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Vishvanath Tripathi

1931 | سدھارتھ نگر, اتر پردیش

کی

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अनुभूति एक प्रक्रिया है, जिसका निश्चित विधान होता है। यह विधान संगति के बिना नहीं निर्मित होता। इस प्रक्रिया में कहीं कुछ छूट जाता है, तो वह सहृदय के चित्त में जुड़ जाता है।

इस जगत् को महत्व देने में ही भक्ति और लोकोन्मुखता का बीज है। जो है, दिखलाई पड़ रहा है—वह मिथ्या नहीं, सच है। यह लोक और लौकिक यतार्थ की विश्वबोधात्मक या विचारधारात्मक स्वीकृति है।

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मीरा की भावना उस समाज की नारी की भावना है, जहाँ नारी अपने प्रेम की अभिव्यक्ति सहज तौर पर नहीं कर सकती।

भारत में जब-जब कोई मानवीय विचारधारा; लोकप्रिय और व्यापक आंदोलन को जन्म देती है, तब-तब उससे प्रेरित साहित्य वर्णव्यवस्था और नारी पराधीनता पर प्रहार करता है।

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जायसी भारत के उन कवियों में से हैं; जो विधिनिषेधों को तोड़कर मानवीय पीड़ा को सहानुभूति देते हैं, जिनके यहाँ धार्मिक मताग्रह परदुःखकातरता को कहीं भी बाधित नहीं करता।

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जिस युग में सूरदास ने अपनी रचना की उसमें नारी पराधीन थी, लेकिन लीलावर्णन के माध्यम से सूर ने उस स्थिति का स्वप्न देखा, जिसमें नारी बंधनों को तोड़कर कुंठारहित तौर पर अपने प्रिय के साथ विचर सकती है।

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मीरा केवल विरहिणी होतीं; किसी रीतिकालीन नायिका की भाँति, तो वे सिंहासनासीनों को मूर्ख कहने की आवश्यकता अर्जित कर पातीं।

स्त्री चाहे जितनी आकर्षक हो, ड्राइंगरूम की गुड़िया बनी रहेगी तो विकर्षक ज़रूर हो जाएगी।

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रचनाधर्मिता भाषा के उलझाव को सुलझा कर प्रकट होती है।

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घर को तोड़कर बाहर निकलने की आकांक्षा का जैसा सहज, स्वाभाविक और मार्मिक चित्रण सूरदास के यहाँ है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।

कविता और जीवन का संबंध ज़रूर होता है, किंतु यह संबंध सब समय सीधा-सरल नहीं होता कि रचनाकार के जीवन और उसकी कला में यांत्रिक तौर पर तालमेल बिठाया ही जा सके।

मीरा के विरह का रूप प्रधानतः प्रतीक्षा है। जिस प्रियतम के रूप ने उन्हें विह्वल कर रहा है, वह मिलता नहीं।

मध्यकालीन समाज में अवर्णों को सवर्णों के समान होने के लिए जातिप्रथा से टकराना पड़ता था, तो नारियों को रूढ़िग्रस्तता और छद्म कुलमर्यादा से।

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जिस व्यवस्था में स्वतंत्र व्यक्तित्व के निर्माण की छूट ही हो, उसमें सच्चे प्रेम और सच्ची घृणा का अवकाश कहाँ?

प्रेम दो समान व्यक्तियों का हृदय व्यापार है—खिलानेवाला और खानेवाली, जेवर बनवाने और जेवर पहननेवाली का व्यापार नहीं।

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रचनात्मक संघर्ष की सफलता, संघर्ष को छिपा देने में है।

भक्ति आंदोलन मुख्यतः धार्मिक आंदोलन ज़रूर था, लेकिन यह भी सच है कि वह लोकोन्मुख आंदोलन था। सभी भक्तकवियों में जो बात समान मिलेगी—वह है लोकोत्तर, असामान्य को सामान्य धरातल पर लाकर प्रतिष्ठित करना।

कोई अपनी वास्तविक स्थिति निश्छल ढंग से व्यक्त करे; तो उसमें सामाजिकता अपने आप खिंच आएगी, क्योंकि व्यक्ति की स्थिति भी विशिष्ट सामाजिक स्थितियों या संदर्भों का परिमाण है।

मीरा की कविताओं में प्रतीक्षापुर आहत नयनों का बहुत चित्रण है।

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कच्चे समाजविज्ञानी सब कुछ समझ लेते हैं, सिर्फ़ भावना की शक्ति और प्रवृत्ति नहीं समझ पाते।

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जैसे काव्य में अनुभूति बहुत शब्दों में मुश्किल से अभिव्यक्त होती है, वैसे जीवन में भी सच्चा भाव छिपने का प्रयास करता है।

युग विशिष्ट में अनुभूति की अभिव्यक्ति किसी प्रचलित प्रवृत्ति का सहारा लेती है। यह प्रवृत्ति किसी साहित्येतर आंदोलन पर आधारित हो सकती है, या किसी शुद्ध साहित्यिक प्रवृत्ति पर भी।

