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John Berger

1926 - 2017 | لندن

کی

باعتبار

कोई इसी जीवन में अमरता को महसूस करने के सबसे क़रीब पहुँच सकता है तो शायद—काम्य होकर।

अनावृत होना यानी स्वयं का होना है, जबकि नग्नता दूसरों के द्वारा नग्न देखा जाना है—जिसकी तस्दीक़ स्वयं के लिए नहीं होती।

विज्ञापनों द्वारा की गई दुनिया की व्याख्या और वास्तविक दुनिया में बहुत विरोध है।

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कैमरे ने क्षणिक प्रतीतियों को अलग-थलग कर दिया और इस तरह छवियों के समय-निरपेक्ष होने के विचार को ध्वस्त कर दिया।

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कोई दो सपने एक से नहीं होते। कुछ क्षणिक होते हैं, कुछ दीर्घकालिक। देखने वाले के लिए सपने बहुत व्यक्तिगत होते हैं। विज्ञापन सपने नहीं गढ़ते; वह हममें से हर एक को जो कुछ बताते हैं, वह यह कि अभी हम ईर्ष्या के पात्र नहीं हैं, लेकिन हो सकते हैं।

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विज्ञापन क्रांति तक का अनुवाद अपनी भाषा में कर देता है।

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देखते हुए हम सिर्फ़ किसी एक चीज़ को नहीं देखते; बल्कि हम चीज़ों के पारस्परिक और उस संबंध को भी देखते हैं, जो उन चीज़ों का हमारे साथ है।

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कोई कलाकृति जितनी ज़्यादा कल्पनाशील होती है, उतनी ही वह हमें कलाकार के दृश्य-जगत् के अनुभवों के बारे में बताती है।

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विज्ञापन के अनुसार सुसंस्कृत होने का मतलब है—किसी भी विवाद से दूर रहना।

हम चीज़ों को जिस तरह देखते हैं, वह हमारे ज्ञान और विश्वासों से प्रभावित होता है।

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कैमरे के आविष्कार ने मनुष्य के देखने का तरीक़ा बदल दिया।

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प्रेम की अवस्था में प्रियतम की दृष्टि में जो पूर्णता होती है, उसे किसी शब्द या आलिंगन से नहीं मापा जा सकता।

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आधुनिक काल का ग़रीब, दया का पात्र नहीं समझा जाता; बल्कि उसे कचरे की तरह हटा दिया जाता है। बीसवीं सदी की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में पहली ऐसी संस्कृति की निर्मिति हुई, जिसके लिए भिखारी होना—कुछ नहीं होने का तक़ाज़ा है।

विज्ञापन किसी सेवा या वस्तु को बेचने के लिए सेक्सुअलिटी का उग्र इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह सेक्सुअलिटी अपने आप में आज़ाद नहीं है, बल्कि यह अपने से बड़ी किसी चीज़ का प्रतीक है—वह जीवन जिसमें आप वह सब ख़रीद सकते हैं, जो आप चाहते हों।

विज्ञापनों को ख़रीदारों की पारंपरिक शिक्षा का लाभ मिलता है। जो कुछ उन्होंने इतिहास, मिथकों और कविताओं में पढ़ा है, उसका उपयोग इस ग्लैमर को रचने में किया जाता है।

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बहुसंख्यक जनता स्वाभाविक तौर पर यही मानती है कि म्यूज़ियम बाक़ी जगहों से अलग कुछ पवित्र चीज़ों से भरा है।

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नग्नता देखने वाले के दिमाग़ में रची गई।

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ईर्ष्या का पात्र होना आश्वस्ति का अकेला रूप है।

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विज्ञापन की भाषा में जिनके पास ख़र्चने के लिए पैसा हो, वो व्यक्तित्वहीन हैं और जिनके पास पैसा है, वो सबकी चाहतों का पात्र होते हैं।

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कैमरे के आविष्कार से उन पेंटिंग्स को देखने का तरीक़ा भी बदला, जो कैमरे के आविष्कार से बहुत पहले बनाई गई थीं।

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सारी बातें जो घटित होती हैं; अगर उन्हें नाम दिया जा सके, तो कहानियों की कोई ज़रूरत नहीं रहेगी।

हर छवि एक पुनर्रचित या पुनरुत्पादित दृश्य है।

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जब हमें इसे देखने से रोका जाता है, तो हमें ख़ुद से जुड़े इतिहास से वंचित किया जा रहा होता है।

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बिना यह बताए कि अच्छे और सामान्य चित्रों में क्या फ़र्क़ है, महान कलाकृतियाँ औसत चित्रों से घिरी हुईं अपना वैशिष्ट्य खो देती हैं।

स्त्री के संदर्भ में पुरुष भगवान के एजेंट बन जाता है।

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इतिहास हमेशा वर्तमान और उसके अतीत के बीच संबंध का निर्माण करता है।

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हाल तक, एक हद तक आज भी क्लासिक चीज़ों के अध्ययन में कुछ नैतिक मूल्य काम करते हैं, क्योंकि क्लासिक चीज़ें; चाहे उनके आंतरिक मूल्य जो भी हों, अभिजन वर्ग के जीवन-मूल्यों को अभिव्यक्त ज़रूर करती हैं।

