पराजय पर उद्धरण
जीवन-प्रसंगों में जय-पराजय
मनुष्य के प्रमुख मनोभावों में से एक है। यह किसी के हर्ष तो किसी के लिए विषाद का विषय है। यहाँ प्रस्तुत चयन में उन कविताओं का संकलन किया गया है, जिनमें ‘हार की जीत’ और ‘जीत की हार’ रेखांकित है।
मनुष्यत्व के पराभव को अंतहीन, प्रतिकारहीन और चरम समझना मेरी दृष्टि में अपराध है।
हार मन की एक अवस्था है, कोई भी तब तक पराजित नहीं होता, जब तक हार को सच में स्वीकार नहीं किया जाता है।
शास्त्रार्थ में कोई हारता नहीं, हराया जाता है।
अश्वत्थामा को पराजय ने भड़काया, अहंकार ने नहीं।
प्राणी जिस दिन से जन्म लेता है, उसी दिन उसके पीछे कर्म, मृत्यु, सुख-दुःख, जय-पराजय, लोभ, माया, आदि लग जाते हैं और उसे छेदते हैं।
बुद्धिमान क्रोध के वेग को जीत लेते हैं तथा क्षुद्र लोग क्रोध से तत्काल ही पराजित हो जाते हैं।
कभी हार नहीं मानना चाहिए। यह सबक़ कोई ख़ास गंभीर नहीं लगता; लेकिन जीवन आपको लगातार ऐसी परिस्थितियों में डालता है, जहाँ डटे रहने की तुलना में छोड़ देना ज़्यादा आसान लगता है। जहाँ आपके सामने बहुत सारी मुश्किलों का ढेर लग जाए, तो हार मान लेना तर्कसंगत बात लगती ही है।
जिसकी प्रजा सदा कर के भार से पीड़ित हो नित्य उद्विग्न रहती है और नाना प्रकार के अनर्थ उसे सताते रहते हैं, वह राजा पराभव को प्राप्त होता है।
जिसका आत्म-बल पर विश्वास है, उसकी हार नहीं होती, क्योंकि आत्म-बल की पराकाष्ठा का अर्थ है मरने की तैयारी।
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असफलताएँ आपको मज़बूत बना सकती हैं।
लोकतंत्र में हमें जीतना तो आना ही चाहिए, साथ ही गरिमा के साथ हार को स्वीकार करना भी आना चाहिए।
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विजय-तृष्णा का अंत पराभव में होता है।
परास्त होने पर भी जीवन तो संघर्ष करता ही रहेगा।
अधर्म से पराजित किया जाने वाला कोई भी पुरुष अपनी उस पराजय के लिए दुःखी नहीं होता।
मृत्यु मनुष्य की पराजय नहीं, पराजय है उसका मृत्यु से डरना।
आत्मा तर्क से परास्त हो सकती है, पर परिणाम का भय तर्क से दूर नहीं होता। वह पर्दा चाहता है।
मेरे निकट बिना मूल्य मिली जय से वह पराजय अधिक मूल्यवान ठहरेगी जो जीवन की पूर्ण शक्ति-परीक्षा ले सके।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere