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Vatsyayan

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रूप, गुण, आयु और त्याग—ये चार साधन मनुष्य को सौभाग्यशाली बनाते हैं।

अन्य शास्त्रों के ज्ञान से रहित; किंतु चतुष्षष्टि कला से अलंकृत कामकला का ज्ञाता पुरुष, नर-नारियों की कला-विषयक गोष्ठी में अग्रगण्य होकर सम्मानित होता है।

युवती नायिकाएँ चाहती हुई भी लज्जावश नायकों से नहीं मिल पातीं। अतः उन्हें संकेतों और चेष्टाओं के द्वारा अपने मनोभावों को प्रकट करें, और प्रेमी युवकों को चाहिए कि वह युवती नायिकाओं के संकेतों, इशारों, चेष्टाओं, मुखमुद्राओं से उनके मनोभावों को समझें।

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तीन रात तक संयम धारण करने के बाद; पति को एकांत स्थान केलिगृह में पत्नी के पास जाकर, मीठी-मीठी मनोरञ्जक बातें और स्पर्श आदि मृदु उपचारों से नवविवाहिता वधू में विश्वास पैदा करने और उसकी लज्जा दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। उस समय संयत भाव से कोमलता एवं मधुरता का व्यवहार करने की आवश्यकता होती है, ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं करनी चाहिए। ज़ोर-ज़बर्दस्ती करने से कटुता बढ़ती है और दाम्पत्य जीवन दुःखमय बन जाता है। इसलिए पत्नी की इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं करना चाहिए।

जब नायक को यह विश्वास हो जाए कि मनोभिलाषित कन्या मुझे चाहती है, तो वह उस कन्या की प्राप्ति के लिए उपाए करे।

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काम, आहार के समान शरीर की स्थिति का हेतु है। जिस प्रकार शरीर की स्थिति के लिए आहार का सेवन आवश्यक है, उसी प्रकार शरीर के लिए काम का सेवन भी आवश्यक है।

शतायु पुरुष अपने जीवन-काल को चार आश्रमों में विभाजित कर धर्म, अर्थ, काम—इस त्रिवर्ग का इस प्रकार सेवन करे कि जिससे ये तीनों परस्पर, एक-दूसरे से संबद्ध भी रहें और एक-दूसरे के बाधक भी हों।

नायक के साथ संभोग की कामना करने वाली नायिका के स्तनों के अग्रभाग अर्थात् कुचाग्रों की ओर, पाँचों नखों को मिलाकर जो रेखा खींची जाती है—उसे 'शशप्लुत' नामक नखक्षत कहते हैं।

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चुम्बन की बाज़ी में नायक के विश्वास के साथ असावधान हो जाने पर, मौक़ा पाकर नायिका नायक के अधर को पकड़कर, अपने दाँतों के अंदर दबोच कर अपनी जीत पर हँसे, ज़ोर से चिल्लाए, धमकाए, ताना मारे, व्यंग्य कसे और नाचने लगे तथा भौहों को नचाती, चंचल नेत्रों से हँसती हुई, मुख से बार-बार, तरह-तरह के व्यंग्य वचन बोले। इस प्रकार के प्रणय-कलह से कामेच्छा जागृत होती है और अनुराग में वृद्धि होती है।

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गोष्ठियों में लोकप्रचलित सरल भाषा में काव्य, कला-विषयक चर्चा करता हुआ नागरक, लोक में सर्वमान्य होता है।

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नायक-नायिका दोनों में जो पहले अधर को पकड़ ले, उसी की जीत होती है।

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अपने प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए, संभोगेच्छा प्रकट करने के लिए दर्पण में, दीवार में अथवा जल में प्रतिबिम्बित नायक या नायिका की छाया का चुम्बन करना 'छाया-चुम्बन' कहलाता है।

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नायक के प्रति संकेतों के द्वारा; अपने प्रेमभाव को प्रकट करती हुई संवाहिका नायिका का, चुम्बन की इच्छा रखने वाली अकामा नायिका के समान भाव प्रदर्शित करती हुई, नींद के बहाने नायक के जाँघों पर अपना मुख रखना और जाँघों का चुम्बन करना प्रेमवर्द्धक होता है।

