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यात्रा पर उद्धरण

यात्राएँ जीवन के अनुभवों

के विस्तार के साथ मानव के बौद्धिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। स्वयं जीवन को भी एक यात्रा कहा गया है। प्राचीन समय से ही कवि और मनीषी यात्राओं को महत्त्व देते रहे हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में ध्वनित ‘चरैवेति चरैवेति’ या पंचतंत्र में अभिव्यक्त ‘पर्यटन् पृथिवीं सर्वां, गुणान्वेषणतत्परः’ (जो गुणों की खोज में अग्रसर हैं, वे संपूर्ण पृथ्वी का भ्रमण करते हैं) इसी की पुष्टि है। यहाँ प्रस्तुत है—यात्रा के विविध आयामों को साकार करती कविताओं का एक व्यापक और विशेष चयन।

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बीती हुई घड़ियाँ ज्योतिषी भी नहीं देखता।

सरदार वल्लभ भाई पटेल
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कोई भी मार्ग छोड़ा जा सकता है, बदला जा सकता है : पथ-भ्रष्ट होना कुछ नहीं होता, अगर लक्ष्य-भ्रष्ट न हुए।

अज्ञेय
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मैंने अपनी कविता में लिखा है 'मैं अब घर जाना चाहता हूँ', लेकिन घर लौटना नामुकिन है; क्योंकि घर कहीं नहीं है।

श्रीकांत वर्मा
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मनुष्य दूसरों को अपने मार्ग पर चलाने के लिए रुक जाता है, और अपना चलना बंद कर देता है।

जयशंकर प्रसाद
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कभी-कभी थोड़ा पलायन बहुत स्वस्थ होता है।

धर्मवीर भारती
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जो तुम्हें कहीं से बुला रहे हैं, उन्हें नहीं पता वे कहाँ हैं।

नवीन सागर
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कभी-कभार मेरी कल्पना में ऐसी जगहें आती हैं जो दरअसल कहीं नहीं हैं या जिनके होने की सिर्फ़ संभावना है।

मंगलेश डबराल
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यात्रा करना जितना कठिन और रोमांचक है, यात्रा की कल्पना शायद उतनी ही सरल और सुखद है।

मंगलेश डबराल
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अगर कवि की कोई यात्रा हो सकती है तो वह अवश्य ही किसी ऐसी जगह जाने की होगी जिसको वह जानता नहीं।

रघुवीर सहाय
  • संबंधित विषय : कवि
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बुद्ध ने कहा था कि "संतप्त थककर बैठ हुए का योजन लंबा होता है और जागने वाले की रात लंबी होती है।"

कुबेरनाथ राय
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मेरे पास जूते हैं, मुझे मेरे पैर लौटा दो।

स्वदेश दीपक
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कहीं रास्ता भटक जाता हूँ तो घबराहट ज़रूर होती है, लेकिन यह भी लगता है कि अच्छा है इस रास्ते ने मुझे ठग लिया।

मंगलेश डबराल
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हम मात्र एक, ‘भटकन’ हैं, अपनी आत्मा के विशाल दृश्यों में कोई अर्थ ढूँढ़ते हुए।

यून फ़ुस्से
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यात्रा-साहित्य खोज और विश्लेषण से जुड़ा है। यह लेखक के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपनी यात्राओं में किन चीज़ों को महत्त्व देता है।

रघुवीर सहाय
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हमें मार्ग पर चलना भी है, मार्ग बनाना भी है।

ज्ञानरंजन
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यात्राएँ अब भी हो सकती हैं इसी व्यर्थ जीवन में।

रघुवीर सहाय
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कैसा ही पथ क्यों न हो, उसका संबंध अनिवार्यतः मानव के साथ होता ही है।

श्रीनरेश मेहता
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यात्रा में जाने का सुख और लौटने का सुख होता। परंतु रेलगाड़ी में दुःख की भीड़ होती। दुःख किसी भी गाँव में ज़ंजीर खींचकर उतर जाता।

विनोद कुमार शुक्ल
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होश में या अनजाने में मैंने ऐसे कई काम किए होंगे जो असत्य थे। लेकिन मैंने अपनी कविता में कभी भी कुछ भी असत्य नहीं कहा। यह वह अभयारण्य है, जहाँ मेरे जीवन के सबसे गहरे सत्य शरण पाते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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पथ इस पृथ्वी पर मानव का पर्याय है।

श्रीनरेश मेहता

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere