धन उधार देकर समाज का शोषण करने वाले धनपति को जिस दिन 'महाजन' कहा गया होगा, उस दिन ही मनुष्यता की हार हो गयी। 'महाजन' कहना मनुष्यत्व की हीनता स्वीकार करके ही तो संभव हुआ।
असल में देखें तो दुनिया में सिर्फ़ दो ही जातियाँ हैं—पहली है अमीरों की और दूसरी है ग़रीबों की।
अहंकारी धनी मलिनता का दास होता है, इसीलिए ज्ञान की उपेक्षा करता है।
जगत् में प्रायः धनवानों में खाने और पचाने की शक्ति नहीं रहती है और दरिद्रों के पेट में काठ भी पच जाता है।
तुम्हारे इन अट्टहासों के कारण हज़ारों आँखें आँसुओं से भरी हुई हैं।
जब तक मेरे पास दो कोटों के होते हुए कोई व्यक्ति बिना कोट के रहेगा तब तक मैं भी इस संसार में निरंतर होते रहने वाले एक पाप का भागीदार बना रहूँगा।
जब मैं गहनों से लदे हुए उन अमीर-उमरावों को; भारत के लाखों ग़रीब आदमियों से मिलाता हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं इन अमीरों से कहूँ—जब तक आप अपने आप ये ज़ेवरात नहीं उतार देते और उन्हें ग़रीबों की धरोहर मान कर नहीं चलते, तब तक भारत का कल्याण नहीं होता।'
मैंने एक लेख में यह उद्धरण पढ़ा था : "दौलतमंद महिला को परानुभूति, केवल दौलतमंद मनोविश्लेषक से ही मिल सकती है।"
धन के लोभ से युक्त युवती नायिका, नायक के गुणों, रूप (सौंदर्य) तथा औचित्य की परवाह न करके—अनेक सौतों के होते हुए भी धनी पति को वरण कर ले।
एक-दो संयुक्तांक और फिर अंतिम अंक—हिंदी-पत्रिकाओं की यही गति है, दुर्गति ही है। उन पत्रों की बात अलग है, जिन्हें रईस निकालते हैं। यह उनका शौक़ है। जैसे पटियाला-नरेश पहलवान पालते थे, वैसे ही रईस पत्र-पत्रिका पालते हैं।
यह पुत्र-स्नेह धनी तथा निर्धन के लिए समान रूप से सर्वस्व धन है। यह चंदन तथा ख़श से भिन्न हृदय का शीतल लेप है।
धनी हो या दरिद्र, दुःखी हो या सुखी, निर्दोष हो या सदोष (जैसा भी हो), मित्र परम गति है।
क़ानून निर्धन को पीसते हैं और धनवान क़ानून पर शासन करते हैं।
जिनका धन समान है, जिनकी विद्या एक सी है, उन्हीं में विवाह और मंत्री का संबंध हो सकता है। धनवान और निर्धन में कभी मित्रता नहीं हो सकती।
प्रायः धनी लोगों की अनेक स्त्रियाँ निरंकुश होती हैं। बाहरी सुखभोग प्राप्त होने पर भी, आंतरिक सुख अर्थात् संभोग रूप सुख से रहित होती हैं।
विद्वान्, शूरवीर, धनी, धर्मनिष्ठ, स्वामी, तपस्वी, सत्यवादी तथा बुद्धिमान मनुष्य ही प्रजा की रक्षा करते हैं।
धनी बनो; क्षति नहीं, किंतु दीन एवं दाता बनो।
धनवान यदि अहंकारी होता है, वह दुर्दशा में अवनत होता है।
जिस धनी पुरुष का जन्म याचक जन की इच्छा को पूर्ण करने के लिए नहीं है, उस पुरुष से ही यह पृथ्वी अत्यंत भार वाली है, न कि पेड़ों या पर्वतों या समुद्रों से।
जिसके पास भगवद्-भक्ति, भगवद्-प्रेम है—वही इस संसार में धनी है। ऐसे व्यक्ति के समक्ष महाराजाधिराज भी दीन भिक्षुक के समान है।
दीनताहीन अहंकारी धनी प्रायः अविश्वासी होता है, और उसके हृदय में स्वर्ग का द्वार नहीं खुलता।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere