मेरे विचार से जिस आदमी में थोड़ा-सा भी विवेक होता है, वह हमेशा अपनी परिस्थितियों को तर्कसंगत ढंग से समझना चाहता है।
समय एक ऐसा कारक है जो बिना उत्तर के भी आगे जाकर किसी प्रश्न की तीव्रता को कम कर सकता है।
सवाल सिर्फ़ अतीत को मिटाने का ही है।
प्रगति में समर्थक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह पुराने विश्वास से संबंधित हर बात की आलोचना करे, उसमें अविश्वास करे और उसे चुनौती दे।
जो प्रश्न हमेशा मेरे दिमाग़ में घूमता रहता है, वह यह है : मैं किस चीज़ में बेहतर हूँ। क्या मैं किसी भी तरह से किसी भी काम के लिए उपयोगी नहीं हूँ।
वेदांत निवृत्ति का मार्ग है, कर्म से हट जाने का मार्ग, जब कि प्रश्न प्रवृत्ति का है—प्रवृत्ति के औचित्य का।
उद्धरण के होने से पहले प्रश्न का आना नहीं होता।
जब कोई आदमी पाप या अपराध करना चाहता है, तो आपका सर्वशक्तिमान ईश्वर उसे रोकता क्यों नहीं?
कोई उत्पीड़नकारी व्यवस्था इसकी इजाजत नहीं दे सकती कि उत्पीड़ित लोग पूछने लगें, ऐसा क्यों?
इतिहास का अर्थ है मनुष्य जाति के सम्मुख उपस्थित हुए प्रश्नों का उल्लेखन।
किसी के मरने पर लोग पूछेंगे—"वह कौन-सी संपत्ति छोड़ गया है?" परंतु देवता पूछेंगे—"तुम अपने पीछे कौन से अच्छे कर्म छोड़ आए हो?"
कबीर की एक बड़ी विशेषता प्रश्न करने की प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति कबीर में जितनी प्रखर है, उतनी उस काल के किसी अन्य कवि में नहीं है।
यह नहीं है कि मैं अत्यधिक बुद्धिमान हूँ, बल्कि मैं प्रश्नों के साथ अधिक देर तक बना रहता हूँ।
यथार्थवादी होने का दावा करनेवाले को तो समूचे पुरातन विश्वास को चुनौती देनी होगी। यदि विश्वास विवेक का ताप नहीं सह सकता है, तो वह अपने आप ध्वस्त हो जाएगा।
-
संबंधित विषय : तर्क-वितर्कऔर 1 अन्य
अस्तित्व और अनस्तित्व—यही तो प्रश्न है।
कुछ और है, कुछ और है। पर क्या है? सीमाबद्ध मस्तिष्क की तरंगें पछाड़ खा-खाकर तीर पर सिर मार रही हैं—कुछ और है पर क्या है?
मेरा विश्वास है कि मनुष्य और मनुष्य के बीच का हर प्रश्न, धार्मिक प्रश्न है और हर सामाजिक अपराध नैतिक अपराध है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere