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ब्रह्म पर उद्धरण

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संसार-बंधन के दुःखों की रचना को विध्वंस करने हेतु; प्रलयाग्नि के सदृश ब्रह्मानंद पद में प्रवेश के उद्योग के बिना ,और बाक़ी सब वणिग्व्यापार है। प्रयोजनवाली बात केवल ब्रह्म का चिंतन है।

भर्तृहरि
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सब जीवों में ब्रह्मदर्शन ही मनुष्य का आदर्श है।

स्वामी विवेकानन्द
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जैसे तर्क के बेसहारा; अप्रतिष्ठ मार्ग से ब्रह्म को नहीं जाना जा सकता, वैसे ही धर्म को भी नहीं जाना जा सकता।

मुकुंद लाठ
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निःसंदेह हमें ब्रह्म होना है। हमारा जीवन ही व्यर्थ है यदि हम अपने इस पूर्णता के ध्येय को पा सकें।

रवींद्रनाथ टैगोर
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प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है।

स्वामी विवेकानन्द
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हमें विश्वास है कि सभी जीव ब्रह्म हैं। प्रत्येक आत्मा मानो अज्ञान के बादल से ढके हुए सूर्य के समान है, और एक मनुष्य से दूसरे का अंतर केवल यही है कि कहीं सूर्य के ऊपर बादलों का घना आवरण है और कहीं कुछ पतला।

स्वामी विवेकानन्द
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धीरे-धीरे ब्रह्मभाव की अभिव्यक्ति के लिए जिन कार्यों से जीव को सहायता मिलती है, वे ही अच्छे हैं और जिनके द्वारा उसमें बाधा पहुँचती है, वे बुरे हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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अद्वैत दर्शन के अनुसार विश्व में केवल एक ही वस्तु सत्य है, और वह है ब्रह्म।

स्वामी विवेकानन्द
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ब्रह्महीन कर्म अंधकार है और कर्महीन ब्रह्म उससे भी बड़ी शून्यता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जो वृद्धिप्राप्त होकर, सब कुछ होकर वही है—वही है ब्रह्म।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
  • संबंधित विषय : सच
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कवियों का अपनी कल्पना-शक्ति के द्वारा ब्रह्मा के साथ होड़ करना कुछ अनुचित नहीं है, क्योंकि जगत्स्रष्टा तो एक ही बार जो कुछ बन पड़ा; सृष्टि-निर्माण-कौशल दिखला कर आकल्पांत फ़रराग़त हो गए, पर कविजन नित्य नई-नई रचना के गढ़ंत से जाने कितनी सृष्टि-निर्माण-चातुरी दिखलाते हैं।

बालकृष्ण भट्ट
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हमारे लिए तो ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या कहने की अपेक्षा ब्रह्म को सत्य और जगत को ब्रह्म कहना अधिक उचित और हितकर है।

श्री अरविंद
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जिसने पर ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया, उसके लिए सारा जगत नंदनवन है, सब वृक्ष कल्पवृक्ष हैं, सब जल गंगाजल है, उसकी सारी क्रियाएँ पवित्र हैं, उसकी वाणी चाहे प्राकृत हो या संस्कृत-वेद का सार है, उसके लिए सारी पृथ्वी काशी है और उसकी सारी चेष्टाएँ परमात्मामयी है।

आदि शंकराचार्य
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निर्मल ब्रह्म के चिंतन से ही परमानंद की प्राप्ति हो सकती है।

भर्तृहरि
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ब्रह्म को पाने का अर्थ ब्रह्म से एकत्व पाना ही है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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वेदांत ‘ब्रह्म-जिज्ञासा’ है तो काव्य ‘पुरूष-जिज्ञासा।’

कुबेरनाथ राय
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महासागर की ओर यदि देखो, तो प्रतीत होगा कि वहाँ पर्वतकाय बड़ी-बड़ी तरंगें हैं, फिर छोटी-छोटी तरंगें भी हैं और छोटे-छोटे बुलबुले भी। पर इन सब के पीछे वही अनंत महासमुद्र है। एक ओर वह छोटा बुलबुला अनंत समुद्र से युक्त है, फिर दूसरी ओर वह बड़ी तरंग भी उसी महासमुद्र से युक्त है। इसी प्रकार, संसार में कोई महापुरुष हो सकता है, और कोई छोटे बुलबुले जैसा सामान्य व्यक्ति; परंतु सभी उसी अनंत महाशक्ति के समुद्र से युक्त है, जो सभी जीवों का जन्मसिद्ध अधिकार है।