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मनुष्य ने बहुत साधना करके जिस भाषा का विकास किया है; उसके शब्द जीवन-जगत् को अमूर्त करते हैं, इसलिए शब्द विचारों के समर्थ माध्यम हैं, अनुभूति के नहीं।

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जहाँ यह निरलंकृति नहीं रहती, वहाँ गेय पदों का उत्कर्ष क्षीण हो जाता है।

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कभी-कभी अनुभूति बोध की कमी पूरी कर देती है। जैसे बोध अपने में अनुभूति को छिपाए रहता है, वैसे अनुभूति में भी बोध के सूक्ष्म तंतु सक्रिय रहते होंगे।

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मीरा का विद्रोह कबीर के विद्रोह की तरह ही साधन है, साध्य नहीं।

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जटिल परिस्थितियाँ रचनाधर्मिता के अनुशासन में बँधती हैं। वे कल्पना की समाहार शक्ति द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत होकर सहृदय के चित्त में पुनः बिखर जाती हैं, यानी अपने मूल रूप में जाती हैं।

स्वाभाविकता परिचित और विश्वसनीय स्थितियों से निर्मित होती है।

करुणा का भी बोध, समाज ऐतिहासिक विकास में अर्जित करता है।

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व्यंजना का आधार लौकिक, स्थूल यथार्थ हो तो वह अशक्त होगी।

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मात्र विचारधारा कोई सामाजिक मूल्य नहीं बन सकती। सामाजिक मूल्य बनता है, विचारधारा का आचरण। आचरण अनुकूल हो तो समाज भिन्न अर्थ ग्रहण करता है।

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जब तक स्त्री; पुरुष के साथ व्यापक जीवनक्षेत्र में नहीं उतरती, तब तक वह सच्चे स्वाभाविक प्रेम की अधिकारिणी नहीं बन सकती।

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जो सदाचार की महिमा जानता है, वह मन की चंचलता की शक्ति भी जानता है।

रामानंद ने सामंती व्यवस्था की प्रमुख सामाजिक विशेषता, जाति प्रथा को—जिससे नारी पराधीनता की समस्या भी जुड़ी है—भक्ति के लिए व्यर्थ और अस्वीकार्य बना दिया।यह उनका और भक्ति आंदोलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान है।

सच्चाई की बहुत बड़ी पहचान यह है कि वह संघर्ष और विरोध आमंत्रित करती है।

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कला; अनुभूति को बिंब और नाटकीयता के द्वारा सूचित नहीं, चित्रित करने का प्रयास करती है।

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विचारधारा सामजिक आंदोलन का प्रेरणास्त्रोत और प्रतिफलन दोनों है।

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जो लोग भावना की यानी हृदय की साधना के नाम पर असंयम की छूट उचित समझते हैं, वे या तो भ्रमित हैं या ढोंगी।

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रचना की प्रसिद्धि, मार्मिकता तक पहुँचने में बाधक होती है।

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मीरा की कविताओं से उनके रचनाकार का जो रूप उभरता है; वह पिंजरे में हताशा-बद्ध पक्षी का है, जो दूरस्थ नीड़ के ध्यान में मग्न होकर नाच रहा है।

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आँखें विवश और प्रतीज्ञातुर व्यक्ति का बहुत विश्वसनीय साधन हैं।

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लोकरक्षा के बिना लोकरंजन का जो रूप खड़ा किया जाता है, वह पूर्ण नहीं होता।

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भारत की आधुनिकता वस्तुतः मध्यकालीनता का विरोध करने वाली मध्यकालीन प्रवृत्तियों का विकास है।

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प्रभाव की तीव्रता का प्रमाण, रूप की विशिष्टता यानी चित्रात्मकता है।

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मीरा का काव्य विरहप्रधान है।

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साधना, भक्ति, प्रेम, विरह या रहस्य की भावनाएँ काव्याभिव्यक्ति में अमूर्त रहकर ही नहीं प्रकट होतीं, वे मूर्त होती हैं—अनुभव जगत् में उदित होकर।

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सौंदर्य हमें विक्षुब्ध करता है। सौंदर्य का प्रत्येक विषय अमूर्त सौंदर्य का प्रतीक बनकर रह जाता है, और हमें अरूप की ओर उन्मुख कर देता है। यह अरूप भावलोक में रूपायित होता है।

अभिव्यक्ति में उत्कर्ष, असामान्य स्थितियों की योजना से नहीं—सामान्य स्थितियों की विशिष्ट योजना से आता है।

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मीरा ऊपर से देखने में समाज से बाहर दिखती हैं, पर वे समाज को एक करनेवाली रसधारा में डूबी हुई हैं कि उनके भीतर समाज की वास्तविक प्राणसत्ता समा जाती है।

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प्रेम शारीरिकता पर आधारित, लेकिन उससे ऊपर अनन्यता की स्थिति का नाम है।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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