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आलोचना पर उद्धरण

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मेरा स्वभाव या सिद्धांत या प्रवृत्ति कुछ ऐसी है (मेरे ख़याल से जो शायद सही भी है) कि जो व्यक्ति साहित्यिक दुनिया से जितना दूर रहेगा, उसमें अच्छा साहित्यिक बनने की संभावना उतनी ही ज़्यादा बढ़ जाएगी। साहित्य के लिए साहित्य से निर्वासन आवश्यक है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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कहना न होगा कि शिल्प की दृष्टि से शमशेर हिंदी के एक अद्वितीय कवि है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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आलोचक का धर्म साहित्यिक नेतागिरी करना नहीं है, वरन् जीवन का मर्मज्ञ बनना और उसी विशेषता की सहायता से कला-समीक्षा करना भी है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर; लोकसामान्य भावभूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत् की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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हमारे अधिकांश उपन्यास अति सामान्य प्रश्नों (ट्रीविएलिटीज) से जूझते रहते हैं और उनसे हमारा अनुभूति-संसार किसी भी तरह समृद्ध नहीं होता।

श्रीलाल शुक्ल
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जायसी प्रेम के कवि के रूप में विख्यात हैं। उनके अनुसार संसार में प्रेम से अधिक सुंदर और काम्य कुछ भी नहीं है।

मैनेजर पांडेय
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आचार्य शुक्ल जिसे मर्यादा कहते हैं, वह वास्तव में रूढ़ि है।

मैनेजर पांडेय
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अपने स्वयं के शिल्प का विकास केवल वही कवि कर सकता है, जिसके पास अपने निज का कोई ऐसा मौलिक-विशेष हो, जो यह चाहता हो कि उसकी अभिव्यक्ति उसी के मनस्तत्वों के आकार की, उन्हीं मनस्तत्वों के रंग की, उन्हीं के स्पर्श और गंध की ही हो।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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आलोचक के लिए सर्व-प्रथम आवश्यक है—अनुभवात्मक जीवन-ज्ञान, जो निरंतर आत्म-विस्तार से अर्जित होता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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दरअसल इस संक्राति-युग में भी; जो कवि मध्यवर्गीय मनःस्थिति को लेकर भावुकता से भरी हुई अनेक सफल कविताएँ लिख लेते हैं, उनके बारे में यह समझना चाहिए कि या तो वे वास्तविकता का अतिसरलीकरण करते हैं, अथवा वे उसकी उलझनों से घबड़ाकर ऊपरी सतह की रंगीनियों में रस लेते हैं।

नामवर सिंह
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शमशेर की आत्मा ने अपनी अभिव्यक्ति का एक प्रभावशाली भवन अपने हाथों तैयार किया है, उस भवन में जाने से डर लगता है—उसकी गंभीर प्रयत्नसाध्य पवित्रता के कारण।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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नामवर सिंह के अनुसार सगुण काव्य की मुख्य कमज़ोरी शास्त्र-सापेक्षता है, जो एक ओर निर्गुणधारा का विरोध करती है और दूसरी ओर रीतिकाव्य के उदय का कारण बनती है। नामवर सिंह के विवेचन से यह स्पष्ट नहीं होता कि सगुणधारा क्यों और कैसे शास्त्र-सापेक्ष है, इसलिए यह सवाल उठता है कि आख़िर सगुण काव्य में शास्त्र-सापेक्ष क्या है—सूर का वात्सल्य और श्रृंगार? मीरा का प्रेम और विद्रोह? या तुलसी का आत्मनिवेदन और आत्मसंघर्ष? क्या यह सब शास्त्र-सापेक्ष और लोक-विमुख है? इन सबका रीतिकाव्य से क्या लेना-देना?

मैनेजर पांडेय
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सूरदास के काव्य में कृष्ण से राधा और दूसरी गोपियों का प्रेम, सामंती नैतिकता के बंधनों से मुक्त प्रेम है।

मैनेजर पांडेय
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महाकवि विद्यापति मध्यकाल के पहले ऐसे कवि हैं, जिनकी पदावली में जन-भाषा में जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है।

मैनेजर पांडेय
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हमारे साहित्य में एक बहुचर्चित स्थापना यह है कि भारतीय उपन्यास मूलतः किसान चेतना की महागाथा है—वैसे ही जैसे उन्नसवीं सदी के योरोपीय उपन्यास को मध्यम वर्ग का महाकाव्य कहा गया था।