स्वामी विवेकानन्द
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'ज्ञानयज्ञ' का अभिप्राय बुद्धि और हृदय, बोधवृत्ति और रागात्मिका वृत्ति—दोनों को ब्रह्म या परमात्मा में लगाना है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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आत्मा और ब्रह्म की एकता, ज्ञान तथा विचार का विषय है।

श्री पीताम्बर पंडित
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मन वाक् के अविषय रूप से; मन से उपलक्षित ब्रह्म के आनंद स्वरूप को जाननेवाला विद्वान, तथा मनोमय का उपासक कभी डरता नहीं है।

श्री पीताम्बर पंडित
  • संबंधित विषय : डर
    और 1 अन्य
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संसार सागर को पार करने के लिए ब्रह्मज्ञान ही एकमात्र नौका है।

भर्तृहरि
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असीम पूर्णता में दर्जे नहीं होते, हम ब्रह्म में धीरे-धीरे विकास नहीं पा सकते—वह अपने आप में पूर्ण है, उससे कभी अधिकता तो हो ही नहीं सकती।

रवींद्रनाथ टैगोर
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ब्रह्मनिष्ठ मोक्ष पाता है, अतः मुमुक्षु को दृश्य का अवश्य त्याग करना चाहिए।

श्री पीताम्बर पंडित
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अनंत ब्रह्म, अनंत लघु होने पर भी बड़ा है और बड़ा होने पर भी लघु है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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तुम्हारा मन सत् या ब्राह्म में विचरण करे; किंतु शरीर को गेरूआ या रंग-ढंग से सजाने में व्यस्त मत्त होओ, ऐसा करने से मन शरीरमुखी हो जाएगा।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
  • संबंधित विषय : सच
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साधना हमें ईश्वर तक पहुँचाती है, तपस्या ब्रह्म तक।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जिस महाकाव्य अर्थात् ब्रह्मज्ञान के आगे त्रैलोक्य का राज्य फीका हो जाता है, उसे प्राप्त होकर भोजन, वस्त्र और मान के रुचि वाले भोगों में प्रीति मत करो। वही एक भोग सबसे श्रेष्ठ और नित्य उदित प्रकाशित है, जिसके स्वाद के सम्मुख त्रैलोक्य का राज्य आदि सब ऐश्वर्य निरस और तुच्छ हो जाते हैं।

भर्तृहरि
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ब्रह्म आत्मा की एकता का अपरोक्ष ज्ञान, मोक्ष का साज्ञात् साधन है।

श्री पीताम्बर पंडित
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जो पुरुष निश्चय ही अंतरात्मा में ही सुख वाला है, अंतरात्मा में ही शांति वाला है तथा जो अंतरात्मा ज्ञान वाला है, वह योगी स्वयं ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म की शांति प्राप्त करता है।

वेदव्यास
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अव्यक्तमूर्ति ब्रह्म से इस संपूर्ण जगत का विस्तार हुआ है।

वेदव्यास
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यज्ञ में अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्म रूप अग्नि में ब्रह्म ने हवन किया है, इस प्रकार जिसकी बुद्धि से सभी क्रम ब्रह्म रूप हुए हैं, वह ब्रह्म को ही प्राप्त करता है।

वेदव्यास
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तर्क द्वारा केवल हम उस वस्तु का ज्ञान पा सकते हैं जो हिस्सों में बाँटी जा सके, विश्लिष्ट हो सके। ब्रह्म का विश्लेषण नहीं हो सकता।

रवींद्रनाथ टैगोर
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प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है।

स्वामी विवेकानन्द
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मन से अब्रह्मचारी रहते हुए तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य कैसा?

अश्वघोष
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ब्रह्म का ही चिंतन, ब्रह्म का ही कथन, ब्रह्म का ही परस्पर बोधन और ब्रह्म की ही एकमात्र कामना करना इसको विद्वानों के द्वारा 'ब्रह्माभ्यास' कहा जाता है।

आदि शंकराचार्य

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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