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कामोपभोग का लक्ष्य सुखप्राप्ति है तथा धर्म और अर्थ का फल भी सुखप्राप्ति है।

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यदि कठोर शब्दों या अपशब्दों का प्रयोग करने के बावजूद भी; नायिका नायक से प्रेम संबंध जोड़ना चाहती है, तो उसे पुनः वश में करने का प्रयत्न करना चाहिए।

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नखक्षत से उच्छिष्ट स्तनों वाली युवति नायिका को दूर से ही देखकर, परपुरुष के मन में उसके प्रति सम्मान और प्रेम-भावना अर्थात् संभोग की कामना उत्पन्न हो जाती है।

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जो नायक नवविवाहिता कन्या को अत्यंत लज्जावती समझकर उसकी उपेक्षा करता है, स्त्रियों के अभिप्राय को समझने वाला वह पुरुष—पशुओं के समान तिरस्कृत होता है।

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काम-भावना को प्रकट करने के लिए जैसा पुरुष करे, वैसा ही स्त्री को भी करना चाहिए। जिस प्रकार नायक नायिका पर ताड़ना या आघात करे, उसी प्रकार नायिका भी पुरुष को ताड़ित करे। जिस प्रकार नायक जिस अंग से; नायिका के जिस अंग का चुम्बन करे, उसी प्रकार नायिका भी उसी अंग से पुरुष के उसी अंग का चुम्बन करे।

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युवती कन्या; वर-प्राप्ति के लिए उपाय करती हुई जिस नायक को आश्रय के योग्य, रतिसुख का हेतु, अपने अनुकूल एवं वशीभूत समझे—उस नायक का वरण कर ले।

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नागरक को चाहिए कि वह महीने में एक-दो बार किसी निश्चित तिथि को सुंदर वेश-भूषा से सज-धज कर, घोड़े पर चढ़कर, नौकर-चाकरों तथा वेश्याओं के साथ उद्यान-यात्रा के लिए प्रस्थान करे। वहाँ पहुँच कर नित्यकर्म का संपादन कर मुर्ग़ा, तित्तर, बटेर, बुलबुल आदि पालतू पक्षियों की युद्धकला देखे; जूआ, शतरंज आदि खेलों को खेलते हुए वेश्याओं के साथ मनोरंजन का सुख अनुभव करे, फिर शाम को घर लौट आए।

कलाओं का ज्ञान प्राप्त करने मात्र से ही सौभाग्य की प्राप्ति होती है। देश-काल की परिस्थितियों के अनुसार इन कलाओं का प्रयोग संभव होगा, अन्यथा परिस्थितिवश असंभव भी हो सकता है।

नागरक को चाहिए कि नगर, राजधानी तथा गाँव में उस स्थान पर मकान बनवाए, जहाँ पर जलाशय हों। मकान के चयन में नागरक को इसका ध्यान रखना चाहिए कि नदी, सरोवर आदि के किनारे वृक्ष, वाटिका, उद्यान से सुशोभित भवन होना चाहिए। नागरक के घर में दो खंड होने चाहिए—एक अंतःप्रकोष्ठ, दूसरा बहिःप्रकोष्ठ।

अपने गुप्त अंगों पर अंकित नखक्षतों को देखकर; नायिका का प्रेम संबंध बहुत दिनों से छूट जाने पर भी कोमल प्रीति नवीन-सी हो जाती है।

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नायिका को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए, नायक नायिका की विश्वासपात्र सहेलियों तथा धाय की लड़की से मेल-जोल बढ़ाए। क्योंकि वे नायिका के मनोभावों को अच्छी तरह समझकर, उससे नायक के गुणों की प्रशंसा कर, नायक की ओर उसे आकृष्ट कर सकती हैं।

