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Vinod Kumar Shukla

1937 - 2025 | چھتیس گڑھ

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अधिकतर अज्ञानता के सुख-दुःख की आदत थी। ज्ञान के सुख-दुःख बहुतों को नहीं मालूम थे। जबकि ज्ञान असीम अटूट था। ज्ञान सुख की समझ देता था पर सुख नहीं देता था।

अदब और क़ायदे आदमी को बहुत जल्दी कायर बना देते हैं। ऐसा आदमी झगड़ा नहीं करता।

गंदगी वहाँ है जहाँ सफ़ाई और संपन्नता है, वह अहाता है जहाँ से फूलों की ख़ुशबू आती है और घास पर बैठे हुए वे लोग हैं जो फ़ुर्सत से बैठ गए हैं।

“जितनी बुराइयाँ हैं वे केवल इसलिए कि कुछ बातें छुपाई नहीं जाती और अच्छाइयाँ इसलिए हैं कि कुछ बातें छुपा ली जाती हैं।”

स्पर्श का सारा गुण अनुमान में भी होना चाहिए। जिसका अनुमान लगा रहे हैं उसे सचमुच स्पर्श कर रहे हैं। सच का अनुमान लगा रहे हैं और सच को स्पर्श कर रहे हैं। झूठ का अनुमान लगाते हैं और झूठ का स्पर्श करते हैं।

चंद्रमा, सूरज, तारे, आकाश, घर की चीज़ों की तरह थे। चंद्रमा सूरज शाश्वत होने के बाद भी इधर-उधर होते थे।

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दृश्य बदलने के लिए पलक का झपक जाना ही बहुत होता है।

बुलबुल, मैना, चिड़ियों के नाम से बेटी का नाम रखने का रिवाज़ था। बेटी के नाम से चिड़िया का नाम रखने का रिवाज़ नहीं था।

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लड़की माँ-बाप के घर में ग़ैर-हाज़िर जैसी होती थी। उसे उसी तरह पाला पोसा जाता था कि कोई भटकी हुई गई है।

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ख़ुश होने से पहले बहाने ढूँढने चाहिए और ख़ुश रहना चाहिए। बाद में ये बहाने कारण बन जाते। सचमुच की ख़ुशी देने लगते।

शुरुआत में ही मध्य होता था—जो हो चुका था और जो होने वाला था। दोनों इतने पथरीले और खुरदुरे होते थे कि मध्य में फँसे बारीक हो जाते थे—पिसान।

लड़की माँ-बाप के घर में ग़ैरहाज़िर जैसी होती थी। उसे उसी तरह पाला-पोसा जाता था कि कोई भटकी हुई गई है। भले कोख से गई है। एकाध दिन उसे खाना खिला दो कल चली जाएगी। लड़की का रोज़-रोज़, बस एकाध दिन जैसा होता था। फिर ब्याह दी जाती जैसे निकल जाती हो।

पत्नी का रिश्ता फूल को तोड़कर अपने पास रख लेने का था। पेड़ में खिले फूल-जैसा रिश्ता कहीं नहीं दिखता था।

आदमी अपने अंदर को काटकर खोखला हो जाता था और आजू-बाज़ू के कटने से सिकुड़ जाता था।

किसी दुःख के परिणाम से कोई ज़हर नहीं खा सकता। यह तो षड्यंत्र होता है। आदमी को बुरी तरह हराने के बाद ज़हर का विकल्प सुझाया जाता है।

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यदि एकबारगी कोई गर्दन काटने के लिए आए तो जान बचाने के लिए जी-जान से लड़ाई होती। इसलिए एकदम से गर्दन काटने कोई नहीं आता। पीढ़ियों से गर्दन धीरे-धीरे कटती है।

पत्नी को पत्नी के अलावा देखने के अभ्यास के लिए, उससे और प्रेम कर लेना था।

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गंतव्य दुःख का कारण होता। सुख का कारण है कि किसी अच्छी जगह जा रहे हैं। परंतु अच्छी जगह दुनिया में कहाँ है? जगह मतलब कहीं नहीं पहुँचना है।

मुझे चंद्रमा आकाश में गोल कटी हुई खिड़की की तरह लगता था जिससे आकाश की आड़ में छुपी हुई दुनिया का उजाला आता था।

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जी दुखता है तो खिड़की बंद कर लेना चाहिए। अकेलेपन में कोई आएगा कि राह देखने के बदले किसी के पास चले जाना चाहिए।

