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Nirmal Verma

1929 - 2005 | شملہ, ہماچل پردیش

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किसी के बारे में सब कुछ जान लेना, उसे फिर से अजनबी बना देता है।

अँधेरे में संगीत दो व्यक्तियों को कितना पास खींच लाता है!

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हर शब्द किसी अनुभव की याद है, किसी जाने-पहचाने यथार्थ की स्मृति जगाता है।

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एक कलाकृति जो सत्य हमें सम्प्रेषित करती है, वह अपने में चाहे कितना अद्वितीय और अनूठा क्यों न हो; उसका मूल्य अन्ततः उन रिश्तों में उद्घाटित होता है, जो वह अब तक के हमारे अर्जित किए अनुभूत सत्यों के साथ जोड़ पाती है।

एक महान आलोचक अपनी संस्कृति का भी आलोचक होता है। वह कलाकृति के स्वायत्त अनुभव को मानवीय संस्कृति की निरंतरता में—जिसे हम परंपरा कहते हैं—उसके भीतर परिभाषित करता है।

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एक कलाकृति की सतह; उसकी भाषा के दृश्य-संकेत, उतना ही बड़ा सत्य है—जितनी उसके अर्थ की गहराई। दोनों अभिन्न रूप से कला के सम्मुख सत्य के साथ जुड़े हैं; बिना एक को जाने दूसरे को जानना असंभव है। दरअसल कला का रहस्य दोनों के अंतर्निहित रिश्ते में वास करता है।

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जुदाई का हर निर्णय संपूर्ण और अंतिम होना चाहिए; पीछे छोड़े हुए सब स्मृति-चिह्नों को मिटा देना चाहिए, और पुलों को नष्ट कर देना चाहिए, किसी भी तरह की वापसी को असंभव बनाने के लिए।

उन्यास का सत्य अनिवार्यतः उसकी भाषा में संवेदित होता है।

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कविता में शब्द; असली अर्थ में शब्द बनते हैं, जैसे मूर्ति में पत्थर असली अर्थ में पत्थर बनता है।

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एक कलाकृति का सत्य यदि रहस्यमय होता है, तो इसलिए कि वह न तो पूरी तरह बोध के परे है, न पूरी तरह से मनुष्य उसे हासिल कर पाता है। वह कहीं इन दो चरमों के बीच में है; वह कुछ कहती है, कुछ नहीं कहती, इसलिए नहीं कि वह कहना नहीं जानती, बल्कि जो कलाकृति कहती है, उसमें वे अकथनीय सत्य भी शामिल होते हैं, जो अपनी चुप्पी के बावजूद उसमें मौजूद रहते हैं।

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व्यावहारिक आलोचना की मर्यादा यह है कि वह उस 'भाषा' का मूल्य पहचान सके, जिसमें एक कलाकृति हमारे युग की संस्कृति पर आलोचना करती है।

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संवेदनहीन भाषा जिस तरह कलाकृति का अर्थ उद्घाटित नहीं कर पाती, उसी तरह उस कलाकृति की भाषा कभी संवेदनशील नहीं मानी जा सकती, जो किसी महत्वपूर्ण सत्य से शून्य है।

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एक महान कलाकृति मनुष्य को नहीं बदलती, न उसके संसार को बदलती है। वह सिर्फ़ उस रिश्ते को बदलती है; जो अब तक मनुष्य अपने संसार से बनाता आया था, लेकिन एक बार रिश्ता बदल जाने के बाद न तो वह मनुष्य ही वैसा मनुष्य रह पाता है, जैसा वह कलाकृति के संपर्क में आने से पहले था, न उसका संसार वैसा संसार रह जाता है, जो उसे कलाकृति के अनुभव के बाद दिखाई देता है।

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मिट्टी, पत्थर, स्वर, शब्द—शब्द जो सबसे शुरू में था—एक ऐसी भाषा की सृष्टि करते हैं, जिसे समझना नहीं, सुनना होता है, देखना होता है, अनुभूत करना होता है।

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इस दुनिया में कितनी दुनियाएँ ख़ाली पड़ी रहती हैं, जबकि लोग ग़लत जगह पर रहकर सारी ज़िंदगी गँवा देते हैं।

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जो सभ्यता प्रकृति पर विजय पाने में ही अपना गौरव प्राप्त करती है, वह सुनने, देखने और अनुभूत करने की क्षमता को ही नष्ट कर देती है।

यदि आलोचना की मर्यादा इसमें है कि वह तटस्थ होकर नहीं, अपने विश्वासों और आग्रहों के साथ कलाकृति से मुठभेड़ करती है, तो उससे कहीं ऊँची मर्यादा यह है कि ज़रूरत पड़ने पर वह अपनी सब कसौटियों और मापदंडों को त्याग सकती है, जो उस कलाकृति के सामने झूठी और अप्रासंगिक बन गई हों।

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आदमी उसी चीज़ का स्वप्न देखता है; जो कभी पहले थी, जो आज भी कहीं छिपी है। हम उसकी दी हुई मौजूदगी को एक गुज़री हुई याद की तरह महसूस करते हैं—नॉस्टेल्जिया की तरह नहीं, बल्कि एक छिपे हुए ज़ख़्म की तरह।

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आदमी को पूरी निर्ममता से अपने अतीत में किए कार्यों की चीर-फाड़ करनी चाहिए, ताकि वह इतना साहस जुटा सके कि हर दिन थोड़ा-सा जी सके।

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हर रोज़ कोई मेरे भीतर कहता है, तुम मृत हो। यही एक आवाज़ है, जो मुझे विश्वास दिलाती है, कि मैं अब भी जीवित हूँ।

साहित्य हमें पानी नहीं देता, वह सिर्फ़ हमें अपनी प्यास का बोध कराता है। जब तुम स्वप्न में पानी पीते हो, तो जागने पर सहसा एहसास होता है कि तुम सचमुच कितने प्यासे थे।

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जब हम प्यार करते हैं, तो स्त्री को धीरे-धीरे उस दीवार के सहारे खड़ा कर देते हैं, जिसके पीछे मृत्यु है; हम दीवार के सहारे उसका सिर टिका कर उसे सहलाते हैं, चूमते हैं, बातों में उसे बहलाते हैं, बराबर यह आशा लगाए रहते हैं—कि वह कहीं मुड़कर दीवार के पीछे न झाँक ले।

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जिसे हम जागृतावस्था कहते हैं—वे सिर्फ़ पीड़ा के क्षण हैं—दो प्रेम-स्वप्नों के बीच।

हम अपने को सिर्फ़ अपनी संभावनाओं की कसौटी पर नाप सकते हैं। जिसने अपनी संभावनाओं को आख़िरी बूँद तक निचोड़ लिया हो, उसे मृत्यु के क्षण की कोई चिंता नहीं करनी चाहिए।

‘उदास’ शब्द ‘उदासी’ की जगह नहीं ले सकता।

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जब हम अपने अतीत के बारे में सोचते हैं, तो अविश्वसनीय क़िस्म की हैरानी होती है कि हम ऐसी मूर्खतापूर्ण ग़लतियाँ कैसे कर सकते थे, जिन्हें आज हम इतनी सफ़ाई से देख सकते हैं।

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कुछ शब्द जादुई होते हैं, अपने अर्थों में नहीं; ऐसे शब्द जो कोई संदेश देने से पहले भी अपना अर्थ रखते हैं, शब्द जो अपने में ही अर्थ और संकेत हैं, जिन्हें समझना नहीं, सुनना होता है—एक जानवर के शब्द, एक बच्चे की स्वप्न-भाषा।

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हम एक ऐसी सभ्यता में रहते हैं, जिसने सत्य को खोजने के लिए सब रास्तों को खोल दिया है, किंतु उसे पाने की समस्त संभावनाओं को नष्ट कर दिया है।

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अगर मैं दुख के बग़ैर रह सकूँ, तो यह सुख नहीं होगा; यह दूसरे दुख की तलाश होगी; और इस तलाश के लिए मुझे बहुत दूर नहीं जाना होगा; वह स्वयं मेरे कमरे की देहरी पर खड़ा होगा, कमरे की ख़ाली जगह को भरने…

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एक अकेले व्यक्ति और संन्यासी के अकेलेपन में भयानक अंतर है—एक अकेला व्यक्ति दूसरों से अलग होकर अपने में रहता है; एक संन्यासी अपनेपन से मुक्त होकर दुनिया में जीता है।

जब तक तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व अर्थ की कामना नहीं करता, तब तक तुम एक मृत व्यक्ति हो। मुश्किल यह है कि जब तक मृत्यु का स्पर्श नहीं मिलता, तब तक हम अर्थ की कामना नहीं करते।

हमें उन चीज़ों के बारे में लिखने से अपने को रोकना चाहिए, जो हमें बहुत उद्वेलित करती हैं...

