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आस्था पर उद्धरण

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तर्क और आस्था की लड़ाई हो रही थी और कहने की ज़रूरत नहीं कि आस्था तर्क को दबाए दे रही थी।

श्रीलाल शुक्ल
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किसी भी व्यक्ति पर एकात्म श्रद्धा ग़लत है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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यदि विश्वास विवेक की आँच बरदाश्त नहीं कर सकता, तो ध्वस्त हो जाएगा।

भगत सिंह
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एक वर्ग ऐसा रहा है, जो आदमी को हमेशा इस्तेमाल करता रहा है। पहले वह फ़िंक्शन के जरिए उसे एक्स्प्लायट करता था। उस के बाद फ़ेथ (विश्वास) के जरिये इस्तेमाल करता रहा, और अब फ़ैक्ट (तथ्य) के नाम पर इस्तेमाल कर रहा है।

धूमिल
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जब तक समष्टि-रूप में हमें संसार के लक्ष्य का बोध नहीं होता; और हमारे अंतःकरण में सामान्य आदर्शों की स्थापना नहीं होती, तब तक हमें श्रद्धा का अनुभव नहीं होता।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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श्रद्धा का मूल तत्त्व है—दूसरे का महत्त्व स्वीकारना। अतः जिनकी स्वार्थबद्ध दृष्टि अपने से आगे नहीं जा सकती, अथवा अभिमान के कारण जिन्हें अपनी ही बड़ाई के अनुभव की लत लग गई है—उनकी इतनी समाई नहीं कि वे श्रद्धा ऐसे पवित्र भाव को धारण करें।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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धर्म आस्तिक और आस्थावान व्यक्ति के लिए; जीवन संचालन के कतिपय आदर्शों, सिद्धांतों और मूल्यों का समच्चय है।

मैनेजर पांडेय
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जहाँ कहीं महानता, हृदय की विशालता, मन की पवित्रता एवं शांति पाता हूँ, वहाँ मेरा मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता है।

स्वामी विवेकानन्द
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जब मनुष्य ईश्वर को देखता है, तो वह उसे मनुष्य रूप में देखता है। इसी प्रकार अन्य प्राणी भी ईश्वर को अपनी-अपनी कल्पना, अपने-अपने रूप के अनुसार देखते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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सुसंगत ढंग से विकसित थियोलॉजी की परिणति सर्वेश्वरवाद में होती है। वैदिक सर्वेश्वरवाद, उपनिषदों के ईश्वरवाद का तर्कसम्मत नतीजा है। सर्वेश्वरवादी रूप में थियोलॉजी अपने को ही खा जाती है, क्योंकि सुसंगत सर्वेश्वरवाद नास्तिकवाद की ओर ले जाता है।

एम. एन. राय
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यदि किसी उत्तम काव्य या चित्र की विशेषता समझने के कारण; हम कवि या चित्रकार पर श्रद्धा कर सके, तो यह हमारा अनाड़ीपन है—हमारे रुचि-संस्कार की त्रुटि है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जब पूज्यभाव की वृद्धि के साथ श्रद्धाभाजन के सामीप्य-लाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूपों के साक्षात्कार की वासना हो, तब हृदय में भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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संसार में धर्म के संबंध में सर्वत्र सामान्यतः ऐसी शिक्षा मिलती है कि धर्म केवल श्रद्धा और विश्वास पर स्थापित है, और अधिकांश स्थलों में तो वह भिन्न-भिन्न मतों की समष्टि मात्र है। यही कारण है कि धर्मों के बीच केवल लड़ाई-झगड़ा दिखाई देता है।

स्वामी विवेकानन्द
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संप्रदाय-विशेष-पूजित काठ-पत्थरों के प्रतीक और उसकी पूजा या आचार-संस्कार, मनुष्य में मनुष्य को सदा ही विच्छिन्न रखते हैं। इसीलिए अपने अंतर में सत्य-स्वरूप और प्रेम-स्वरूप 'एक' को उपलब्ध करने के सिवा, मिलन का और क्या उपाए हो सकता है?

