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पाप पर उद्धरण

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अज्ञान निर्दोषता नहीं है, पाप है।

रॉबर्ट ब्राउनिंग
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कायर लोग ही पापाचरण करते हैं, वीर पुरुष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते—यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते।

स्वामी विवेकानन्द
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मनुष्य को चाहिए कि वह जिस स्थिति में भी हो, मृत्यु की परवाह करके कर्तव्य का पालन करे। मृत्यु की अपेक्षा अधर्म से अधिक डरना चाहिए।

सुकरात
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मन-मुख एक होने पर भीतर मलिनता नहीं जम सकती, गुप्त मैल भाषा के ज़रिए निकल पड़ते हैं। पाप उसके अंदर जाकर घर नहीं बना सकता।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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यदि कहीं पाप, अन्याय है; अत्याचार है, तो उनका फल उत्पन्न करना और संसार के समक्ष रखना लोकरक्षा का कार्य है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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सभी पाप ख़ालीपन को भरने के प्रयास होते हैं।

सिमोन वेल
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हर पाप ख़ालीपन से भागने का प्रयास है।

सिमोन वेल
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वासनाओं के वशीभूत होने से बढ़कर कोई पाप नहीं है, अपनी परिस्थिति से असंतुष्ट रहने से बढ़कर कोई विपत्ति नहीं है और परिग्रह के बढ़कर कोई दोष नहीं है। इसलिए संतोष की ही अंतिम रूप से सार्थकता सिद्ध होती है।

लाओत्से
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जब कोई आदमी पाप या अपराध करना चाहता है, तो आपका सर्वशक्तिमान ईश्वर उसे रोकता क्यों नहीं?

भगत सिंह
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पवित्रता की माप है मलिनता, सुख का आलोचक है दुःख, पुण्य की कसौटी है पाप।

जयशंकर प्रसाद
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मूर्ख मनुष्य विद्वानों को गाली और निंदा से कष्ट पहुँचाते हैं। गाली देने वाला पाप का भागी होता है और क्षमा करने वाला पाप से मुक्त हो जाता है।

वेदव्यास
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वह सबको शरण देने वाला है, दाता और सहायक है। अपराधों को क्षमा करने वाला है, जीविका देने वाला है और चित्त को प्रसन्न करने वाला है।

गुरु गोविंद सिंह
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हमें जिस पाप ने घेर रखा है, वह हमारा मतभेद नहीं बल्कि हमारा ओछापन है। हम शब्दों पर झगड़ा करते हैं। कई बार तो हम परछाई के लिए लड़ते हैं और मूल वस्तु को खो बैठते हैं।

महात्मा गांधी
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मनुष्य की हृदयभूमि में मोह रूपी बीज से उत्पन्न हुआ एक विचित वृक्ष है जिसका नाम है काम। क्रोध और अभिमान उसके महान स्कंध हैं। कुछ करने की इच्छा उसमें जल सींचने का पात्र है। अज्ञान उसकी जड़ है, प्रमाद ही उसे सींचने वाला जल है, दूसरे के दोष देखना उस वृक्ष का पत्ता है तथा पूर्वजन्म के किए गए पाप उसके सार भाग है। शोक उसकी शाखा, मोह और चिंता डालियाँ एवं भय उसका अँकुर है। मोह में डालने वाली तृष्णा रूपी लताएँ उसमें लिपटी हुई है।

वेदव्यास
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पाप कर्म बन जाने पर सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करने वाला मनुष्य उस पाप से छूट जाता है तथा फिर कभी ऐसा कर्म नहीं करूँगा, ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेने पर भविष्य में होने वाले दूसरे पाप से भी मुक्त हो जाता है।

वेदव्यास
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विहित यज्ञ, दान, तप, सत्य, शौच, अंहिसा, दया, शम, दम, अक्रोध, अलोभादि वचन, मन और शरीर से किए गए धर्म होते हैं, और इनसे विपरीत हिंसा, चौर्य, असत्यभाषण, दम्भादि अधर्म होते हैं।

श्री पीताम्बर पंडित
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जिस कर्म को मनुष्य के सामने कहने से मुँह पर कालिमा लगती है, उसे करने मत जाओ। जहाँ गोपनता है; घृणा-लज्जा-भय से वहीं दुर्बलता है, वहीं है पाप।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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तू सब धर्मों को छोड़कर एक परमात्मा की शरण में जा, परमात्मा तुझे सब पापों से मुक्त करेगा। तू मत शोक कर।

वेदव्यास
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क्षमाशील पुरुषों में एक ही दोष का आरोप होता है। दूसरे की तो संभावना ही नहीं है। दोष यह है कि क्षमाशील को लोग असमर्थ समझ लेते हैं किंतु क्षमाशील का वह दोष नहीं मानना चाहिए क्योंकि क्षमा में बड़ा बल है।

वेदव्यास
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हे अर्जुन! सहज कर्म दोषयुक्त होने पर भी त्यागना नहीं चाहिए क्योंकि धुएँ से अग्नि के सदृश सब ही कर्म किसी किसी दोष से आवृत होते हैं।

वेदव्यास
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पाप और पुण्य मात्र कृत्य ही नहीं हैं। वस्तुतः तो वे हमारे अंतःकरण के सोये होने या जागे होने की सूचनाएँ हैं।

ओशो
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जैसे कमल पत्र में जल नहीं लिप्त होते हैं, तैसे ही असंग साक्षी के अनुभवी में पाप कर्म नहीं लिप्त होते हैं।

श्री पीताम्बर पंडित
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पाप से बचने के लिए विशेष आग्रहशील होकर हम पाप के ही मुँह में जा गिरते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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धर्म, पाप की जो व्याख्या करते हैं—वह पुरोहित शोषक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए होती है।

हरिशंकर परसाई
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जो कर्म मन का प्रसारण ले आता है, वही सुकर्म है और जिससे मन में संस्कार, कट्टरता इत्यादि आते हैं; फलस्वरूप जिससे मन संकीर्ण होता है, वही कुकर्म है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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कुल के नाश होने से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म के नाश होने से संपूर्ण कुल को पाप भी बहुत दबा लेता है।

वेदव्यास
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किसी के द्वारा दोषी बनाने के पहले ही, कातर भाव से अपना दोष स्वीकार करो। मुक्त-कलंक होगे, जगत् के स्नेह के पात्र बनोगे।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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आदमी में मन की पवित्रता छिपाए नहीं छिपती, कुटिल और कलुषित मन वाला छिप सकता है।

बालकृष्ण भट्ट
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भगवान भले ही पापों को क्षमा कर दे किंतु स्नायु-संस्था हमें किसी भी भूल के लिए क्षमा नहीं करती।

विलियम जेम्स
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जब तक इस संसार से पाप बिल्कुल ही मिटा दिया जाएगा, जब तक मनुष्य का मन पत्थर बन जाएगा, तब तक इस पृथ्वी में अन्याय-मूल भ्रांति होती ही रहेगी और उसे क्षमा करके प्रश्रय भी देना ही पड़ेगा।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय
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कुसंग से बढ़कर पाप संसार में नहीं है और कुसंगी के साथ रहने के कारण बहुत दुःख झेलना पड़ता है।

गंगाधर मेहेर
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बिना करनी के सोचते रहना ही कदाचित असली पाप है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी
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क्रोधी मनुष्य पाप कर सकता है, क्रोधी गुरुजनों की हत्या कर सकता है, क्रोधी कठोर वाणी द्वारा श्रेष्ठ जनों का अपमान भी कर सकता है।

क्रोधी मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि क्या कहना चाहिए तथा क्या नहीं। क्रोधी के लिए कुछ भी अकार्य एवं अवाच्य नहीं है।

वेदव्यास
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यदि पापी अपने पाप का फल एकांत में या अपनी आत्मा ही में भोग कर चला जाता है तो वह अपने जीवन की सामाजिक उपयोगिता की एकमात्र संभावना को भी नष्ट कर देता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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हे साक़ी! ईश्वर-प्रेम की मदिरा मुझको पुरस्कार में प्राप्त हुई है। बिना ईश्वर-प्रेम की मदिरा पीने वाला पापी है। ईश्वर प्रेम से रहित मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता है। मनुष्य-जीवन का उद्देश्य ईश्वर प्रेम को प्राप्त करना है।

उमर ख़य्याम
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कार्य की सफलता का मूल कारण है उत्तम उद्योग। उद्योग के बिना कोई भी सिद्धि नहीं होती है। उद्योग से ही सब समृद्धियों का उदय होता है और जहाँ उद्योग नहीं है, वहाँ पाप ही पाप है।

अश्वघोष
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वत्स! जो सदा क्षमा ही करता है, उसे अनेक दोष प्राप्त होते हैं उसके भृत्य, शत्रु तथा उदासीन सभी उसका तिरस्कार करते हैं।

वेदव्यास
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गौओं का नाम ही 'अघ्न्या' (अवध्य) है, फिर इन गौओं को कौन काट सकता है? जो लोग गौ को या बैल को मारते हैं, वे बड़ा अयोग्य कर्म करते हैं।

वेदव्यास
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शुभ कर्म से सुख तथा पाप कर्म से दुःख प्राप्त होता है, सर्वत्र कर्म ही फल देता है, बिना किए हुए कर्म का फल कहीं नहीं भोगा जाता।

वेदव्यास
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दर्शन से, स्पर्श से, जलपान करने तथा नाम कीर्तन से सैकड़ों तथा हज़ारों पापियों को गंगा पवित्र कर देती है।

वेदव्यास
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सावधान! संकीर्णता या पाप को गोपन रखो, उत्तरोत्तर वर्द्धित होकर अतिशीघ्र तुम्हें अधःपतन के चरम में ले जाएगा।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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मनुष्य को दुर्बल और भयभीत बनाने वाला संसार में जो कुछ है, वही पाप है और उसी से बचना चाहिए।

स्वामी विवेकानन्द
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राजन्! परिहासयुक्त वचन असत्य होने पर भी हानिकारक नहीं होता। अपनी स्त्रियों के प्रति, विवाह के समय, प्राण-संकट के समय तथा सर्वस्व का अपहरण होते समय विवश होकर असत्य भाषण करना पड़े तो वह दोषकारक नहीं होता। ये पाँच प्रकार के असत्य पापशून्य कहे गए हैं।

वेदव्यास
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जिस कर्म से ईश्वर हमसे दूर होता है वह पाप है।

संत तुकाराम
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जैसे मुंज के तूल अग्नि में देने पर शीघ्र दग्ध होता है, वैसे प्राणात्मज्ञ के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्री पीताम्बर पंडित
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पापों का फल तत्काल समझ में नहीं आता। उसका ज़हर अवस्था की तरह ठीक अपने समय पर चढ़ता है।

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
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परोपकार पुण्य तथा पर पीड़ा पाप है।

लूसिया कैरम
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जिस गृहस्थ के घर से अतिथि निराश होकर लौट जाता है, वह उस गृहस्थ को अपना पाप देकर उसका पुण्य ले जाता है।

वेदव्यास
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पाप की ज्वलंत प्रतिमूर्ति है दुर्बलता।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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कोई बात प्राचीन है इसलिए वह अच्छी है ऐसा मानना बहुत ग़लत है। यदि प्राचीन सब अच्छा ही होता तो पाप कम प्राचीन नहीं है। परन्तु चाहे जितना भी प्राचीन हो, पाप त्याज्य ही रहेगा।

महात्मा गांधी

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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