जो किसी चीज़ की इच्छा न रखता हो और प्रकृति के साथ विलीन न हो, उसके लिए प्रकृति के अनेक परिवर्तन, सौंदर्य और उदात्तता का एक अनुपम दृश्य प्रस्तुत करते हैं।
इच्छा का यह जो सहज धर्म है कि वह दूसरे की इच्छा को चाहती है, केवल ज़ोर-ज़बरदस्ती पर ही उसका आनंद निर्भर नहीं है।
आदर्श आकांक्षा मात्र ही नहीं है। वह संकल्प भी है। क्योंकि जिन आकांक्षाओं के पीछे संकल्प का बल नहीं, उनका होना या न होना बराबर ही है।
आदिम मानव की यह एक स्वाभाविक वृत्ति है कि वह बाह्य-वस्तु जगत को अपनी कल्पना के द्वारा, अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप चित्रित करता है।
इस संसार में बिना प्रतिरोध, बिना हिंसा और बिना इच्छा के कोई रह ही नहीं सकता। अभी संसार उस अवस्था में नहीं पहुँचा कि ये आदर्श, समाज में प्राप्त किए जा सकें।
प्रशंसा चाहना शायद देवत्व है, तभी तो हर देवता की प्रशंसा के लिए दुनिया की हर भाषा में अगणित ग्रंथ रचे गए हैं।
विचारों की असीमित आपूर्ति आपके लिए उपलब्ध है। समूचा ज्ञान, आविष्कार और खोजें, ब्रह्मांडीय मस्तिष्क में संभावनाओं के रूप में मौजूद हैं और मानवीय मस्तिष्क द्वारा उन्हें बाहर निकालने का इंतज़ार कर रहीं हैं। हर चीज़ आपकी चेतना में है।
काम, आहार के समान शरीर की स्थिति का हेतु है। जिस प्रकार शरीर की स्थिति के लिए आहार का सेवन आवश्यक है, उसी प्रकार शरीर के लिए काम का सेवन भी आवश्यक है।
नखक्षत से उच्छिष्ट स्तनों वाली युवति नायिका को दूर से ही देखकर, परपुरुष के मन में उसके प्रति सम्मान और प्रेम-भावना अर्थात् संभोग की कामना उत्पन्न हो जाती है।
कोई भी महिला इस नकारात्मक और ग़लत धारणा के प्रति विशेष रूप से अति संवेदनशील होती है कि वह प्रेम पाने के योग्य नहीं है। यदि बचपन में उसने बुरा बर्ताव देखा है या वह स्वयं इसका शिकार हो चुकी है, तो प्रेम पाने के योग्य नहीं होने के अहसास के प्रति वह और भी अधिक संवेदनशील होती है। इससे उसके लिए अपना महत्त्व तय करना कठिन हो जाता है। महत्त्वहीन होने का यह अहसास अचेतन मन में छिपा होता है, जिससे यह डर उत्पन्न होता है कि उसे अन्य लोगों की ज़रूरत होगी। उसके मन के एक कोने में कहीं यह कल्पना पैदा होती है कि उसे समर्थन नहीं मिलेगा।
किसी भी इंसान की ख़ुशी के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि उसे अपनी स्वाभाविक इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने की स्वतंत्रता हो।
यदि कोई व्यक्ति प्रेमियों की मनःस्थिति का सूक्ष्म निरीक्षण करे; तो यह समझ जाएगा कि प्रेम की उत्पत्ति के मूल में मनुष्य की निजी इच्छाएँ, और व्यक्तिगत संतुष्टि की खोज की भावना अंतनिर्हित होती है।
जीवनकाल में अत्यधिक वृद्धि का पक्ष लेने वालों के पास कोई वास्तविक समाधान नहीं है। सिवाए यह कहने कि जब समस्याएँ हमारे सामने आएँगी, तो हम उनसे निपटना सीख लेंगे। कुछ ने कहा कि अगर हमारे सामने जीवनकाल बहुत बढ़ जाने से जनसंख्या की समस्या पैदा होगी, तो हमें एक निश्चित उम्र पर पहुँच जाने के बाद, धरती छोड़कर किसी दूसरे ग्रह पर बस जाना चाहिए।
प्रंशसा के जाल में सरलता से फँसता है, मध्यम स्थिति का आदमी। जो बड़ा है—वह इसलिए कि प्रशंसा से उसका पेट आधा तो भर ही गया होगा, या इसलिए कि वह इस जाल को देख लेता है—फँसेगा नहीं। निपट निम्न श्रेणी का आदमी प्रशंसा को उपहास समझकर नाराज़ हो जाएगा, पर मध्यमार्गी जानता है कि वह निपट निकृष्ट नहीं है। उसके मन में बड़ा कहलाने की हविस भी होती है।