न्यूड या नग्न होना, किसी दूसरे द्वारा निर्वस्त्र देखा जाना है और फिर भी स्वतंत्र व्यक्ति की तरह पहचाना जाता है।

एक पुरुष की उपस्थिति कुछ ऐसे आशय रखती है कि वह तुम्हारे लिए या तुम्हारे समक्ष क्या करने में समर्थ है। जबकि इसके विपरीत, स्त्री की उपस्थिति निश्चित करती है कि उसके साथ क्या किया जा सकता है और क्या नहीं।

स्त्री से व्यवहार करने से पहले पुरुष उसका निरीक्षण करता है।

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तुमने एक नग्न औरत का चित्र बनाया, क्योंकि उसे देखने में तुम्हें मज़ा आता रहा, फिर उसके हाथ में एक दर्पण पकड़ा दिया और इसे नाम दिया—वैनिटी। इस तरह तुमने उस औरत की नैतिक निंदा की, जिसकी नग्नता को तुमने अपने मज़े के लिए चित्रित किया था।

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जब आप प्रेम में होते हैं तो प्रेयसी के दिख जाने में ही एक परिपूर्णता होती है, शब्दों और अपनत्व से जिसकी कोई तुलना नहीं है—एक ऐसी पूर्णता जिसकी क्षणिक समरूपता—संभोग क्रिया ही हो पाती है।

हमारे देखने और जानने के बीच का रिश्ता हमेशा अनसुलझा ही रहा है। हर शाम हम सूरज को अस्त होते देखते हैं। हम जानते हैं कि धरती सूरज से दूर हट रही है, फिर भी इसके बारे में हमारी जानकारी और व्याख्या—कभी भी पूरी तरह दृश्य के लिए उपयुक्त नहीं होती है।

मेरी प्रेयसी! तुम्हारे होंठ मधु के छत्ते की तरह हैं : मधु और दुग्ध तुम्हारी जिह्वा के तल में हैं और तुम्हारे वस्त्रों की गंध मेरे घर की गंध जैसी है।

सारे विज्ञापन लोगों की व्यग्रताओं पर टिके होते हैं।

कोई कलाकृति अब वह नहीं रह गई है, जो वह हुआ करती थी। उसकी सत्ता नष्ट हो चुकी है।

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पूँजीवादी संस्कृति में किसी और तरह की आशा या संतुष्टि या सुख सिर्फ़ ईर्ष्या करने के लिए है।

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व्यक्तिगत-सामाजिक ईर्ष्या के एक आमफ़हम मनोभाव हुए बिना, ग्लैमर का अस्तित्व नहीं हो सकता।

विज्ञापन के लिए सारी वास्तविक घटनाएँ अपवाद हैं, जो जाने किसके लिए मायने रखती हैं।

विज्ञापन के लिए वर्तमान अपर्याप्त है।

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इतिहास हमेशा किसी वर्तमान और उसके अतीत के बीच एक रिश्ता क़ायम करता है। फलस्वरूप वर्तमान का भय अतीत को रहस्यमय बनाने की ओर ले जाता है।

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जब हम दुःख से गुज़रते हैं तो हम अपने बिल्कुल शुरुआती बचपन में लौटते हैं, क्योंकि वही वह समय है जब हमने पहली बार ‘पूरी तरह खोने’ का अनुभव करना सीखा था, बल्कि यह समय उससे भी कहीं अधिक था। बचपन वह समय है, जब हम अपनी पूरे जीवन की तुलना में कहीं अधिक ‘पूरी तरह खो देने’ के अनुभवों से गुज़रते हैं।

आत्मकथा अकेलेपन के बोध से शुरू होती है—यह एक अनाथ विधा है।

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अतीत की कलाकृतियों और आज के विज्ञापन में बहुत से संबंध-सूत्र हैं। कभी-कभी तो विज्ञापनों की पूरी की पूरी छवि ही किसी प्रसिद्ध चित्र की नक़ल होती है।

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अतीत कोई ऐसी शय नहीं है, जिसके हम क़ैदी हों। हम अतीत के साथ एकदम अपनी इच्छा के अनुरूप कुछ कर सकते हैं। जो हम नहीं कर सकते, वह है अतीत के परिणामों को बदलना।

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विज्ञापन उस भविष्य में स्थिर होता है, जो लगातार बदलता है।

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विज्ञापन इस अर्थ में भी क्षणिक होता है कि वह हर क्षण बदलता रहता है, फिर भी वह हमारे वर्तमान की बात नहीं करता। वह प्रायः हमारे अतीत का संदर्भ देता है और हमेशा हमारे भविष्य के बारे में बात करता है।

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कहानी पढ़ते हुए हम उसी में बस जाते हैं। पुस्तक का आवरण, चार दीवारों और एक छत जैसा लगने लगता है। आगे जो कुछ होने वाला है; वह कहानी की चार दीवारों के भीतर ही होगा और यह इसलिए संभव है, क्योंकि कहानी का स्वर हरेक चीज़ पर नियंत्रण कर लेता है।

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बिना विज्ञापन के पूँजीवाद ज़िंदा नहीं रह सकता—साथ ही विज्ञापन इसका स्वप्न है।

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मासूम रह जाना, अनभिज्ञ रह जाना भी हो सकता है।

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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