यह भयानक है, जब लेखक लिखना बंद कर देता है। उसके पास दुनिया को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं रहता, सिवा अपने चेहरे के!

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यह अजीब बात है, जब तुम दो अलग-अलग दुखों के लिए रोने लगते हो और पता नहीं चलता, कौन-से आँसू कौन-से दुख के हैं।

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जब हम जवान होते हैं, हम समय के ख़िलाफ़ भागते हैं, लेकिन ज्यों-ज्यों बूढ़े होते जाते हैं, हम ठहर जाते हैं, समय भी ठहर जाता है, सिर्फ़ मृत्यु भागती है, हमारी तरफ़।

जिन्हें हम अपने जीवन के ‘सृजनात्मक क्षण’ कहते हैं, वे घोर कृतघ्नता के क्षण हैं। वे चाहे प्रेम के हों या लेखन के।

भयावह यथार्थ के सम्मुख ‘धर्म’ जैसी चीज़ कितनी काल्पनिक जान पड़ती है!

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ईश्वर अनाम न रहे, इसीलिए देवता हैं।

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अतीत हमें कुछ नहीं सिखाता, वह उसी तरह तर्कातीत है, जैसे दिन के उजाले में पिछली रात का स्वप्न…

कौन कहता है कि दुनिया एक रहस्य है? वह एक किताब की तरह खुली है, हर चीज़ एक-एक अक्षर की तरह अंकित है; आश्चर्य की बात यह है, कि हम हर अक्षर के पीछे कोई अर्थ ढूँढ़ना चाहते हैं, जो नहीं है, यदि कोई अर्थ है—तो वह अक्षर नहीं, क्षर है।

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एक लेखक आत्म से शुरू करके शून्य की ओर जा सकता है, किंतु जो अपने को शून्य से शुरू करता है, उसे ‘आत्म’ तक पहुँचने के लिए अपनी समूची संस्कृति को बदलना होगा—वरना वह सिर्फ़ प्रयोगशील लेखक बनकर रह जाएगा।

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जब हम अपनी आस्थाओं की धरती से मृत्यु को देखते हैं—तो वह कितनी सह्य और सहज जान पड़ती है : जब हम मृत्यु—अपनी मृत्यु की ज़मीन से—अपनी आस्थाओं को देखते हैं, तो वे कितनी ग़रीब और संदिग्ध दिखाई पड़ती हैं…

कलाकार दुनिया को छोड़ता है, ताकि उसे अपने कृतित्व में पा सके।

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वह हर किताब का पन्ना मोड़ देता है ताकि अगली बार जब वह पढ़ना शुरू करे तो याद रहे, पिछली बार कहाँ छोड़ा था। एक दिन जब वह नहीं रहेगा, तो इन किताबों में मुड़े हुए पन्ने अपने-आप सीधे हो जाएँगे—पाठक की मुकम्मिल ज़िंदगी को अपने अधूरेपन से ढँकते हुए…

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हम क्यों कुछ कविताओं, कलाकृतियों की तरफ़ बार-बार लौटते हैं? क्या देखते हैं उनमें, कि जितनी प्यास बुझती है, उतनी बाक़ी बची रह जाती है, फिर लौटते हैं, चले जाते हैं? क्या उनका कोई ‘मतलब’ है, जो बार-बार हाथ से छूट जाता है और हम उसे पाने दुबारा-तिबारा उनके पास लौटकर चले आते हैं?

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कला—हर महत्वपूर्ण कलाकृति—संयोग को अनिवार्य में बदलने की कोशिश है।

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अँधेरे में संगीत दो व्यक्तियों को कितना पास खींच लाता है।

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