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निष्काम पर उद्धरण

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नियम साधना का लोभ भी कष्ट की मात्रा का हिसाब लगाकर आनंद पाता है। अगर कड़े बिछौने पर सोने से शुरू किया जाए; तो आगे चलकर मिट्टी पर बिछौना बिछाकर, फिर सिर्फ़ एक कंबल बिछाकर, फिर कंबल को भी छोड़कर निखहरी ज़मीन पर सोने का लोभ क्रमशः बढ़ता ही रहता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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अपने सुख में सुखी होने की और अपने दु:ख में दु:खी होने की तन्मयता कवि को हो, तो वह कवि नहीं बन सकता।

विनोबा भावे
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वीरता से आगे बढ़ो। एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य-जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे।

स्वामी विवेकानन्द
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चाहे साइंस हो, चाहे आर्ट हो—निरासक्त मन ही सर्वश्रेष्ठ वाहन है। यूरोप ने साइंस में वह पाया है, किंतु साहित्य में नहीं पाया।

रवींद्रनाथ टैगोर
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अपव्यय और कष्ट जितना ही अधिक प्रयोजनहीन होता है; संचय और परिणामहीन, जय-लाभ का गौरव उतना ही अधिक जान पड़ता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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सज्जनता तथा करूणा-संपन्न होने का अर्थ है—दूसरों के प्रति सहानूभूति रखना, मनुष्य मात्र के प्रति प्रेम रखना, और अपने स्वार्थ का त्याग करना।

कन्फ्यूशियस
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आठ बातों से मनुष्य शिक्षित कहलाता है: हर समय हँसने वाला हो, सतत इंद्रिय-निग्रही हो, मर्मान्तक वचन कहता हो, सुशील हो, दुराचारी हो, रसलोलुप हो, सत्य में रत हो, क्रोधी हो, शांत हो—वह शिक्षित है।

महावीर
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यही रहस्य है। योगप्रवर्तक पतंजलि कहते हैं, ''जब मनुष्य समस्त अलौकिक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता है, तभी उसे धर्ममेघ नामक समाधि प्राप्त होती है।''

स्वामी विवेकानन्द
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स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि चाहो सो करो, बल्कि इसका अर्थ है मुक्त हो जाना—जीवन के समस्त संघर्षों से, हमारी समस्याओं से, हमारी चिंताओं से, हमारे भय से, हमारे मनोवैज्ञानिक घावों से तथा उन समस्त द्वंद्वों से, जिन्हें हम हज़ारों वर्षों से सहन करते आए हैं।

जे. कृष्णमूर्ति
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भक्त का अर्थ क्या अहमक (बेवकूफ़) है? बल्कि विनीत, अहंयुक्त ज्ञानी है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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सब से नीच मनुष्य वह है, जिसका हाथ सदा अपनी ओर रहता है और जो अपने ही लिए सब पदार्थो को लेने में लगा रहता है। और सब से उत्तम पुरुष वह है, जिसका हाथ बाहर की ओर है तथा दूसरों को देने में लगा है।

स्वामी विवेकानन्द
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अपने पर गर्व जितना किया जाए, उतना ही मंगल और आदर्श पर गर्व जितना किया जाए, उतना ही मंगल।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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जिनकी भावना किसी बात के मार्मिक पक्ष का चित्रानुभव करने में तत्पर रहती है, जिनके भाव चराचर के बीच किसी को भी आलम्बनोपयुक्त रूप या दशा में पाते ही उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं, वे सदा अपने लाभ के ध्यान से या स्वार्थबुद्धि द्वारा ही परिचालित नहीं होते।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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अपने पार्टनर के साथ जुड़ने के बाद, पुरुष कुछ हद तक ख़ुद को खो देता है।

जॉन ग्रे
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जो परोपकार में संलग्र होने के कारण अपने स्वार्थ का परित्याग करता है, और गुणी व्यक्ति के साथ सदैव अभिन्नता का आचरण करता है, जिसके हृदय से, स्वभाव से ही सुंदर दातृगौरव स्फुरित होता है, जो शक्तिमान् है—ऐसा कोई उत्तम पुरुष सर्वश्रेष्ठ है।

पण्डितराज जगन्नाथ
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केवल अपनी उदरपूर्ति के लिए भोजन पकाने का किसी मनुष्य को अधिकार नहीं है। दूसरों को खिलाने के बाद जो बच रहे, उसी को खाना चाहिए।

स्वामी विवेकानन्द
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बिना कष्टसहन तथा स्वार्थत्याग के, संसार का कोई भी महान कार्य सिद्ध नहीं हो सकता।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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जैसा करने से जिसकी प्राप्ति होती है, वैसा नहीं करते हो तो उसके लिए दुःखित रहो। करने के पहले दुःख करना, अप्राप्ति को ही बुलाता है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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यदि निःस्वार्थ भाव से तुम सबसे प्रीति करोगे, तो उसका फल यह होगा कि सब कोई आपस में प्रीति करने लगेंगे।

स्वामी विवेकानन्द
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जहाँ हम अपने को भूल जाते हैं और समष्टि में लीन हो जाते हैं, वहाँ आनंद हासिल होता है। वह समष्टि जितनी संकुचित होगी, उतना आनंद ही संकुचित होगा।

विनोबा भावे
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अपने-आपको दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक 'सर्व' के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता, तब तक स्वार्थ खंड-सत्य है, वह मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय, कृपण बना देता है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी
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‘निष्काम’ का अर्थ है, इच्छा शक्तिरूप निम्न परिणाम का त्याग और उच्च परिणाम का आविर्भाव।

स्वामी विवेकानन्द
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सब रंगों से अभिमुख होकर भी अलिप्त होना चाहिए। जो अलिप्त है, वह साहित्यिक होगा।

विनोबा भावे
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भक्ति के बदले में उत्तम गति मिलेगी—इस भावना को लेकर भक्ति हो ही नहीं सकती। भक्त के लिए भक्ति का आनंद ही उसका फल है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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तुम्हारा 'मै' पन जाते ही अदृष्ट ख़त्म हुआ। दर्शन भी नहीं, अदृष्ट भी नहीं।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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हमारे प्रकृत जीवन का प्रत्येक अंश त्याग है। हम वास्तव में जीवन के उन्हीं क्षणों में साधुता से युक्त होते हैं और प्रकृत जीवन का भोग करते हैं—जब हम ‘मैं’ की चिंता से विरत होते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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तुम्हें मन का सन्यास हो, सन्यासी का वेष बनाकर झूठ-मूठ बहुरूपिया मत बन बैठो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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वस्तुतः सौंदर्य वहीं है, जहाँ स्व नहीं है।

जे. कृष्णमूर्ति
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वे ही कार्य करते हैं, जो बदले में किसी लाभ की आशा नहीं रखते।

स्वामी विवेकानन्द
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संसाराभिमुख होते हुए भी साहित्यिक को निर्लिप्त रहना है। जो ऐसा रहेगा, वही सच्चे अर्थ में साहित्यिक है।

विनोबा भावे
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अपने लिए कुछ मत चाहो, देखोगे सभी तुम्हारे होते जा रहे हैं।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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अपने लिए जो भी किया जाए, वही है सकाम और दूसरे के लिए जो किया जाए—वही है निष्काम। किसी के लिए कुछ नहीं चाहने को ही निष्काम कहते हैं—केवल ऐसी बात नहीं है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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बंधु से कुछ प्रत्याशा रखो, किंतु जो भी पाओ, प्रेम सहित ग्रहण करो। कुछ भी देने पर पाने की आशा रखो, किंतु कुछ पाने पर देने की चेष्टा करो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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सत्य की आकांक्षा है तो स्वयं को छोड़ दो।