चीज़ों को देर तक देखना तुम्हें परिपक्व बनाता है और उनके गहरे अर्थ समझाता है।
कुछ हासिल करने की लालसा रखने वाले किसी भी आदमी के लिए, झूठ और छल का एक जाल बुनना सबसे ज़्यादा कारगर होता है।
पाँच इंद्रियों, क्रोध, मान, माया, लोभ और सबसे अधिक दुर्जय अपनी आत्मा को जीतना चाहिए। एक आत्मा के जीत लेने पर सब कुछ जीत लिया जाता है।
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हमारी आवश्यकताएँ जब तक इस भौतिक सृष्टि की संकुचित सीमा के भीतर की वस्तुओं तक ही परिमित रहती हैं, तब तक हमें ईश्वर की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती।
अल्पवित्त वाला व्यक्ति अगर एक दिन के लिए अपना राजा का शौक पूरा करने जाए; तो वह दस दिन के लिए अपने को दीवालिया बना डालता है, उसके अलावा उसके पास और कोई उपाय नहीं रहता है।
इंद्रियों के अनुभव से जो ज्ञान पैदा होता है, वही ज्ञान है और वही ज्ञान संस्कृति का आधार है। यदि आप इंद्रिय सुख पर रोक लगा रहे हैं, तो आप आदमी की ज्ञानार्जन वृत्ति पर भी रोक लगा रहे हैं।
संसार में अधिकांश दुष्कर्म, व्यक्तिगत आसाक्ति के कारण ही किए गए हैं।
मध्यवर्ग में बढ़ता भ्रष्टाचार, अपराधीकरण—दरअसल इच्छा-जगत में बने रहने की हड़बड़ाई कोशिशें भर हैं। इच्छा-जगत को यथार्थ में बदलने का एक अयथार्थ तरीक़ा।
मनुष्य का असंयम और उसकी बढ़ी हुई विलास-लालसा ही, समय-समय पर मनुष्य-जाति के पतन का कारण बनती रही है।
यश का उन्माद बहुत बुरा होता है। नार्मल यशोकामना रहे और नार्मल तरीक़े से यश मिले तो ठीक है। सब यश चाहते हैं, मगर कुछ लोग ज़्यादा उस्ताद होते हैं। वे जानते हैं कि साधारण तरीक़े से हमारा सीमित यश फैलेगा, इसलिए वे ऐसे तरीक़े अपनाते हैं, जिनसे उनकी हँसी उड़े।
इच्छा, अज्ञान और आसमान—यही बंधन के त्रिविध द्वार हैं।
आत्मा से संयुक्त एवं मन से अधिष्ठित श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण आदि पाँच ज्ञानेंद्रियों की अपने-अपने विषयों में जो अनुकूल प्रवृत्ति है—वही 'काम' है।
जीवन के विस्तार की इच्छा रखना, मरीचिका के पीछे भागने जैसा है। असली अमरता से कम कुछ भी, कभी पर्याप्त नहीं होगा और वह कभी नहीं होती। अगर हम बुढ़ापे पर जीत हासिल कर लें, तो भी हम हादसों, युद्ध, महामारी या पर्यावरण की त्रासदियों में जान गंवा सकते हैं। सबसे सरल यह होगा कि हम मान लें कि जीवन सीमित है।
जो वास्तव में ब्रह्मचारी रहते हैं—वे क्रूर, सनकी, ज़िद्दी और अमानवीय हो जाते हैं। सामान्य सेक्स-जीवन हर मनुष्य का होना चाहिए।
अगर हम ख़ुद में ऐसी इच्छा पाते हैं जिसे इस दुनिया में कुछ भी संतुष्ट नहीं कर सकता है, तो सबसे संभावित स्पष्टीकरण यह है कि हम दूसरी दुनिया के लिए बने हैं।
रचनात्मक प्रक्रिया आपकी मनचाही चीज़ को पाने में आपकी मदद करती है। इसके तीन आसान क़दम है : माँगें, यक़ीन करें और पाएँ।
एक पूर्ण एवं मुक्त प्राणी, कभी किसी चीज़ की आकांक्षा नहीं करता।
जिन भावों की जड़ें हिल गई हैं, यदि उनका स्थान ग्रहण करने को अन्य उपयोगी भावों को अवसर न दिया गया तो हृदय, हृदय नहीं रह जाएगा।
जैसा करने से जिसकी प्राप्ति होती है, वैसा नहीं करते हो तो उसके लिए दुःखित न रहो। करने के पहले दुःख करना, अप्राप्ति को ही बुलाता है।