कितना सुख था कि हर बार घर लौटकर आने के लिए मैं बार-बार घर से बाहर निकलूँगा।

अच्छा व्यवहार और सहायता के लिए तत्पर होना, यानी, आदमी को उस रेंज पर लाना है जहाँ से उस पर अचूक निशाना लगाया जा सके।

एक अच्छा नौकर परिवार में नौकर की तरह शामिल रहता था।

कारीगर अपनी रोज़ी से मतलब रखता है, काम से नहीं। काम बनाने पर वह विश्वास रखेगा तो उसकी रोज़ी नहीं चलेगी।

हर घर में आड़ बनी होगी, ताकि लोग छुप सकें। छुपने की कला और सभ्यता होगी। एक समाज होगा और छुपते-छुपाते लोगों का शासन।

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भीख माँगने वालों में जातीय सहूलियत होती। ख़रीद-फ़रोख्त में जातीय सहूलियत नहीं होती। लोग सस्ती चीज़ें किसी से भी ख़रीदने के लिए तैयार होते थे।

गृहस्थी में टूटे-फूटे सामान के साथ डर भी इकट्ठे होते रहते थे।

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मैं दुःख सहने का नगर स्तर या ज़िला स्तर का खिलाड़ी नहीं होना चाहता था।

पृथ्वी में जो कुछ जीव जगत, पत्थर, नदी, पहाड़, समुद्र, जंगल, वनस्पति मनुष्य इत्यादि हैं वे सब पृथ्वी की सोच की तरह थे। मन की बात की तरह। मनुष्य की सोच में पता नहीं कैसे ब्रह्मांड गया था।

पल के बीतने की आवाज़ ज़रुर होती होगी। कभी प्रियजन की आवाज़ पल बीतने की आवाज़ होती हो।

ज़िंदगी जितनी ख़राब लगती है उतनी ख़राब नहीं है।

जब कुछ होता नहीं है, तब भी समय होता रहता है।

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निरंतरता समय का गोत्र है।

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घड़ी नहीं थी। पर निरंतरता का बोध था। आकाश का होना निरंतर था। आकाश स्थिर पर उसका होना लगातार। स्थिर झरने में लगातार गिरते हुए पानी की निरंतरता।

दूसरों की सहानुभूति, हमारा स्वाभिमान तैयार करती थी।

दुःख और तकलीफ़ के कार्यक्रम भी यदि अच्छी तरह से प्रस्तुत होते तो तालियाँ तड़-तड़ बजतीं।

सारा जीवन लौटने का रास्ता नहीं देखना चाहिए। लौटने का रास्ता घंटा दो घंटा, दो चार दिन, दो चार महीने, दो चार वर्ष बस।

घर बदलने और नौकरी बदलने के बदले ख़ुद को बदलना चाहिए।

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ग़रीब एक स्तर के होते हुए भी एक जैसे इकट्ठे नहीं होते।

रात-भर जागकर ही आनेवाले दिन को पकड़ सकते थे।

घर का दरवाज़ा खोलते ही मैंने घर को ऐसे देखा जैसे किसी ख़ाली डब्बे के ढक्कन को खोलकर अंदर झाँक रहा हूँ। अगर ख़ालीपन कभी कोई चीज़ थी, तो उसी घर ठसाठस भरा था। इसके अलावा कुछ नहीं था। घर के अंदर मैं उसी तरह आया, जैसे एक उपराहा ख़ालीपन और आया है।

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मृत्यु समय से बहिष्कृत होने से होती थी।

मैं बार-बार घर से बाहर जाऊँगा और बार-बार घर लौटूँगा।

यात्रा में जाने का सुख और लौटने का सुख होता। परंतु रेलगाड़ी में दुःख की भीड़ होती। दुःख किसी भी गाँव में ज़ंजीर खींचकर उतर जाता।

सृष्टि में पृथ्वी का भी अकेलापन होगा। परंतु एक मनुष्य का अकेलापन सृष्टि के अकेलेपन से भी बड़ा होता होगा। एक मनुष्य के अनेक दुःख सुख थे।

उपेक्षित उपस्थिति होने से आदमी को अदृश्य होने में समय नहीं लगता।

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नौकरी लगते ही घर के व्यवहार में एक बदलाव गया था और शादी होते ही, भद्दा फ़र्क।

जो बम के गोले फूटते नहीं वे दार्शनिक बम होते। जिनके कभी भी फूट जाने का डर होता।

पेड़ अपनी अक़्ल से नहीं बढ़ता सुविधा से बढ़ता, बल्कि स्वाभाविकता से बढ़ता है।

नौकर अच्छा हो तो वह क़ीमती हो जाता था।

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