आचार्य क्षितिमोहन सेन
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श्रद्धालु अपने भाव में संसार को भी सम्मिलित करना चाहता है, पर प्रेमी नहीं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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परमात्मा की कृपा पर मेरा अखंड विश्वास है। वह कभी टूटनेवाला भी नहीं। धर्मग्रंथों पर मेरी अटूट श्रद्धा है।

स्वामी विवेकानन्द
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श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृत के साथ-साथ, पूज्य बुद्धि की संचार है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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प्रगति के समर्थक; प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह पुराने विश्वास से जुड़ी हर बात की आलोचना करे, उस पर अविश्वास करे और उसे चुनौती दे।

भगत सिंह
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अव्यक्त सत्य ‘श्रद्धा’ के रूप में रहता है। श्रद्धा उस सत्य को रखती है, जो सत्य ‘होना चाहिए’।

मुकुंद लाठ
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रचनात्मक प्रक्रिया आपकी मनचाही चीज़ को पाने में आपकी मदद करती है। इसके तीन आसान क़दम है : माँगें, यक़ीन करें और पाएँ।

रॉन्डा बर्न
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यदि प्रेम स्वप्न है, तो श्रद्धा जागरण है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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मैं स्वयं को ईश्वर में विश्वास करने और उसकी प्रार्थना के लिए तैयार नहीं कर सकता।

भगत सिंह
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कोरा विश्वास और अंधविश्वास ख़तरनाक होता है, क्योंकि वह दिमाग़ को कुंद करता है और आदमी को प्रतिक्रियावादी बना देता है।

भगत सिंह
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भक्ति के भीतर दो भावों का मेल होता है—श्रद्धा और प्रेम का। श्रद्धा भगवान के आहाल्य या महत्त्व की भावना से जगती है और प्रेम उनके सौंदर्य की भावना से।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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सदाचारी के प्रति यदि हम श्रद्धा नहीं रखते, तो समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करते।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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आज्ञा-पालन के गुण का अनुशीलन करो, लेकिन अपने धर्मविश्वास को खोओ।

स्वामी विवेकानन्द
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श्रद्धा स्वयं ऐसे कर्मों के प्रतिकार में होती है; जिनका शुभ प्रभाव अकेले हम पर नहीं, बल्कि सारे मनुष्य समाज पर पड़ सकता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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यक़ीन रखने में इस तरह काम करना, बोलना और सोचना शामिल है, जैसे आपको माँगी हुई चीज़ मिल चुकी है।

रॉन्डा बर्न
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तुम पवित्र तथा सर्वोपरि निष्ठावान बनो; एक मुहूर्त के लिए भी भगवान् के प्रति अपनी आस्था खोओ, इसी से तुम्हें प्रकाश दिखाई देगा। जो कुछ सत्य है, वही चिरस्थाई बनेगा; किंतु जो सत्य नहीं है, उसकी कोई भी रक्षा नहीं कर सकता।

स्वामी विवेकानन्द
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मैं उस भगवान् या धर्म पर विश्वास नहीं करता, जो विधवाओं के आँसू पोंछ सकता है और अनाथों के मुँह में एक टुकड़ा रोटी ही पहुँचा सकता है।

स्वामी विवेकानन्द
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धर्म, अलौकिकता में विश्वास का नाम है और अज्ञान उसका आधार है।

एम. एन. राय
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श्रद्धा जिज्ञासा का वह भाव है, जो खरेपन के साथ सत्य की ओर उन्मुख रहता है; मिथ्या के बहलावे में मोह में नहीं जाता, उसी को सत्य कहना चाहता है जो प्रामाणिक रूप से ‘है’—निःसंदेह ‘है’।

मुकुंद लाठ
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हम चीज़ों को जिस तरह देखते हैं, वह हमारे ज्ञान और विश्वासों से प्रभावित होता है।

जॉन बर्जर
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श्रद्धा सामर्थ्य के प्रति होती है और दया असामर्थ्य के प्रति।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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अविश्वासी एवं बहुनैष्ठिक के हृदय में भक्ति ही नहीं सकती।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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आस्था को किसी परीक्षण की कसौटी पर कसा नहीं जा सकता, यह मनोवैज्ञानिक सत्य है। आस्था का इम्तिहान लेने की इच्छा होना ही यह साबित करता है कि उसकी आस्था टूट चुकी है।

एम. एन. राय
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श्रद्धा का व्यापार-स्थल विस्तृत है, प्रेम का एकांत। प्रेम में घनत्व अधिक है और श्रद्धा में विस्तार।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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ज्योंही मनुष्य यह 'विश्वास' करना आरंभ कर देता है कि 'ईश्वर है', त्योंही वह ईश्वर को प्राप्त करने की प्रबल लालसा से पागल हो जाता है।

स्वामी विवेकानन्द
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आस्था एक विश्वासमूलक प्रत्यय है, जबकि प्रतिबद्धता एक ऐसी बौद्धिक अवधारणा, जिसका रुख कर्म की ओर है।

केदारनाथ सिंह
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राज-योग धर्म का विज्ञान है, समस्त पूजा-अर्चना, प्रार्थनाओं, अनुष्ठानों और चमत्कारों का आधार है।

स्वामी विवेकानन्द
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जहाँ आधुनिक युग के अभिभावक; अपने बच्चों को अजनबियों से बात करने की चेतावनी देते हैं, वहीं प्रागैतिहास में हमारा पोषण विश्वास की ख़ुराक से होता था।

रुत्ख़ेर ब्रेख़्मान
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यह ख़याल बिल्कुल ग़लत है कि आलोचना का संबंध बुद्धि से और श्रद्धा का हृदय से होता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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जो ईश्वर को अपने पास समझता है, वह कभी नहीं हारता।

महात्मा गांधी
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मैं गाय की भक्ति और पूजा में किसी से पीछे नहीं हूँ; लेकिन वह भक्ति और श्रद्धा, क़ानून के ज़रिए किसी पर लादी नहीं जा सकती।

महात्मा गांधी
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जो व्यक्ति तुमसे अंधे के समान विश्वास कर लेने को कहता है; उससे दूर ही रहो, वह चाहे कितना भी बड़ा आदमी या साधु क्यों हो।

स्वामी विवेकानन्द
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सगुण उपासना अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार अनेक प्रकार से की जा सकती है। उस छोटे से देहात की—जहाँ हमारा जन्म हुआ—सेवा करना अथवा माँ-बाप की सेवा करना सगुण-पूजा है।

विनोबा भावे
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श्रद्धा ही सत्य की जिज्ञासा की लौ है। हमारा सत्य से संबंध श्रद्धा के माध्यम से बनता है, पर श्रद्धा भी सत्य की अपेक्षा रखती है—सत्य के बिना अपने आप में अधूरी है, सत्य से विहीन-विलग भी हो सकती है।

मुकुंद लाठ
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असीम आस्था और शक्ति ही सफलता की एकमात्र शर्तें हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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मिथ्या प्रेम, झूठी विनम्रता और दुर्बल विश्वास से भरोसा पैदा नहीं होता। भरोसे के लिए ज़रूरी है कि एक पक्ष दूसरे पक्ष को, अपने सच्चे और ठोस इरादों का सबूत दे।

पॉलो फ़्रेरा
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जो कोई भी; किसी को अंधविश्वास करने के लिए कहता है, या अपनी श्रेष्ठ इच्छाशक्ति के बल पर लोगों को अपने पीछे घसीटता है—वह मानवता को हानि पहुँचाता है, भले ही उसका ऐसा इरादा हो।

स्वामी विवेकानन्द

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

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