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P. B. Shelley

1792 - 1822 | دوسرا

کی

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कविता तार्किक नहीं होती, जिसका मनचाहा उपयोग किया जा सके।

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कहानी और कविता के बीच एक महत्त्वपूर्ण भेद यह है कि कहानी प्रायः घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण भर होती है, जहाँ समय, स्थान, परिस्थितियाँ और कार्य-कारण संबंध ही मुख्य सूत्र बने रहते हैं। इसके विपरीत, कविता मानवीय प्रकृति के शाश्वत स्वभाव के अनुरूप ऐसी घटनाओं की सृष्टि करती है, जैसी वे सृजनकर्ता की चेतना में विद्यमान होती हैं और जो समग्र मानव-मन का प्रतिबिंब बन जाती हैं।

कविता सार्वभौमिक होती है। उसके भीतर वह बीज निहित रहता है, जो मानवीय स्वभाव की असंख्य संभावनाओं और कृत्यों से संबद्ध होता है।

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जिस प्रकार एक बालक अपनी प्रसन्नता को सहज रूप से व्यक्त करता है, उसी प्रकार आदिम मनुष्य भी अपने परिवेश से प्रभावित होकर; अपनी भावनाओं को भाषा, हाव-भाव, चित्रकला अथवा मूर्तिकला के माध्यम से अभिव्यक्त करता है और अंततः वह स्वयं उन सबके संयुक्त प्रभाव तथा उनसे जुड़ी अपनी आशंकाओं का प्रतिरूप बन जाता है।

कोई कवि यदि अपनी काव्य-कृति में; अपने स्थान और समय के अनुरूप बने नैतिक और अनैतिक के विचारों को आरोपित करे, तो यह ग़लत होगा क्योंकि उसका सृजन तो किसी युग की सीमाओं में बंधा होता है, ही किसी स्थान विशेष के।

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कविता की अनैतिकता को लेकर किए गए सारे सवाल, दरअस्ल इस भ्रम पर आधारित हैं कि कविता इंसान के नैतिक विकास को किस तरह सहायता प्रदान करती है। नैतिक शास्त्र उन तत्त्वों को क्रमबद्ध करता है; जिसे कविता तैयार करती है, वह सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों की रूपरेखा तैयार करता है तथा आदर्श प्रस्तुत करता है। परंतु केवल श्रेष्ठ सिद्धांतों के अभाव के कारण ही लोग एक-दूसरे से नफ़रत नहीं करते, एक-दूसरे को हीन नहीं मानते, बुराई नहीं करते, छल नहीं करते और एक-दूसरे को ग़ुलाम नहीं बनाते। कविता का प्रभाव एक भिन्न और लगभग ईश्वरीय रीति से कार्य करता है। वह हमारे दिमाग़ को उन अनगिनत विचारों और संभावनाओं का केंद्र बना देती है, जिन्हें अन्यथा हम समझ नहीं पाते।

कविता प्रत्येक वस्तु को मनोहरता में रूपांतरित कर देती है। वह सुंदरतम वस्तु की आभा को और अधिक दीप्त कर देती है तथा जो सबसे विकृत है, उसमें भी सौंदर्य का संचार कर देती है। वह उल्लास और भय, विषाद और आनंद, शाश्वतता और परिवर्तन—इन सभी विरोधी तत्त्वों को एक सूत्र में बाँध देती है। अपने कोमल अनुशासन के अंतर्गत वह समस्त विसंगतियों को सामंजस्य में परिवर्तित कर लेती है। जिस किसी वस्तु को कविता स्पर्श करती है, उसका रूपांतरण हो जाता है। उसकी ज्योति में आने वाली हर चीज़ उसकी संवेदना से अनुप्राणित होकर नया स्वरूप ग्रहण कर लेती है। उसकी अद्भुत शक्ति जीवन की ओर अग्रसर विष को भी अमृत में परिणत कर देती है। वह संसार पर पड़ी जड़ अभ्यस्तता की परत को भेदकर वस्तुओं के आत्मस्वरूप में निहित उस एकाकी और सुप्त सौंदर्य को दृश्य कर देती है।

मूर्धन्य कवियों में कुछ ही ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अपनी कल्पनाओं के शुद्ध सौंदर्य को उसकी निर्वसन सत्यता और तेजस्विता में प्रस्तुत किया हो।

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एक व्यक्ति के महान होने के लिए उसमें तीव्र और व्यापक कल्पनाशक्ति का होना आवश्यक है, जिससे वह स्वयं को दूसरों की स्थिति में रख सके। उसे अपने समाज के सुख-दुःख को अपना ही समझने की संवेदना विकसित करनी चाहिए।

मानव समाज के आरंभिक काल से ही मनुष्य अपने शब्दों और कर्मों में एक निश्चित क्रम का अनुसरण करने लगा था, जो उन वस्तुओं और प्रभावों से भिन्न था; जिनका वे प्रतिनिधित्व करते थे, क्योंकि प्रत्येक अभिव्यक्ति उसी नियम के अधीन संचालित होती है, जिससे उसका उद्भव होता है।

कविता एक ऐसे दर्पण की तरह है, जो विकृत को भी मंजुल बना देती है।

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यह संसार जब अपने युवाकाल में था, तब मनुष्य नृत्य करता था, गाता था और प्रकृति की वस्तुओं का अनुकरण करता था। इन सभी क्रियाओं में, अन्य कार्यों की तरह, वह एक निश्चित लय और क्रम का पालन करता था। यद्यपि नृत्य की गति, गीत की धुन, भाषा की संरचना और प्राकृतिक वस्तुओं के अनुकरण में सभी लोग लगभग समान प्रकार के क्रम का अनुसरण करते थे, फिर भी वह क्रम प्रत्येक व्यक्ति में पूरी तरह एक-सा नहीं होता था।

नैतिक उत्कर्ष का सबसे बड़ा साधन कल्पना है और कविता इस प्रक्रिया में साथ देती है, क्योंकि वह मूल कारण को प्रभावित करती है।

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कवि एक अज्ञात प्रेरणा के दृष्टा होते हैं, जो भविष्य की उन विराट छायाओं का प्रतिबिंब होते हैं, जो वर्तमान पर पड़ती हैं। वे ऐसे शब्द और भावनाएँ व्यक्त करते हैं, जिन्हें वे स्वयं भी पूर्णतः नहीं समझ पाते। वे युद्ध का आह्वान करने वाली उस रणभेरी के समान हैं, जो दूसरों में उत्साह जगाती है, किंतु स्वयं उस आवेग का अनुभव नहीं करती। वे ऐसी शक्ति हैं, जो स्वयं स्थिर रहती है, परंतु संसार को आंदोलित कर देती है। कवि संसार के अदृश्य, अनकहे किंतु वास्तविक विधि-निर्माता होते हैं।

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कवि अपने समकालीनों की बुराइयों को केवल एक क्षणिक आवरण मानता है, जिसके भीतर उसकी रचनाएँ आच्छादित रहती हैं। यह आवरण उनकी शाश्वत सुंदरता को थोड़े समय तक ओझल तो कर सकता है, किंतु उसे नष्ट नहीं कर सकता।

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भाषा, रंग, रूप तथा धार्मिक और नागरिक आचार-विचार—ये सभी कविता की सामग्री और उसके उपकरण हैं। प्रभाव को कारण का पर्याय मानने वाली आलंकारिक भाषा में इन्हें भी कविता कहा जा सकता है। किंतु अधिक संकुचित अर्थ में, कविता उन भाषिक विन्यासों—विशेषतः छंदबद्ध अभिव्यक्तियों—को सूचित करती है, जिनकी रचना उस सम्राट-समान शक्ति द्वारा होती है, जिसका सिंहासन मानव-स्वभाव के अदृश्य अंतराल में स्थित है।

प्रत्येक महान कवि अपने पूर्ववर्ती कवियों की रचना-परंपरा में कुछ नवीन तत्व जोड़ता है और इस प्रकार अपनी विशिष्ट काव्य-शैली का सृजन करता है।

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कविता मनुष्य के अंतर्मन में विद्यमान दिव्यता के क्षणिक अनुभवों को नष्ट होने से बचाकर उन्हें चिरस्थायी बना देती है।

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काव्य उन श्रेष्ठ और परम आनंदित मनों के सर्वाधिक उल्लासपूर्ण क्षणों का अंकन

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कोई भी क्रांतिकारी विचारक केवल इस कारण कवि नहीं होता कि वह नवीन चिंतन करता है, या उसके शब्द सत्य की गहन झलक प्रस्तुत करते हैं; बल्कि इसलिए भी कि उसकी भाषा में एक सहज लय विद्यमान होती है, जो शाश्वत संगीत की प्रतिध्वनि-सी प्रतीत होती है।

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किसी रचना के कुछ हिस्से काव्यात्मक हो सकते हैं, भले ही पूरी रचना कविता हो। एक अकेला वाक्य भी सम्पूर्ण माना जा सकता है; भले ही वह एक असंगठित अंशों की श्रृंखला के बीच पाया जाए, यहाँ तक कि एक अकेला शब्द भी अमिट विचार की चिंगारी बन सकता है।

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कविता विश्व के ढके सौंदर्य का साक्षात्कार करती है और परिचित वस्तुओं को इस प्रकार प्रस्तुत करती है, जैसे उन्हें प्रथम दृष्टया देखा जा रहा हो।