ओशो
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निःसंदेह स्वार्थ भी त्याग की अपेक्षा रखता है, किंतु स्वार्थी व्यक्ति बाधित होकर ही त्याग करता है। प्रेम में त्याग स्वेच्छा से होता है, वहाँ त्याग में भी आनंद है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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क्षमा करो, किंतु क्षति मत करो। प्रेम करो, किंतु आसक्त मत होओ। ख़ूब प्रेम करो, किंतु घुलमिल मत जाओ।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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कर्म विश्वास का अनुसरण करता है, जैसा विश्वास, कर्म भी वैसा ही होता है। गहरे विश्वास से सब हो सकता है। विश्वास करो लेकिन सावधान! अहंकार, अधैर्य और विरक्ति जिसमें आए—जो चाहते हो वहीं होगा।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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साधु का अर्थ जादूगर नहीं, बल्कि त्यागी, प्रेमी है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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काम करते जाओ, किंतु आबद्ध होना। यदि समझते हो कि विषय के परिवर्तन से तुम्हारे हृदय में परिवर्तन रहा है; और वह परिवर्तन तुम्हारे लिए वांछनीय नहीं है, तो ठीक जानो तुम आबद्ध हुए हो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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निष्काम कर्मयोगी तभी सिद्ध होता है जब हमारे बाह्य कर्म के साथ अंदर से चित्तशुद्धि रूपी कर्म का भी संयोग होता है।

विनोबा भावे
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अस्वाद-वृत्ति से चलने वाले संयुक्त भोजनालय में जाकर, वहाँ जो भोजन बना हो उसमें से जो हमारे लिए त्याज्य हो उस आहार को ईश्वर का अनुग्रह मानकर, मन में भी उसकी टीका किए बिना, संतोष-पूर्वक और शरीर के लिए जितना आवश्यक हो उतना खा लेना, अस्वाद व्रत में बहुत सहायक है।

महात्मा गांधी
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गीता ने उपदेश तो फलासक्ति के त्याग का दिया था; किन्तु साधकों ने कर्मन्यास का अर्थ फलासक्ति का त्याग नहीं, कर्म मात्र का त्याग लगा लिया।

रामधारी सिंह दिनकर
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प्रेम की प्रार्थना करो और हिंसा को दूर से परिहार करो, जगत् तुम्हारी ओर आकृष्ट होगा ही।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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यदि किसी दिन अपने प्रेमास्पाद को सर्वस्व न्योछावर कर निमज्जित हुए हो, और सतह जाने की आशंका देखते हो, तो जोर करके तत्क्षण निमज्जित होकर विगतप्राण हो जाओ—देखोगे प्रेमास्पद कितने सुंदर हैं, किस प्रकार तुम्हें आलिंगन किए हुए हैं।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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यथाशक्ति सेवा करो, किंतु सावधान—सेवा लेने की जिससे इच्छा जगे।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
  • संबंधित विषय : मदद
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यदि प्रेम रहे, तब पराये को अपना कहो, किंतु स्वार्थ रखो। प्रेम की बात बोलने से पहले प्रेम करो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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उद्यम का गर्व ही सारे उद्यम को व्यर्थ कर देता है।

गुरु नानक
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दान करो; किंतु दीन होकर, बिना प्रत्याशा के। तुम्हारे अंतर में दया के द्वार खुल जाए।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
  • संबंधित विषय : दान
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अपने या अपने बाल-बच्चों के काम आने के ख़याल से जो एक चिथड़ा ही बटोरकर रखता है और दूसरे को ज़रूरत होते हुए भी इस्तेमाल नहीं करने देता, वह परिग्रही है। जो ऐसी वृत्ति से रहित है, लाख रुपए की पूँजी रखता हुआ भी, वह अपरिग्रही है।

महात्मा गांधी
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नाम-यश की आशा में कोई काम करने जाना ठीक नहीं। किंतु कोई भी काम निःस्वार्थ भाव से करने पर ही, कार्य के अनुरूप नाम-यश तुम्हारी सेवा करेंगे ही।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
  • संबंधित विषय : यश

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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