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ऋत्विक घटक

1925 - 1976 | ढाका

समादृत फ़िल्म-निर्देशक और पटकथा लेखक।

समादृत फ़िल्म-निर्देशक और पटकथा लेखक।

ऋत्विक घटक के उद्धरण

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सिनेमा मेरे लिए कोई 'art form' नहीं है, ये मेरे लोगों की सेवा करने का एक ज़रिया मात्र है। मैं कोई समाजशास्त्री नहीं हूँ और इसलिए ऐसे भ्रम नहीं पालता कि मेरा सिनेमा लोगों को बदल सकता है। कोई एक फ़िल्ममेकर लोगों को नहीं बदल सकता है। लोग बहुत विशाल हैं और वे अपने आप को ख़ुद बदल रहे हैं। में चीज़ें नहीं बदल रहा हूँ, जो भी बड़े बदलाव हो रहे हैं, मैं सिर्फ़ उन्हें दस्तावेज़ कर रहा हूँ।

चेख़व की तरह मुझे भी मनुष्य के भविष्य पर आस्था है। मेरी कला मनुष्य को निराश नहीं कर सकती। रवींद्रनाथ ठाकुर का यह संदेश में कभी नहीं भूल सकूंगा कि 'मानुषेर विश्वास हरण पाप।'

एक कवि सब कलाकारों का आदिस्वरूप होता है। कविता सब कलाओं की कला है।

मैं रवींद्रनाथ के बिना बोल नहीं सकता। उस आदमी ने मेरे जन्म के पहले ही मेरी सारी भावनाओं को निचोड़ लिया था। उसने समझ लिया था कि मैं क्या हूँ और उसने उसे शब्दबद्ध कर दिया था। मैंने पढ़ा और जाना कि सब कुछ कहा जा चुका है, और नया कहने के लिए मेरे पास कुछ भी बचा नहीं है।

रचनात्मक दृष्टि से डाक्युमेंटरी एक प्रवृत्ति का नाम है। सत्य यथार्थ में निहित होता है, और कैमरा भौतिक यथार्थ के सभी पक्षों को पकड़ने में विशेष सक्षम होता है। यह कलाकार का कर्तव्य है कि वह यथार्थ को अंकित कर, कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करे।

मानव मात्र की ज्ञान राशि का एक (अदृश्य) वृत्त बनता है, जो धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। आइंस्टीन जैसी कुछ ऐसी प्रतिभाएँ होती हैं, जो इस वृत के आकार में गुणात्मक परिवर्तन ला सकती हैं। सही माने में उस फ़िल्म को ही प्रयोगात्मक कह सकता हूँ, जो ज्ञानराशि के वृत में ऐसा ही परिवर्तन ला सके।

मेरे लिए सिनेमा और कुछ नहीं, सिर्फ़ एक अभिव्यक्ति है। ये मेरे लिए अपने लोगों के कष्टों और दु:खों को लेकर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करने का माध्यम है। कल को सिनेमा के अलावा भी इंसान की बुद्धि शायद कुछ ऐसा बना ले; जो सिनेमा से भी ज़्यादा मज़बूती, बल और तात्कालिकता से लोगों की ख़ुशियों, दु:खों, आकाँक्षाओं, सपनों, आदर्शों को अभिव्यक्त कर सके—तब वो ही आदर्श माध्यम बन जाएगा।

मैक्स रेनहार्ड ने कहा है कि 'कलाकार को अपने बचपन का एक अंश अपनी जेब में रख लेना चाहिए।' चैप्लिन इसे प्रचुर मात्रा में संभाल कर रख सके। आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत के पीछे भी यही तत्त्व सक्रिय था।

अपने नाम के मूल्य मुताबिक़, हर आर्ट को इंसान की बेहतरी के लिए काम करना ही चाहिए। मैं किसी कठोर थ्योरी में यक़ीन नहीं करता हूँ, लेकिन ठीक उसी समय मैं इन तथाकथित 'महान' फ़िल्ममेकर्स को लेकर हैरान हूँ, जो मूल रूप से कुछ नहीं बस नौसिखिए हैं और मानवीय रिश्तों के आर्ट का शोर मचाते रहते हैं। अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी से बचने का ये बहुत चतुर तरीक़ा है। असल में जो भी काम ये करते हैं, वो सिर्फ़ उनकी अपनी सत्ता को फ़ायदा पहुँचाने के लिए होता है। ये लोग इतने पक्षपाती हैं, जितना कि कोई हो सकता है, लेकिन अपक्षपाती होने का मास्क पहनते हैं। मैं ऐसे आदर्शों से घृणा करता हूँ।

हमलोग चीज़ों के 'क्या' पर ध्यान नहीं देते, बल्कि उसके 'क्यों' और 'कैसे' पर सोचते हैं। यही महाकाव्यात्मक रवैया है।

बिमल रॉय के बारे में बात करने के लिए मुझे यह कहकर शुरू करना चाहिए कि मैं उनकी पूजा करता हूँ।

अनुवाद : बेबी शॉ

मैंने यह महसूस किया है कि मानवता दूध के रूप में माँ का लहू चूसकर आगे बढ़ती है। माँ के संबंध में पौराणिक अवधारणा की ओर, मेरी चेतना इसलिए बार-बार आकृष्ट होती है कि माँ की छवि का अहसास मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मैं अर्थछठाओं के पीछे भागता हूँ—उन दुर्गाह्य क्षणभंगुर अर्थछठाओं के पीछे। उन्हीं में तो जीवन की चिंगारियाँ छिपी होती है, नाच-गाने भी गले की फाँस नहीं होते, वे रचनात्मक तत्व होते हैं और अगर कथ्य संदर्भ की मांग हो, तो उनमें अनगिनत संभानाएँ होती हैं। अगर भारत में कोई सच्चा गंभीर कलाकार; इस पर अपने तमाम बुद्धि वैभव को दाँव पर लगा देगा, आख़िर मिजोगुची और कुरोसावा या किनुगासा जैसे लोगों ने नोह और काबुकी को अपने हाथों निचोड़कर ही तो उससे अपने नितांत वैयक्तिक वक्तव्य अर्जित किए थे।

हर आर्टिस्ट को एक दर्दभरी निजी प्रक्रिया से गुज़रने के बाद, अपना ख़ुद का सच समझना होता है। और यही है, जो उसे अभिव्यक्त करना है।

मैं नारे लगाने या जैसे कि वे कहते हैं 'एंटरटेनमेंट' में यक़ीन नहीं रखता हूँ। बल्कि इस ब्रह्माँड, इस दुनिया, अंतरराष्ट्रीय स्थितियों, मेरे देश और अंत में मेरे अपने लोगों के बारे में गहराई से सोचने में यक़ीन रखता हूँ।

अच्छे सिनेमा को ज़िंदगी से अलग नहीं किया जा सकता। इसे लोगों की आकाँक्षाओं और घबराहटों का प्रतिनिधित्व करना ही होता है। इसे समय से साथ क़दम बढ़ाने होते हैं, इसकी जड़ें लोगों में होनी होती हैं। मेरे हिसाब से बंबई के सिनेमा की कोई जड़ें नहीं हैं।

रवींद्रनाथ हमारे ख़ून में हैं, हम उनके बिना कहीं नहीं जा सकते। कला के किसी भी आयाम पर चर्चा कीजिए, वह वहीं है।

अनुवाद : बेबी शॉ

ढेर सारी पत्रिकाएँ मेरा नाम कुछ विख्यात निर्देशकों के साथ रखकर देखती हैं। मैंने इन निर्देशकों की जितनी भी फ़िल्में देखी हैं, उसे देखकर मुझे लगता है कि यह सिर्फ़ ग़लत है, बल्कि उन पर और मुझ पर—दोनों पर ज़्यादती है। वे एक स्पष्ट दृष्टिकोण से फ़िल्म बनाते हैं। जैसा कि मैं भी करता हूँ, लेकिन एक बिल्कुल दूसरे दृष्टिकोण से। यहाँ सवाल मूल्य-निर्णय का नहीं है, बल्कि भिन्नता का है।

आनंद से अलग होकर कला नहीं हो सकती। लेकिन साथ ही, मनुष्यों के लिए भलाई करना नहीं भूल सकते।

अनुवाद : बेबी शॉ

फ़िल्मकार की तपस्या ही यह होनी चाहिए कि वह किस प्रकार अलग-अलग तत्त्वों का मेल करवाए कि देखने वालों तक उनका संयुक्त प्रभाव पहुँच सके।

इस पर हमेशा बहस की जाती है कि एक आर्टिस्ट को क्या सिर्फ प्रॉब्लम सामने रखनी चाहिए या उसके समाधान की ओर भी इशारा करना चाहिए। मुझे लगता है कि ये चीज़ों की तरफ़ बहुत बचकाने ढंग से देखने का तरीक़ा है। अगर आर्टिस्ट को समाधान सामने रखने की ज़रूरत महसूस होती है, तो उसका स्वागत है। लेकिन अक्सर वह समस्या बताता है और मामले को वहीं छोड़ देता है। ये दोनों ही ट्रीटमेंट समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। हम किसी एक पर आशावादी और दूसरे पर निराशावादी का लेबल नहीं लगा सकते हैं। केंद्रीय बिंदु यह है कि जो भी फ़िल्म की विषय-वस्तु और रचनाकार के दिमाग़ में से सहज रूप से विकसित होता है, वो पूरी तरह स्वीकार्य है। लेकिन जो भी उभरे, वो स्वतः होना चाहिए। सवाल यह है कि क्या वो आर्टिस्ट जीवन और इंसानों को लेकर पक्षपाती है या नहीं? अगर वो है, तो फिर ये प्रॉब्लम कभी नहीं होती।

शिल्प को परे खिसका कर कथ्य कुछ भी नहीं रह जाता, लेकिन यदि शिल्प को अधिक महत्व दिया जाए—यह सोचते हुए कि इस शिल्प को तोड़कर ऐसा करेंगे—तो यह चीज़ों को देखने का एक बहुत ही ग़लत तरीक़ा है।

इस देश में फ़िल्म सस्ते मनोरंजन का सबसे घटिया साधन बन गई है। इसलिए मैं इस देश में फ़िल्मों के भविष्य को लेकर काफ़ी चिंतित हूँ।

अनुवाद : बेबी शॉ

चैप्लिन की प्रतिभा का उत्कर्ष हम उसकी मूक फ़िल्मों में ही देख सकते हैं, ख़ास तौर से उसकी लघु फ़िल्मों में। मुझे लगता है कि चैप्लिन को मौन, मूक अभिनय और मूक फ़िल्मों की रचनाप्रक्रिया से गहरा लगाव था। ध्वनि उसके तर्क को ही बदल देती, उसकी प्रभावोत्पादकता में ख़लल डालती।

अगर आप सृजन करना चाहते हैं, तो आपको पागलों की तरह प्रेम करना पड़ता है।

अनुवाद : बेबी शॉ

दो तरह का सिनेमा बनता है। या तो आप सिने इतिहास की राहों पर चल दें या अपनी पगडंडियाँ ख़ुद बनाएँ, नए रास्ते ढूँढें, बनाएँ।

इस देश में आलोचकों का सम्मान कोई नहीं करता। कुछ अच्छे लोग जो ईमानदार, गंभीर काम करना चाहते हैं, उन्हें बहुत जल्दी हटा दिया जाता है।

अनुवाद : बेबी शॉ

फ़िल्मों में अभिनय; असल में डायरेक्टर और एक्टर्स के बीच गहरे तालमेल के बाद जन्मता है, और ख़ेद है कि वो भारत में ग़ायब है।

अगर एक कलाकार निडर है और कायर नहीं, तो यह या वह कुछ भी कर सकता है।

अनुवाद : बेबी शॉ

यदि आपको प्रेम करना है, तो आपको अपनी पूरी ताक़त से करना चाहिए। पूरे दिल से प्रेम करें।

अनुवाद : बेबी शॉ

बांग्लादेश एक नदीनिष्ठ देश है और उन नदियों पर केवल दो अच्छे बंगाली उपन्यास हैं— माणिक बंध्योपाध्याय का 'प‌द्मा नदीर नाम' और अद्वैत मल्लबर्मन का 'तितास एकटि नदीर नाम।'

अनुवाद : बेबी शॉ

ये मेरे दर्शकों को तय करना है कि क्या मैं एक पोलिटिकल फ़िल्ममेकर हूँ या नहीं? कि क्या मैं भारत का पहला और एकमात्र पोलिटिकल फ़िल्ममेकर हूँ? विस्तृत संदर्भ में कहूँ, तो मेरी सारी फ़िल्में पोलिटिकल हैं, जैसे कि हर आर्ट होता है, हर आर्टिस्ट होता है। ये या तो इस या उस वर्ग के बारे में होता है। एक फ़िल्ममेकर चाहे, तो इसे पोलिटिकल नाम दे दे और दूसरा उसे ऐसा नाम दे, लेकिन अंत में दोनों फ़िल्में इसी मक्सद को पूरा करती हैं।

हमें विश्व के महान फ़िल्मकारों से सीखते रहना चाहिए, लेकिन उनका अनुकरण नहीं करना चाहिए।

चूँकि सत्य कभी स्थाई और स्थिर नहीं होता और यह दुनिया हमेशा व्यक्तिपरक और परिवर्तनशील है, इसलिए हर व्यक्ति को अपनी पूरी ज़िंदगी के गहन विचारों, और समझ के साथ अपने व्यक्तिगत सत्य तक पहुँचना चाहिए।

अनुवाद : बेबी शॉ

आम तौर पर बांग्लादेश के लोग अत्यंत भावुक हैं और एक बार किसी को अपनाना शुरू कर दें, तो कुछ भी कर डालते हैं। और अगर वे आपको नापसंद करें, तो पूरी तरह ठुकरा देंगे।

अनुवाद : बेबी शॉ

कभी भी एक कलाकार से उसके काम के बारे में सवाल करें। क्योंकि he is always biased...इससे कोई फ़ायदा नहीं। पसंद हो या नापसंद, प्रतिक्रियाएँ आपकी अपनी हैं। कुछ लोग ग़ुस्सा हो जाएँगे, कुछ प्रसन्न। इससे मुझे क्या लेना-देना?

अनुवाद : बेबी शॉ

साहित्य एक कला रूप है और फ़िल्म दूसरा। इसलिए जब आप साहित्य से स्क्रिप्ट बना रहे होते हैं, तो आप उसे बेवकूफ़ी से बस फॉलो नहीं कर सकते। वह सही नहीं है। फ़िल्म मुख्य रूप से दृश्यात्मक है—एक दृश्य कला। इसे ध्यान में रखना चाहिए।

अनुवाद : बेबी शॉ

कोई भी कला, अन्य कलाओं का सुथरा हुआ रूप होने का दावा नहीं कर सकती। इस विश्व में हर कला का अपना अलग स्थान है। उनकी अभिव्यक्ति के तौर-तरीक़े और सीमाएँ भिन्न हैं। फ़िल्म जो कह सकती है, वह अन्य कला-विधाओं की परिधि से बाहर है। इसी प्रकार अन्य कलाओं में जो सामर्थ्य है, वह फ़िल्म में नहीं हो सकता। अतः इन में तुलना या प्रतियोगिता का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए।

मैं कला सृजित करते हुए आपको प्रेम क्यों करूँ? मुझे इसमें कोई अंतर्निहित विरोधाभास नज़र नहीं आता।

अनुवाद : बेबी शॉ

सत्य को पूरी तरह महसूस करने के बाद ही स्वीकार करना चाहिए।

अनुवाद : बेबी शॉ

हर कला का कार्य अलग होता है। रूप उसके विषय, दर्शन और चिंतन से निकलता है।

अनुवाद : बेबी शॉ

यदि शिल्प मुँहज़ोर है, तो वह कला की शुद्धता को नष्ट कर देगा। आधारभूत तत्व कथ्य है। कथ्य के भीतर पैठ जाएँ, तो शिल्प स्वतः उभरेगा, बिंब स्वतः उभरेंगे, ध्वनि स्वतः उभरेगी। यह सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है कि अब नया कुछ करें—ये काले आदमियों पर भूरा रंग पोत रहे हैं, तो हम नीला पोत दें। मुझे भूरे रंग की ज़रूरत महसूस होगी, तो मैं उसे ही इस्तेमाल करूँगा। नीले की ज़रूरत होगी, तो उसे इस्तेमाल करूँगा।

आर्ट में सब कुछ जायज़ है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जो लोग ज़ोरदार ढंग से न्यूडिटी और किसिंग का समर्थन करते हैं; क्या वो कला के बारे में सोचते हुए ऐसा करते हैं, या फिर वे जल्दी रोकड़ा कमाने के लिए ऐसा करना चाहते हैं?

फ़िल्मों की आलोचना करने के लिए, पहले माध्यम को समझना चाहिए।

अनुवाद : बेबी शॉ

मानवता के प्रति प्रेम ही एकमात्र महत्वपूर्ण चीज़ है।

अनुवाद : बेबी शॉ

संगीत के महत्त्व को अधिसंख्य प्रेक्षक नहीं समझते। यह एक दुःखद स्थिति है।

यह सिर्फ़ मेरी बात नहीं है, दुनिया में कोई भी गंभीर कलाकार; जो बंगाल में या कहीं और गंभीर काम किया हो, जिसका नाम आपने सुना हो—उनमें से हर एक व्यक्ति एक व्यक्ति से प्रेरित है और उसका नाम सर्गेई आइज़ेंस्टाइन है।

अनुवाद : बेबी शॉ

फ़िल्म देखने जाना भी एक तरह का संस्कार है। जब बत्तियाँ बुझ जाती हैं; परदे ज़िंदा हो जाते हैं, तो सब दर्शक एक हो जाते हैं। ये एक समुदाय वाली भावना हो जाती है। हम इसकी तुलना चर्च, मस्जिद या मंदिर जाने से कर सकते हैं।

प्रभावों को हज़म करना बहुत ज़रूरी है और समन्वित सार को आत्मसात् करना आवश्यक है।

यदि आप मानवता के लिए भलाई करें, तो कोई भी कला सच्ची कला का कार्य नहीं है।

अनुवाद : बेबी शॉ

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