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हमने कविता की महिमा को उस कला के रूप में परिभाषित किया है, जो मानवीय सृजनात्मक शक्ति की सर्वाधिक परिचित, प्रामाणिक और पूर्ण अभिव्यक्ति है। फिर भी इस परिभाषा को कुछ और सीमित करना आवश्यक है, ताकि छंदबद्ध और अछांदिक भाषा के बीच का भेद स्पष्ट हो सके; क्योंकि गद्य और पद्य का प्रचलित विभाजन, तर्क की दृष्टि से देखा जाए तो पूर्णतः स्वीकार्य नहीं प्रतीत होता।

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कवि और गद्य-लेखक के बीच भेद करना एक प्रकार की अशिष्ट भूल है। उसी प्रकार कवि और दार्शनिक के मध्य किया गया अंतर भी अनुचित ही है।

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व्यक्तिगत पराधीनता का निवारण, मानवीय कल्पना की सर्वोच्च राजनीतिक आकांक्षाओं का मूर्त रूप है।

प्राचीन मूर्तिकला की अद्वितीय कृतियाँ यदि आज तक सुरक्षित बची होतीं और यदि प्राचीन सभ्यताओं के धर्म से जुड़ी काव्यात्मक चेतना; उनके विश्वासों के साथ ही समाप्त हो गई होती, तो मानव-बुद्धि शायद इन प्रेरणास्रोतों के बिना कभी पूर्णतः जागृत हो पाती। ऐसी स्थिति में तो भौतिक विज्ञानों की खोजें संभव हो पातीं और ही समाज की विकृतियों पर विश्लेषणात्मक तर्क-पद्धति को लागू करने की वह क्षमता विकसित हो पाती, जिसे आज सृजनात्मकता और कल्पनाशील प्रतिभा की सहज अभिव्यक्ति से भी अधिक महत्त्व प्रदान किया जा रहा है।

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नैतिकता का सबसे गहन रहस्य प्रेम है—अर्थात् अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर उस सौंदर्य के साथ स्वयं को एकात्म कर लेना। जो विचारों, कर्मों अथवा व्यक्तित्व में विद्यमान तो है, परंतु जो हमारा अपना नहीं है।

कविता संसार की सबसे सुंदर और उत्कृष्ट वस्तुओं को अमरत्व प्रदान करती है। वह जीवन के उन क्षणों को थाम लेती है, जो अन्यथा पलभर में विलीन हो सकते थे और उन्हें शब्दों अथवा रूपों में ढालकर विश्व के समक्ष उपस्थित कर देती है।

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रचना प्रक्रिया के शुरू होते ही, प्रेरणा कम होने लगती है।

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कविता का विकास कभी भी उस समय में अधिक आवश्यक नहीं होता है, जब समाज की विचारधारा अत्यधिक स्वार्थी और मतलबी हो गई हो।

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विधि-निर्माताओं और धर्म-प्रवर्तकों की ख्याति—वह भी केवल तब तक, जब तक उनकी संस्थाएँ विद्यमान रहती हैं—प्रसिद्ध कवियों से अधिक होती है।

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कविता जीवन की सजीव प्रतिमा है, जो उसके शाश्वत सत्य को उद्घाटित करती है।

इतिहास के उत्कृष्टतम कवि वे रहे हैं, जिनका आचरण निर्मल रहा है, जिनकी प्रज्ञा विलक्षण रही है और जिनका जीवन सौभाग्य से संपन्न रहा है। यदि उनके जीवन का सूक्ष्म अध्ययन किया जाए, तो ज्ञात होता है कि वे अत्यंत सफल और भाग्यशाली व्यक्तियों में से एक थे।

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प्राचीन काल में कवि जिस युग और राष्ट्र में वे प्रकट होते थे, उसकी परिस्थितियों के अनुसार कभी विधि-निर्माता तो कभी भविष्यवक्ता कहलाते थे, किंतु एक कवि स्वभावतः इन दोनों भूमिकाओं को अपने भीतर समेटे और संयोजित किए रहता है।

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काव्य-शक्ति की सतत उपस्थिति मन में ऐसी सुव्यवस्था और सामंजस्य की प्रवृत्ति विकसित कर सकती है, जो स्वयं उसकी प्रकृति तथा दूसरों के मन पर पड़ने वाले प्रभावों के अनुरूप हो।

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यह सत्य है कि कविता अपने व्यापक अर्थ में केवल एक बार रची जाकर समाप्त नहीं हो जाती, बल्कि उसे सतत रूप से रचते रहना पड़ता है।

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किसी और पर निर्णय देने से पहले अपने अभिप्राय के बारे में सोचें, क्योंकि जैसे आप दूसरों को तौलेंगे, एक दिन आपको भी तौला जाएगा।

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कविता मनुष्य की नैतिक संस्कार को उसी तरह मजबूत करती है, जैसे व्यायाम हमारे शरीर को मज़बूत करता है।

