एक ही शब्द से दो फल—तद्भिन्न की निवृत्ति और तत्पदार्थ का ज्ञान—कैसे प्राप्त होते हैं?
आँख से देखा रूप, कान से सुना रूप, मन से सोचा रूप— ये सब रूप इसके लिए अर्थहीन हैं, जिसके पास रूपांकन विद्या नहीं है।
एक भी दोषपूर्ण शब्द का प्रयोग न होने पाए—इसका सदैव ध्यान रखना चाहिए।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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