गोष्ठी-समवाय का आयोजन; वेश्या के घर पर अथवा अन्य समान विद्या, बुद्धि, शील, धन वाले समवयस्क मित्रों के घर पर करना चाहिए। सभा में विद्या और कलाओं में निपुण वेश्याओं के साथ वार्तालाप करते हुए, साहित्य, काव्य-समस्या, कथा-आख्यायिक, नृत्य, गीत, कला एवं नाट्यकला आदि विषयों पर चर्चा करनी चाहिए। इस प्रकार समान अनुराग, परिहासपूर्वक मधुर वार्तालाप के साथ गोष्ठी में व्यवहार करते हुए गोष्ठी-समवाय का आनंद लेना चाहिए।

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नायक के धन से सारे शरीर पर अलंकार योग अर्थात् ख़ुद के लिए आभूषण आदि बनवाना, भवन को कलात्मक ढंग से सजाना, क़ीमती बरतनों को ख़रीदवाना, परिचारकों द्वारा घर को स्वच्छ रखना—ये रूपाजीवा नायिका के विशेष लाभ हैं।

जब नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे के पीछे की ओर बैठकर; एक-दूसरे की ठुड्डी पकड़कर थोड़ा पीछे की ओर घुमाकर चुम्बन करते हैं, तो उसे 'उद्भ्रांत' चुम्बन कहते हैं।

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नायक के अन्यमनस्क रहने पर, कलह की स्थिति में होने पर अथवा दूसरी ओर ध्यान लगाए हुए हो, अथवा सोने की स्थिति में होने पर, नायक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अथवा निद्रा-भंग करने के लिए नायिका द्वारा किया गया चुम्बन 'चलितक' चुम्बन कहलाता है।

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रात्रि में देर से घर लौटे हुए नायक के द्वारा, शय्या पर सोती हुई नायिका का चुम्बन—'प्रातिबोधिक' चुम्बन कहलाता है।

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कामकलाओं में कुशल, वाचाल और चापलूस व्यक्ति—अपरिचित होने पर भी स्त्रियों के चित्त को शीघ्र ही जीत लेता है या वश में कर लेता है।

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नायक और नायिका के राग (प्रेम) को बढ़ाने वाला, कोई और दूसरा सशक्त साधन नहीं है—जितना नखक्षत और दंतक्षत से उत्पन्न कामोत्तेजना।

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नगर, पत्तन, बड़े ग्रामों में जहाँ पर सज्जनों की बस्ती हो, सज्जन पुरुषों का सहवास हो, जहाँ पर जीविका के साधन सुलभ हों, जीवनोपयोगी सभी साधन सरलता से मिल जाएँ और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था हो—उस स्थान पर नागरक को अपना निवासस्थान बनाना चाहिए।

जो नायक अपने प्रति प्रीति उत्पन्न करना, स्त्रियों का आदर-सम्मान करना और नवोढ़ा कन्या में विश्वास उत्पन्न करना जानता है—वह स्त्रियों का अत्यंत प्रिय होता है।

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परस्पर प्रीति को उत्पन्न करने वाले अपने अनुकूल आलिंगनादि भावों के अनुसरण से, क्षणभर में नाराज़ होकर मुख फेर लेने से और क्षणभर में ही, परस्पर प्रेम भरी निगाहों से देखने से रति की इच्छा बढ़ती है।

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जैसे सुअर किसी वस्तु को चबा ले, वैसे ही नायक नायिका के स्तनों के एक भाग को चबा लें, फिर दूसरी जगह पर दांत गड़ाए, फिर तीसरी जगह। इस तरह एक साथ लगे हुए लंबे-लंबे, ताम्रवर्ण के दंतक्षत के निशान पंक्तिबद्ध रूप में बने हों, तो ऐसा दंतक्षत 'वराहचर्वितक' कहलाता है।

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जब नायक हृदय की प्यारी अत्यंत प्रिय प्रेमिका को मन में रखकर, किसी दूसरी नायिका के साथ आरंभ से लेकर रतावसान तक; संभोग का सभी व्यवहार करता है, उसी प्रकार नायिका भी अपने प्राणप्रिय, अभीष्ट प्रेमी को मन में ध्यान कर; दूसरे नायक के साथ यथोचित संभोग-व्यवहार करती हैं, तो उसे 'व्यवहित राग' कहते हैं।

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जब नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे के अधरों का कसकर चुम्बन करते हैं, तो 'अवपीड़ितक' चुम्बन कहलाता है।

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मिलने आने वाली प्रेमिका के वस्त्र; यदि वर्षा के कारण भीग गए हों और वह शृंगार-भ्रष्ट हो गई हो, तो नायक का कर्तव्य है कि वह ख़ुद ही प्रेमिका के वस्त्र बदल, उसका पुनः शृंगार करे।

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परदेश जाते समय नायक, नायिका के स्तनों और जंघाओं पर स्मृतिस्वरूप जो तीन-चार रेखाएँ खींच देता है, उसे 'स्मारणीयक' नखक्षत कहते हैं।

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चुम्बन की बाज़ी में यदि स्त्री हार जाए; तो वह सिसकती हुई हाथ को इधर-उधर कंपित करे, नायक को ठेलकर दूर कर दे, दाँतों से काटे और करवट बदल ले। यदि नायक ज़बरदस्ती अपनी ओर करना चाहे, तो उससे विवाद करे और कहे कि फिर से बाज़ी लगा लो और उसमें भी यदि हार जाए, तो दुगुना हाथ-पैर पटके और रोने लगे। इस प्रकार के चुम्बन-कलह से रागोद्दीपन होता है।

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मानव में रूप, गुण और यौवन के होते हुए भी यदि उदारता नहीं है, तो सभी विशेषताएँ निरर्थक हो जाती हैं।

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जो आत्मबल से युक्त है, मित्र संपत्ति से संपन्न है, जो नागरकवृत्ति से युक्त है, जो मनोभावों को समझने वाला है और देश-काल की परिस्थितियों का ज्ञाता है—वह नायक अनायास ही अलभ्या नायिका को प्राप्त कर लेता है।

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जब दीवार या खंभे को दोनों ओर से पकड़ कर; नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे को ज़ोर से दबाएँ, तो वह 'पीड़ितक' आलिंगन कहलाता है।

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प्रणय-कलह के समय नायक को युक्त्तिपूर्वक प्यार भरी मीठी-मीठी बातों से, अथवा नायिका के पैरों पर गिरकर और अनुनय-विनय के द्वारा, उसे अपने अनुकूल करके प्रसन्नचित होकर शय्या पर बिठाना चाहिए।

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जब नायक नायिका के दोनों होंठों को अपने होंठों में समेटकर चुम्बन करे, तब नायिका को भी प्रत्युत्तर में नायक के दोनों होंठों को अपने होंठों से पकड़कर चुम्बन करना चाहिए। अगर नायक के मुख पर मूँछें हों तो चुम्बन करना चाहिए, यदि नायक के मुख पर मूँछें हों, तो नायिका को चुम्बन नहीं करना चाहिए। इस प्रकार के चुम्बन को ‘सम्पुटक’ कहा जाता है।

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जो कोई भी राग को बढ़ाने वाली अशास्त्रीय कामोद्दीपक विधियाँ हैं; जिनका शास्त्रों में वर्णन नहीं है, साम्प्रयोगिकों को उनका भी यथावसर आदर के साथ प्रयोग करना चाहिए।

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गुणवान् व्यक्ति समाज में आदर का पात्र होता है। गुण विरूप व्यक्ति को भी सौभाग्यशाली बना देते हैं।

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नायक के शरीर के अंगो पर नखों से अंकित नखचिंहों को देखकर, स्थिर चित्त वाली सदाचारिणी नायिका का भी चित्त प्राय: चंचल हो जाता है।

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रतिक्रीड़ा के अवसान में भी माल्यादि धारण, तांबूल-भक्षण, मद्यपान, पानकरस सेवन, चंदनाद्यनुलेप, प्रेमभरी मीठी-मीठी बातें आदि उपचारों से बढ़ी हुई प्रीति, विश्वास युक्त्त चर्चाओं के योग से उत्कृष्ट रति उत्पन्न करती है।

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मृगी नायिका प्रचंडवेग पुरुष के साथ, योनि-पीड़ा के भय से सहवास नहीं करती।

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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