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काव्यानुवाद सदैव कुछ कुछ अधूरा रह जाता है। किसी कविता को दूसरी भाषा में पूर्णतः रूपांतरित करना उतना ही असंभव है, जितना किसी बैंगनी पुष्प (वॉयलेट) को पात्र में रखकर उसके रंग और सुगंध के मूल तत्वों को ढूढने पाने का प्रयास करना।

कविता सदैव आनंद से संबद्ध रहती है। जिस किसी मन पर उसका प्रभाव पड़ता है, वह उसकी मधुरता में रची-बसी बुद्धिमत्ता को अनायास ही आत्मसात कर लेता है।

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सारी महान कविताएँ अनश्वर होती हैं। वे उस प्रथम बीज के समान हैं, जिसके भीतर संपूर्ण वृक्ष के विकसित होने की समस्त संभावनाएँ निहित रहती हैं।

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जितना हमने ग्रहण किया, उसे उतनी पूर्णता से आत्मसात नहीं कर सके।

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भाषा दर्पण के समान होती है; जो परावर्तन का काम करती है, जबकि अन्य कलाएँ बादलों की भाँति प्रकाश को धुँधला कर देती हैं। यद्यपि दोनों ही अभिव्यक्ति और संप्रेषण के माध्यम हैं।

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प्रतिशोध एक अर्द्ध बर्बर युग की पूजा का नंगा देवता है और आत्म-छल वह ढका हुआ रूप है; जो अज्ञात बुराई का प्रतीक है, जिसके सामने विलासिता नतमस्तक हो जाती है।

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बृहद अर्थ में सुख अथवा मंगल वह अवस्था है, जिसकी प्राप्ति की आकांक्षा एक संवेदनशील और बुद्धिमान प्राणी का चेतनाशील मन करता है और जिसे पाकर वह संतोष का अनुभव करता है। सुख मुख्यतः दो प्रकार का माना जा सकता है—एक वह जो स्थायी, सार्वभौमिक और चिरस्थायी होता है; दूसरा वह जो क्षणभंगुर और सीमित होता है। उपयोगिता का संबंध या तो उस प्रथम प्रकार के सुख को उत्पन्न करने वाले साधनों से हो सकता है, अथवा दूसरे प्रकार से। यदि इसे पहले अर्थ में समझा जाए, तो जो कुछ हमारी भावनाओं को अधिक दृढ़ और निर्मल बनाता है, कल्पना का विस्तार करता है तथा चेतना को अधिक सजीव और प्रेरणामय बनाता है, वही वास्तव में उपयोगी कहलाने योग्य है।

कोई भी इंसान यह नहीं कह सकता कि अब मैं कविता लिखूँगा यहाँ तक कि सबसे महान कवि भी ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि सृजन का क्षण पूरी तरह दिमाग़ पर निर्भर नहीं होता। यह किसी बुझ रहे अँगारे की तरह होता है, जिसे कोई अदृश्य शक्ति—एक अनियमित इबा की तरह—थोड़ी देर के लिए प्रज्ज्वलित कर देती है। यह प्रेरणा भीतर से ही जन्म लेती है, जैसे किसी फूल का रंग धीरे-धीरे खिलता है और फिर मुरझाने लगता है। हमारी चेतना तो इसकी पूर्व-सूचना दे पाती है और ही इसके नष्ट होने अनुमान लगा पाती है।

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अश्लीलता जीवन-सौंदर्य के विरुद्ध, एक प्रकार की दैवी-अवमानना है। वह जितनी अधिक छिपाई जाती है, उतनी ही अधिक उग्र और विकृत होती जाती है, चाहे उसका बाहरी रूप कम आपत्तिजनक प्रतीत हो। यह ऐसी विकृत प्रवृत्ति है, जिसे समाज की नैतिक भ्रष्टता निरंतर गुप्त रूप से पोषित करती रहती है।

दाँते की भाषा में जीवन की धड़कन सुनाई देती है। उनके शब्द केवल शब्द नहीं, बल्कि अमर विचारों के प्रज्वलित कण हैं। उनके अनेक चिंतन आज भी समय की राख के नीचे दबे पड़े हैं—बिजली की उर्जा से परिपूर्ण और सजीव, किसी योग्य चेतना के स्पर्श की प्रतीक्षा में।

संभव है कि विश्व की सर्वश्रेष्ठ कविताएँ भी उन आद्य संवेदनाओं और विचारों की मात्र क्षीण छाया हों, जिनका वास्तविक उद्भव कवि के अंतस्तल में हुआ था।

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अच्छे नाटक में आलोचना या घृणा के लिए बहुत कम जगह होती है, यह मनुष्य को आत्म-ज्ञान और आत्म-सम्मान सिखाता है।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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