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Helen Keller

1880 - 1968 | دوسرا

کی

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आँख वाले प्रायः इस तरह सोचते हैं कि अंधों की, विशेषतः बहरे-अंधों की दुनिया, उनके सूर्य प्रकाश से चमचमाते और हँसते-खेलते संसार से बिलकुल अलग हैं और उनकी भावनाएँ और संवेदनाएँ भी बिलकुल अलग हैं और उनकी चेतना पर उनकी इस अशक्ति और अभाव का मूलभूत प्रभाव है।

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इतिहास ने जिन स्त्री-पुरुषों को मानवता की सेवा का अवसर देकर समादृत किया है, उनमें से अधिकांश को विपरीत परिस्थितियों का अनुभव हुआ है।

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किंवदंती के अनुसार जब ईसा पैदा हुए तो आकाश में सूर्य नाच उठा। पुराने झाड़-झंखाड़ सीधे हो गए और उनमें कोपलें निकल आईं। वे एक बार फिर फूलों से लद गए और उनसे निकलने वाली सुगंध चारों ओर फैल गई। प्रति नए वर्ष में जब हमारे अंतर में शिशु ईसा जन्म लेता है, उस समय हमारे भीतर होने वाले परिवर्तनों के ये प्रतीक हैं। बड़े दिनों की धूप से अभिसिक्त हमारे स्वभाव, जो कदाचित् बहुत दिनों से कोंपलविहीन थे, नया स्नेह, नई दया, नई कृपा और नई करुणा प्रगट करते हैं। जिस प्रकार ईसा का जन्म ईसाइयत का प्रारंभ था, उसी प्रकार बड़े दिन का स्वार्थहीन आनंद उस भावना का प्रारंभ है, जो आने वाले वर्ष को संचालित करेगी।

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जो लोग ख़ुशी की तलाश में घूमते हैं, वे अगर एक क्षण रुकें और सोचें तो वे यह समझ जाएँगे कि सचमुच ख़ुशियों की संख्या, पाँव के नीचे के दूर्वादलों की तरह अनगिनत है; या कहिए कि सुबह के फूलों पर पड़ी हुई शुभ्र चमकदार ओस की बूँदों की तरह अनंत है।

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हाथ को ध्यान से देखो तो तुम्हें दिखेगा कि वह आदमी की सच्ची तस्वीर है, वह मानव-प्रगति की कहानी है, संसार की शक्ति और निर्बलता का माप है।

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साधारण चुनाव महत्वपूर्ण होते हैं और सीधे-सादे शब्द निर्णयकारी।

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देखा; किंतु मुझे उसकी सुंदरता के बारे में बताया गया है। मैं जानती हूँ कि उसकी सुंदरता सदैव ही अधूरी और टूटी-फूटी होती है। वह आसमान पर कभी भी पूर्णाकार में प्रकट नहीं होता। यही बात उन सभी चीज़ों के बारे में सही है जिन्हें हम पृथ्वी वाले जानते हैं। जिस तरह इंद्रधनुष का वृत्त खंडित होता है, उसी तरह जीवन भी अधूरा है और हममें से हरेक के लिए टूटा-फूटा है। हम ब्राउनिंग के इन शब्दों, ‘‘पृथ्वी पर टूटे हुए बिंब, स्वर्ग में एक पूर्ण चंद्र’’ का अर्थ तब तक नहीं समझ सकेंगे, जब तक हम अपने खंड जीवन से अनंत की ओर क़दम नहीं बढ़ा लेते।

जीवन अगर साहस से भरी यात्रा हुआ, तो कुछ हुआ।

अगर हम अपनी वर्तमान स्थिति में सफल नहीं हो सकते तो किसी अन्य स्थिति में भी नहीं हो सकेंगे। अगर हम कमल की तरह कीचड़ में भी पवित्र और दृढ़ नहीं रह सकते तो हम कहीं भी रहें, नैतिक दृष्टि से कमज़ोर ही साबित होंगे।

जिस तरह स्वार्थ और शिकायत से मन रोगी और धुँधला हो जाता है, उसी तरह प्रेम और उसके उल्लास से दृष्टि तीखी हो जाती है।

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आत्मज्ञान ही हमारी चेतना की शर्त और सीमा है। शायद इसलिए ही कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने अनुभव की छोटी परिधि के बाहर की बातें बहुत कम जानते हैं। वे अपने भीतर देखते हैं और उन्हें जब वहाँ कुछ नहीं मिलता तो वे यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि बाहर कुछ नहीं है।

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आंतरिक सत्यों में हमारी अंधता के कारण कोई अंतर नहीं पड़ता। अधिकतम सौंदर्य-दृष्टि तक केवल कल्पना के द्वारा ही पहुँचा जा सकता है।

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जब हम यह सोचते है कि हमारे रोज़ के छोटे-छोटे निर्णय नगण्य हैं, तब हम अपनी तुच्छता ही प्रदर्शित करते हैं।

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आनंद स्वार्थ-सिद्धि से नहीं मिलता बल्कि किसी समुचित उद्देश्य के प्रति वफ़ादार होने से मिलता है।

सुख का एक द्वार बंद होने पर, दूसरा खुल जाता है; लेकिन कई बार हम बंद दरवाज़े की तरफ़ इतनी देर तक ताकते रहते हैं कि जो द्वार हमारे लिए खोल दिया गया है, उसे देख नहीं पाते।

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सुरक्षा, निश्चिंतता या बेफ़िक्री एक कल्पना है, अंधविश्वास है।

ज्ञान, प्रेम और प्रकाश और दृष्टि है।

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मैं, जो कि अंधी हूँ, आँख वालों को एक सुझाव दे सकती हूँ—अपनी आँखों का ऐसे उपयोग कीजिए कि जैसे कल आप अंधे हो जाने वाले हैं। और यही तरीक़ा अन्य इंद्रियों के लिए भी अपनाया जा सकता है। लोगों की कंठध्वनियों के संगीत, पक्षियों के गीत और वाद्यवृंदों की स्वरलहरी को ऐसे सुनिए, जैसे कल आपकी स्पर्श-शक्ति नष्ट हो जाएगी। फूलों का सौरभ यों सूँघिए, भोजन के प्रत्येक कौर का रस यों लीजिए, जैसे कल आप सूँघने चखने में असमर्थ हो जाने वाले हैं। प्रकृति ने आपको जो संपर्क के साधन दिए हैं, उनके माध्यम से यह संसार आनंद और सौंदर्य के जितने भी पहलू आपके सामने उद्घाटित करे, उन सब पर अभिमान अनुभव कीजिए।

सौंदर्य, आकार, अनुपात और क्रम के सारतत्त्व अंधों को सुलभ और हस्तगत हैं; सौंदर्य और छंद इंद्रियजन्य नहीं, बल्कि उससे गहरे, किसी आध्यात्मिक विधि के परिणाम हैं।

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सौंदर्य, आकार, अनुपात और क्रम के सारतत्त्व अँधों को सुलभ और हस्तगत हैं; सौंदर्य और छंद इंद्रियजन्य नहीं, बल्कि उससे गहरे, किसी आध्यात्मिक विधि के परिणाम हैं।

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मेरा विश्वास है कि मनुष्य और मनुष्य के बीच का हर प्रश्न, धार्मिक प्रश्न है और हर सामाजिक अपराध नैतिक अपराध है।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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