श्रीलाल शुक्ल
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भारत जैसे विराट मानवीय क्षेत्र के अनुभवों, गहरी भावनाओं, आशाओं, आकांक्षाओं और यातनाओं आदि को हमारा उपन्यास अभी अंशतः ही समेट पाया है—और जितना तथा जिस प्रकार उसे समेटा गया है उसमें प्रतिभा एवं कौशल के कुछ दुर्लभ उदाहरणों को छोड़कर, अब भी बहुत अधकचरापन है।

श्रीलाल शुक्ल
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जायसी की दृष्टि में प्रेम अत्यंत गूढ़ और अथाह है। ज़ाहिर है, ऐसे प्रेम की कविता लिखना भी आसान नहीं होगा।

मैनेजर पांडेय
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सबसे पहली कमी तो हमारे उपन्यासों में चिंतन और वैचारिकता की ही है।

श्रीलाल शुक्ल
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शमशेर की मूल मनोवृत्ति एक इंप्रेशनिस्टिक चित्रकार की है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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वह आलोचना, जो रचना-प्रकिया को देखे बिना की जाती है—आलोचक के अहंकार से निष्पन्न होती है। भले ही वह अहंकार आध्यात्मिक शब्दावली में प्रकट हो, चाहे कलावादी शब्दावली में, चाहे प्रगतिवादी शब्दावली में।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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अभिव्यक्ति का अभ्यास कलाकार का एक मुख्य कर्त्तव्य है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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जो लोग 'जनता का साहित्य' से यह मतलब लेते हैं कि वह साहित्य जनता के तुरंत समझ में आए, जनता उसका मर्म पा सके, यही उसकी पहली कसौटी है—वे लोग यह भूल जाते हैं कि जनता को पहले सुशिक्षित और सुसंस्कृत करना है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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दूसरे कवि अधिक-से-अधिक आँसुओं से प्रेम की कविता लिखते हैं, लेकिन जायसी ने आँखों से टपकने वाले लहू से प्रेम की कविता लिखी है।

मैनेजर पांडेय
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साहित्य में सच्ची नागरिकता रचनाओं की ही होती है; और रचनाएँ अंततः सार्थक या निरर्थक होती है, न कि नई और पुरानी।

मैनेजर पांडेय
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समकालीनता की मारी आज की हिंदी आलोचना ने, कबीर को आध्यात्म-प्रेमी विदेशियों तथा उनके देशी सहयोगियों को सौंप दिया है, और तुलसीदास को 'जय श्रीराम' का नारा लगाने वाले शाखामृगों की मर्ज़ी पर छोड़ दिया है।

मैनेजर पांडेय
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उपन्यास की पूरी संभावनाओं का अभी भी हमारे यहाँ दोहन होना है।

श्रीलाल शुक्ल
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‘झूठा सच’ उन दुर्लभ कृतियों में से है जो ठोस, यथार्थवादी स्तर पर, भावुकता के सैलाब में बहे बिना इस भयानक मानवीय त्रासदी को अत्यंत सशक्त रूप में प्रस्तुत करती है।

श्रीलाल शुक्ल
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पं. रामचंद्र शुक्ल जो निर्गुण मत को कोसते हैं, वह यों ही नहीं, इसके पीछे उनकी सारी पुराण-मतवादी चेतना बोलती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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स्वत्रंता-प्राप्ति के बाद पहला औपन्यासिक चमत्कार रेणु का ‘मैला आँचल’ है।

श्रीलाल शुक्ल
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आलोचना की समकालीनता का एक पक्ष यह भी है कि वह अतीत की महत्त्वपूर्ण रचनाओं की वर्तमान अर्थवत्ता की खोज करे।

मैनेजर पांडेय
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कवि का आभ्यंतर वास्तव-बाह्म का आभ्यंतरीकृत रूप ही है, इसीलिए कवि को अपने वास्तविक जीवन में रचना-बाह्म काव्यानुभव जीना पड़ता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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अल्प-समृद्ध, दरिद्र जो आलोचक है, वह अपने को चाहे जितना बड़ा समझे; साहित्य-क्षेत्र का अनुशासक समझे—वह वस्तुतः साहित्य-विश्लेषण के अयोग्य है, कला-प्रक्रिया के कार्य में अक्षम है—भले ही वह साहित्य का 'शिखर' बनने का स्वांग रचे, मसीहा बने।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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‘मैला आँचल’ के साथ ही हिंदी में उपन्यासों में एक नई कोटि का प्रचलन होता है, जिसे ‘आंचलिक’ कहते हैं।

श्रीलाल शुक्ल
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आज हम जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं, उसके निर्माण में भक्ति आंदोलन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

मैनेजर पांडेय
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'पद्मावत' में प्रेम की प्रधानता निर्विवाद है, परंतु उस प्रेम के स्वरूप के बारे में मतभेद है। विवाद का विषय यह है कि वह प्रेम मूलतः लौकिक है या अलौकिक।

मैनेजर पांडेय
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कबीर ऐसे कवि हैं, जिन्हें किसी तरह की सांप्रदायिकता और कट्टरता न तो अपना बना सकती है और न पचा सकती है।

मैनेजर पांडेय
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सूरसागर का गोपीकृष्ण-प्रेम, स्वछंद प्रेम है। इस प्रेम की दूसरी विशेषता है, उसका सहज क्रमिक विकास। गोपीकृष्ण-प्रेम के स्वाभाविक विकास क्रम को, सूर ने अत्यंत सतर्कता से चित्रित किया है।

मैनेजर पांडेय
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सच्चा कवि वही है; जिसे लोकहृदय की पहचान हो, जो अनेक विशेषताओं और विचित्रताओं के बीच से, मनुष्य जाति के सामान्य हृदय को अलग करके देख सके। इसी लोकहृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रसदशा है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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आलोचक को दार्शनिक होना पड़ता है। ऐसे दार्शनिक आलोचकों के न होने पर पाठक अनाथ हो जाता है, लेखक अनुशासनहीन हो जाते हैं।

श्याम मनोहर
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भाषा के बिना काव्य की कल्पना नहीं की जा सकती और न भाव-जगत् के अभिव्यक्ति के अतिरिक्त, भाषा का कोई दूसरा प्रयोजन जान पड़ता है।

श्यामसुंदर दास
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हिंदी में ऐसे आलोचकों का अभाव नहीं है; जो कहते हैं कि कविता की व्याख्या में समाज को लाना—कविता के साथ अत्याचार है। लेकिन जिस कविता में समाज होगा, उसकी व्याख्या सामाजिक चिंता के बिना कैसे होगी?

मैनेजर पांडेय
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जिसमें भाव का पता देनेवाला अथवा भाव जाग्रत करनेवाला, कोई शब्द या वाक्य अथवा प्रस्तुत प्रसंग के प्रति किसी प्रकार का भाव उत्पन्न कराने में समर्थ अप्रस्तुत वस्तु या व्यापार न हो, केवल दूर की सूझ या शब्दासाम्यमूलक विलक्षणता हो, वह उक्ति काव्याभास होगी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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सूर के काव्य में प्रेम, कबीर से अधिक स्वाभाविक और जायसी से अधिक लौकिक है।

मैनेजर पांडेय
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विलगाव की स्थिति में, आधुनिक जीवन की अधिकाधिक यांत्रिक और जनसंकुल परिस्थितियों में, मानव समुदायों के आस्तित्विक और सांस्कृक्तिक लयभंग के मानसोपचार की ज़रूरत के तकाज़े से ही; प्रकृति के साथ मानवीय चेतना के संबंधों की खोज, जीवन की औपन्यासिक पुनर्रचना में और भी गहरे और भी सूक्ष्मतम घरातलों पर अनिवार्य उठती है।

रमेशचंद्र शाह
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वैज्ञानिक वर्तमान युग बनाते हैं और कवि उनके भूत और भविष्य की आलोचना करते हैं—इसी मार्मिक और चुभने वाली आलोचना को कविता कहते हैं।

श्यामसुंदर दास
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कोई कृति अपने आप में एकांत सत्य नहीं होती है, वह अपने समय तक की परंपरा की अंतिम कड़ी भी होती है।

देवीशंकर अवस्थी
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कारीगर कबीर के जीवन की कला ही, उनकी कविता की कला बन गई।

मैनेजर पांडेय
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हिंदी आलोचना में सबसे पहले आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने निर्गुण संतों के विरुद्ध सगुण भक्तों को खड़ा किया। उन्होंने निर्गुण संतों को लोक-विरोधी और सगुण भक्तों को लोक-संग्रही घोषित किया।

मैनेजर पांडेय
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काव्यशास्त्र में जिसे श्रृंगार रस कहा जाता है, वही भक्तिशास्त्र में मधुर रस या उज्ज्वल रस माना जाता है।

मैनेजर पांडेय
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भक्तिकाव्य की एक विशेषता हिंदी भाषा के काव्यत्व का उत्कर्ष है।

मैनेजर पांडेय

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere