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दान पर उद्धरण

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बिना मूल्य के आनंदपूर्वक देना ही सर्वोत्तम दान होता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और निर्लोभता—ये धर्म के आठ प्रकार के मार्ग बताए गए हैं। इनमें से पहले चारों का तो कोई दंभ के लिए भी सेवन कर सकता है, परंतु अंतिम चार तो जो महात्मा नहीं है, उनमें रह ही नहीं सकते।

वेदव्यास
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हे भारत! धर्म, अर्थ, भय, कामना तथा करुणा से दिया गया दान पाँच प्रकार का जानना चाहिए।

वेदव्यास
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सब से नीच मनुष्य वह है, जिसका हाथ सदा अपनी ओर रहता है और जो अपने ही लिए सब पदार्थो को लेने में लगा रहता है। और सब से उत्तम पुरुष वह है, जिसका हाथ बाहर की ओर है तथा दूसरों को देने में लगा है।

स्वामी विवेकानन्द
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दान, भोग और नाश—यही तीन धन की गति है। जिसने दान नहीं दिया और अपने भोग में लाया, उसके धन की नाशरूप तीसरी गति होती है।

भर्तृहरि
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दानशीलता हृदय का गुण है, हाथों का नहीं।

थॉमस एडिसन
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धनंजय! किया हुआ पाप कहने से, शुभ कर्म करने से, पछताने से, दान करने से और तपस्या से भी नष्ट होता है।

वेदव्यास
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मन, वचन और कर्म से सब प्राणियों के प्रति अद्रोह, अनुग्रह और दान—यह सज्जनों का सनातन धर्म है।

वेदव्यास
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सच्चा दानी प्रसिद्धि का अभिलाषी नहीं होता।

प्रेमचंद
  • संबंधित विषय : सच
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प्रत्येक भारतवासी का यह भी कर्त्तव्य है कि वह ऐसा समझे कि अपने और अपने परिवार के खाने-पहनने भर के लिए कमा लिया तो सब कुछ कर लिया। उसे अपने समाज के कल्याण के लिए दिल खोलकर दान देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

महात्मा गांधी
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दान देना अपना कर्त्तव्य है, ऐसे भाव से जो दान देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर प्रत्युपकार करने वाले के लिए दिया जाता है, वह सात्त्विक दान है।

वेदव्यास
  • संबंधित विषय : देश
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जब दान ग्रहण करने की इच्छा पैदा हो, तो उसके विपरीत भाव का चिंतन करना चाहिए।

स्वामी विवेकानन्द
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सच्चा दान दो प्रकार का होता है—एक वह जो श्रद्धावश दिया जाता है, दूसरा वह जो दयावश दिया जाता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
  • संबंधित विषय : सच
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प्रत्युपकार की आशा से, फलभोग की इच्छा से तथा बड़े कष्ट से जो दान दिया जाता है उसे राजस दान कहते हैं।

वेदव्यास
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दुःखकातर व्यक्तियों को दान देना ही सच्चा पुण्य है।

संत तुकाराम
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स्नान करने, दान देने, शास्त्र पढ़ने, वेदाध्ययन करने को तप नहीं कहते। तप योग ही है और यज्ञ करना। तप का अर्थ है वासना को छोड़ना, जिसमें काम-क्रोध का संसर्ग छूटता है।

संत एकनाथ
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एक (बुद्धि) से दो (कर्तव्य और अकर्तव्य) का निश्चय करके, चार (साम, दान, दंड, भेद) से तीन (शत्रु, मित्र तथा उदासीन) को वश में कीजिए। पाँच (इंद्रियों) को जीतकर छड़ (संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधी भाव और समाश्रय रूप गुणों) को जानकर, सात (स्त्री, जुआ, मृगया, मद्य, कठोर वचन, दंड की कठोरता और अन्याय से धनो-पार्जन) को छोड़कर सुखी हो जाइए।

वेदव्यास
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धनी बनो; क्षति नहीं, किंतु दीन एवं दाता बनो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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प्रत्येक पदार्थ का प्रथम भाग दीनों को देना चाहिए। अवशिष्ट भाग पर ही हमारा अधिकार है।

स्वामी विवेकानन्द
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यदि तुम्हारे पास धन हैं, तो निर्धनों को बाँट दो। यदि धन पर्याप्त नही है तो मन की भेंट दो। यदि मन ठोक नहीं है तो तन अर्पित करो। यदि तन भी स्वस्थ नहीं है तो मीठे वचन ही बोलो। परंतु तुम्हें कुछ कुछ देना ही है और परोपकार के लिए अवश्य ही स्वयं को न्यौछावर करना है।

किशनचंद 'बेवस'
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जिस तरह दानशीलता मनुष्य के दुर्गुणों को छिपा लेती है, उसी तरह कृपणता उसके सद्गुणों पर पर्दा डाल देती है।

प्रेमचंद
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स्वयं अपनी प्रशंसा करने में कृपण बनो, किंतु दूसरे के समय दाता बनो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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दान, दक्षता, शास्त्र ज्ञान, शौर्य, लज्जा, कीर्ति, उत्तम बुद्धि, विनय, श्री, धृति, तुष्टि और पुष्टि—ये सभी सद्गुण भगवान श्री कृष्ण में नित्य विद्यमान हैं।

वेदव्यास
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बिना किसी के गुण-दोष की ओर ध्यान दिए परोपकार करना सज्जनों का एक व्यसन ही होता है।

बाणभट्ट
  • संबंधित विषय : आदत
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सबसे बड़ा दान श्रद्धा-दान होता है, और इस दान से बुद्धदेव ने किसी मनुष्य को वंचित नहीं रखा।

रवींद्रनाथ टैगोर
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घर गृहस्थी का मूल उद्देश्य ही आतिथ्य परोपकार है।

तिरुवल्लुवर
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याचक को लौटाओ नहीं। अर्थ नहीं तो सहानुभूति, साहस, सांत्वना, मधुर बात—जो भी हो एक दो—हृदय कोमल होगा।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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दान करो; किंतु दीन होकर, बिना प्रत्याशा के। तुम्हारे अंतर में दया के द्वार खुल जाए।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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सर्वोपरि श्रेष्ठ दान जो आप किसी मनुष्य को दे सकते हैं, विद्या ज्ञान का दान है।

रामतीर्थ
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परोपकार पुण्य तथा पर पीड़ा पाप है।

लूसिया कैरम
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कम लेना और ज़्यादा देना—यही है धर्म। आदि धर्म। इसे हम धर्म कहें, अध्यात्म कहें या मानव धर्म कहें।

अमृतलाल वेगड़
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दया के हिसाब से किया गया दान अहंकार का ही परिपोषक होता है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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हम भी दान देते हैं, कर्म करते हैं। लेकिन जानते हो क्यों? केवल अपने बराबर वालों को नीचा दिखाने के लिए। हमारा दान और धर्म कोरा अहंकार है, विशुद्ध अहंकार।

प्रेमचंद
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सचमुच में जो दान दाता को ही भुला दें, वही तो सबसे बड़ा दान है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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दान करके प्रकाश जितना करो, उतना ही अच्छा। अहंकार से बचोगे।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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केवल त्याग से, मूढ़ता से और याचना से किसी को भिक्षु नहीं समझना चाहिए। जो सरल भाव से स्वार्थ का त्याग करता है और सुख में आसक्त नहीं होता, उसे ही भिक्षु समझना चाहिए।

वेदव्यास
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महापुरुष कृपण की तरह नाप-तौलकर अनुग्रह दान नहीं करते, और यह नहीं कहते कि मनुष्य की बुद्धि और शक्ति के लिए उतना ही दान यथेष्ट है। प्रिय मित्र की तरह वे अपने जीवन की सर्वोच्च साधना का धन श्रद्धापूर्वक मनुष्य को अर्पण करते हैं, और उसे इसके योग्य समझते हैं। उसकी योग्यता कितनी बड़ी है यह बात मनुष्य स्वयं नहीं समझता, लेकिन महापुरुष अच्छी तरह जानते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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अभय, अन्तःकरण की शुद्धता, ज्ञान मार्ग और योग मार्ग में विशेष स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, चुग़ली करना, भूतों पर दया, अलोलुपता, मृदुता, लज्जा, चंचलता का होना, तेजस्विता, क्षमा, धृति, पवित्रता, द्रोह का अभाव, निरभिमानता, ये लज्ञण, दैवी संपत्ति लेकर उत्पन्न हुए मनुष्य में होते हैं।

वेदव्यास
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धर्मात्मा पुरुष को चाहिए कि वह यश के लोभ से, भय के कारण अथवा अपना उपकार करने वाले को दान दे।

वेदव्यास
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जिस दान को ठेलकर दाता स्वयं आगे जाता है, वह दान तो तुच्छ दान है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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दान को दान की मात्रा से नहीं, देने वाले की शक्ति से मानना चाहिए।

विद्यानिवास मिश्र
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धर्म का फल शीघ्र दिखाई दे तो इस कारण धर्म और देवताओं पर शंका नहीं करनी चाहिए। दोषदृष्टि रखते हुए प्रयत्नपूर्वक यज्ञ और दान करते रहना चाहिए।

वेदव्यास
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जो दान बिना सत्कार किए अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में कुपात्रों के लिए दिया जाता है, वह तामस दान कहा जाता है।

वेदव्यास
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तुम प्राय: कहते हो, 'मैं दान दूँगा, किंतु सुपात्र को ही।' तुम्हारी वाटिका के वृक्ष ऐसा नहीं कहते, तुम्हारे चरागाह की भेड़ें।

वे देते हैं, ताकि जी सकें, क्योंकि रखे रहना ही मृत्यु है।

ख़लील जिब्रान
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यद्यपि दानशीलता और अभिमान के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी दोनों ग़रीबों का पोषण करते हैं।

थॉमस फ़ुलर
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जो कुछ तुम्हारे पास है, सब एक दिन दिया ही जाएगा।

इसीलिए अभी दे डालो, ताकि दान देने का मुहूर्त्त तुम्हारे वारिसों को नहीं, तुम्हें ही प्राप्त हो जाए।

ख़लील जिब्रान
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जिसे दान दोगे, उसका दुःख अनुभव कर सहानुभूति प्रकाश करो, साहस दो, सांत्वना दो। बाद में साध्यानुसार यत्न के साथ दो, प्रेम के अधिकारी बनोगे—दान सिद्ध होगा।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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