ब्रह्मांड से अपनी मनचाही चीज़ माँगने का मतलब, इस बारे में स्पष्ट होना है कि आप क्या चाहते हैं। अगर आपके दिमाग़ में स्पष्ट तस्वीर है, तो आपने माँग लिया है।
मैं भी किसी पुरुष से प्रेम करना चाहती हूँ, लेकिन दुनिया में बहुत सुंदर स्त्रियाँ हैं।
एक-दूसरे के लिए आत्मिक आकुलता की दैहिक अभिव्यक्ति, संभवतः संसार का पवित्रतम दृश्य निर्मित कर सकती है।
हमें जो चाहिए सो मिलता है, यह पुराना नियम है। जो खोजे सो पावे। धर्म की आकांक्षा होना बड़ी कठिन बात है। इसे हम साधारणतः जितना सरल समझते हैं, वह उतनी सरल नहीं है। फिर हम यह तो भूल ही जाते हैं कि कथाएँ सुनना या पुस्तकें पढ़ना धर्म नहीं है। धर्म तो एक सतत युद्ध है। स्वयं अपनी प्रकृति का दमन करते रहना, जब तक उस पर विजय प्राप्त न हो जाए, तब तक निरंतर लड़ते रहना—इसी का नाम धर्म है।
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मेरी परिकल्पना और मेरी रूझान के अनुकूल, आकर्षण के केन्द्र हैं आरंभ से ही—त्यागी की वृत्ति, सादा जीवन और उच्च विचार, तथा देश-सेवा के लिए हार्दिक अनुरक्ति।
सवेरे से ही मैं अपने संसार के बारे में सोचना प्रांरभ कर देता हूँ, क्योंकि यह मेरा संसार जो है—मेरी इच्छा ही इस संसार का केंद्र है। मैं क्या चाहता हूँ, क्या नहीं चाहता, मैं किसे रखूँगा, किसे छोड़ दूँगा—इन्हीं सब बातों को बीच में रखकर मेरा संसार है।
स्वेच्छापूर्ति साधना ही जिसका स्वभाव है; ऐसा मनुष्य व्यवस्था की ओर झुके भी तो केवल इसलिए झुक सकता है, क्योंकि उसकी इच्छा अन्य को भी अपनी इच्छापूर्ति का साधन बनाना चाहती है—ऐसे में दंड का ही साम्राज्य हो सकता है, व्यवस्था उभरे भी तो दास-व्यवस्था ही उभरेगी, कोई परस्पर-भाव-जन्य ‘समझौता’ कैसे बनेगा?
तृष्णा, क्रोध और भय—इन तीनों वृत्तियों के नष्ट हो जाने पर प्रज्ञा स्थिर होती है।
संजीवता दुःख निवृत्ति के लिए छटपटाने ही का नाम है, पड़े-पड़े आनंद के चषक लेने का नहीं।
महिलाओं के लिए न सिर्फ़ दूसरों की आवश्यकता दुविधाजनक होती है, बल्कि निराश होना या परित्याग होना खास तौर पर दर्द भरा होता है—सबसे छोटे तरीक़ों से भी। दूसरों पर निर्भर होना और फिर नज़रअंदाज़ किया जाना, भुला दिया जाना या ख़ारिज किया जाना, किसी महिला के लिए आसान नहीं होता। दूसरों की ज़रूरत महिला को संवेदनशील और असुरक्षित स्थिति में रख देती है। नज़रअंदाज़ किए जाने या निराश किए जाने से उसे ज़्यादा चोट पहुँचती है, क्योंकि इससे उसके अंदर की यह ग़लत धारणा पुष्ट होती है कि वह महत्त्वहीन है।
आत्मा के सम्मुख तो अनंत जीवन पड़ा हुआ है। अध्यवसाय के साथ लगे रहने पर तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।
इच्छा को जहाँ अन्य इच्छा की चाह होती है, वहाँ इच्छा फिर स्वाधीन नहीं रह जाती।
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दुनिया में मौजूद अच्छी चीज़े कभी ख़त्म नहीं होंगी, क्योंकि यहाँ सबके लिए पर्याप्त से ज़्यादा है। जीवन प्रचुर और समृद्ध होना चाहिए।
जो लेखक को सामान्य समाज से ऊपर; ऐश-आराम की ज़िंदगी की सुविधा कर देना चाहते हैं, वे उसकी साहित्यिक मौत का प्रबंध करना चाहते हैं।
‘निष्काम’ का अर्थ है, इच्छा शक्तिरूप निम्न परिणाम का त्याग और उच्च परिणाम का आविर्भाव।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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