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गाँव पर गीत

महात्मा गांधी ने कहा

था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में कविता के लिए गाँव एक नॉस्टेल्जिया की तरह उभरता है जिसने अब भी हमारे सुकून की उन चीज़ों को सहेज रखा है जिन्हें हम खोते जा रहे हैं।

वही मोरा गाँव

अन्नू रिज़वी

अबूझ पहेली

विनम्र सेन सिंह

सुधार नइखे

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

गाँव के सँवरिया

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

बेड़ी पड़ि गइल पाँव में

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

गामकेँ प्रणाम

गंगेश गुंजन

हमरी गउवां के माटी अनमोल

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

बारूद पर गाँव

ब्रजभूषण मिश्र

बसाबह गाम अप्पन

मार्कण्डेय प्रवासी

ग्लोबल मिथिला

विभूति आनंद

हमरा गाममे

मार्कण्डेय प्रवासी

की बाजू?

मार्कण्डेय प्रवासी

जागौ धरती मइया

अशोक अज्ञानी

इहे पहिचान बाटे

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

बरगदवा बोलावेला

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

अड़हूल फूलक गीत

गंगेश गुंजन

शहरिया से गाँव हो

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

शहरिया में मनवां ना लागे

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

गाँव नीक बा

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

झलकेले मोतिया

भोलानाथ गहमरी

के देई गुड़ रोटी

भोलानाथ गहमरी

धधक रहल गाँव

ब्रजभूषण मिश्र

काल बड़ा विकराल खड़ा

रामजियावान दास ‘बावला’

गामे मोन पड़ैए

कालीकान्त झा ‘बूच’

हमरो गाँव रे

भोलानाथ गहमरी

हमर गाम

कालीकान्त झा ‘बूच’

कहाँ गइल

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

साथी तोहरे गाँव में

रमाकान्त मुकुल

गाँव की पहाड़ी

देवेंद्र कुमार बंगाली

हम ठहरे गाँव के

देवेंद्र कुमार बंगाली

ग्राम-वासिनी

गोपालशरण सिंह

ग्राम

गोपालशरण सिंह

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere